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strawberry: किसान अब परंपरागत खेती से हटकर वैज्ञानिक तरीकों की ओर बढ़ रहा है। आधुनिक तकनीकों और नवीन प्रयोगों के जरिए वे खेती को अधिक लाभकारी बना रहे हैं। इसी के साथ स्ट्रॉबेरी की खेती किसानो की आर्थिक स्थिति को सुधारने में बहुत लाभकारी साबित हो रही है। पहले इसकी खेती सिर्फ पहाड़ी और ठन्डे भागो में ही की जा सकती थी, लेकिन बढ़ते व्यापारिक मूल्य और कृषि वैज्ञानिक के शोधो की वजह से अब मैदानी भागो में भी इसकी खेती की जा रही है। ऐसे में पश्चिमी मिदनापुर के किसान महेश जो अपने इलाके में वैज्ञानिक विधियों से स्ट्रॉबेरी की खेती कर रहे हैं। उन्होंने बताया की सामान्य खेती की तुलना में स्ट्रॉबेरी की खेती काफी बेहतर होती है।
स्ट्रॉबेरी की बढ़ती मांग
सर्दी और वसंत ऋतु में स्ट्रॉबेरी की मांग बढ़ जाती है। महेश ने इस अवसर को पहचाना और अपने गांव पिंगला में स्ट्रॉबेरी की खेती शुरू की। उन्होंने वैज्ञानिक तरीके से करीब 50 दशमलव स्थानों पर स्ट्रॉबेरी उगाई, जो बाजार में ऊंचे दामों पर बिक रही है। मार्केट में मीठी और स्वादिष्ट स्ट्रॉबेरी मिलने लगी है। इस फसल ने उन्हें एक ही सीजन में अच्छी कमाई का जरिया बना दिया है।
स्ट्रॉबेरी की खेती कैसे होती है
स्ट्रॉबेरी के पौधे सितंबर-अक्टूबर के आसपास रोपे जाते हैं। स्ट्रॉबेरी की खेती करने के लिए सबसे उपयुक्त है अपने खेत की मिट्टी की जांच करवाए जिसे फसल के लिए आवश्यक पोषक तत्वों की सही मात्रा का अनुमान लगाया जा सके, स्ट्रॉबेरी की खेती करने के लिए पहले मिट्टी की तैयारी बहुत जरूरी होती है। मिट्टी को दो महीने तक जैविक उर्वरक या वर्मीकम्पोस्ट डालकर तैयार किया जाता है। एक एकड़ खेत में करीब बीस हजार पौधे लगाए जाते हैं। इसी के साथ स्ट्रॉबेरी की खेती के लिए तैयार पोधो का उपयोग किया जाता है। इसे सीधे बीजो से तैयार नहीं किया जाता, इसलिए पौधे हमेशा अपने नजदीकी सरकारी कृषि संस्था, प्रयोगशाला या विश्वसनीय नर्सरी से खरीदना चाहिए। इसकी कुल लागत चार से साढ़े चार लाख रुपये होती है, लेकिन फसल से आठ से नौ लाख रुपये तक की कमाई संभव है।
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बाजार में अच्छी कीमत पर मिलती है स्ट्रॉबेरी
स्ट्रॉबेरी की बाजार में अच्छी डिमांड रहती है। इसकी अधिकतम कीमत 350 से 400 रुपये प्रति किलो तक जाती है। स्थानीय बाजारों के अलावा इसे कोलकाता, पूर्वी मिदनापुर और अन्य राज्यों में भी बेचा जाता है। यहां तक कि विदेशों में भी इसकी अच्छी मांग बनी हुई है। जनवरी-फरवरी में इसकी फसल तैयार हो जाती है, और गर्मियों तक उपज अच्छी बनी रहती है।
वैज्ञानिक तरीकों से खेती करके महेश ने साबित कर दिया है कि मेहनत और समझदारी से खेती को फायदे का सौदा बनाया जा सकता है। वह खुद हर साल खेती करते हैं और लगातार मुनाफा कमा रहे हैं। उनकी सफलता ने दूरदराज के किसानों को भी प्रेरित किया है कि वे परंपरागत खेती से आगे बढ़कर नई तकनीकों को अपनाएं और अच्छी कमाई करें।


