आलोक रंजन, युवा पत्रकार
किसी भोजपुरी गायक ने एक प्रसिद्व गाना गाया था..’गांजा पिय जनी राजा हो खराब हो जईब। लोग गांजा छोड़ दारू की ओर मुड़ गये। लेकिन जब सरकार ने बिहार में दारूबंदी की घोषणा की तो नशेरियों को परेशान होना स्वभाविक था। अब उसी गाने के बोल दुहराते हुए..दारू बाज गांजे एवं अन्य नशे का शरण ले रहे हैं। बिहार सरकार के शराबबंदी अभियान से पस्त नशेड़ियों ने अब भांग व गांजे की शरण ले ली है। कुछ जगहों पर चोरी छिपे शराब चलती है।
चिलम सुलग रहा है, पान की दुकानों में भांग की जबरदस्त मांग बढ़ गई है। रसीला, सुहाना व मातुलानी चूर्ण के नाम से कई दुकानों पर भांग के आइटम बाजार में दिखाई दे रहे हैं। शराबियों का समूह अब मोदक की मस्ती में परम आनंद की तलाश कर रहा नजर आता है।
सुपौल के छातापुर प्रखंड क्षेत्र में शराब की पूर्ण बंदी की वजह से जहाँ शराबी के हाथ खाली नजर आते हैं वहीं गंजेड़ियों की अहले सुबह से लेकर देर रात्रि तक चांदी ही चांदी हैं। क्योंकि मुख्य बाजार तो क्या ग्रामीण क्षेत्रों में भी जहाँ गांजा आसानी से उपलब्ध हो जाया करती है वहीं दरवाजे व बगीचों में बने मचान पर बैठे युवा व कई अधेड़ उम्र के ग्रामीणों को चिलम की चाकड़ी लगाते देख समर्थक भी सोंट लगाने से बाज नहीं आ रहे है।
कमोबेश यही हाल सभी ईलाकों की है। दारूबंदी ने भांग, गांजा और तंबाकू उत्पादों की बिक्री बढ़ा दी है। पंचायत चुनाव में इसकी आर्पूती और बढ़ गयी है, क्योंकि वोट कटने के डर से प्रत्याशी दारू के बदले गांजा और अन्य पेय पदार्थ और मोदक, गुटखा की आपूर्ती में कोई कमी नहीं कर रहे हैं। प्रत्याशी व उनके समर्थक शराबियों को शराब उपलब्ध नहीं होने का वास्ता देकर गांजा से ही काम चला लेने की दुहाई देते नजर आ रहे हैं। वहीं चुनाव के इस मौसम में पान, सिगरेट व रजनीगंधा की बिक्री ने भी काफी जोर पकड़ लिया है। वैसे मतदाता जो अपने पैसे से बीड़ी व गुटखा से ही काम चलाते हैं वह प्रत्याशियों को देखते ही दुकानदारों से सिगरेट व रजनीगंधा की मांग कर बैठते हैं।


