संतोष कुमार सिंह
क्या आप इस तथ्य से अवगत है कि भारत में 5 वर्ष की आयु सीमा के लगभग 50 फीसदी बच्चे बौनेपन अर्थात स्ट्नटिंग के शिकार है?यानी स्टंटिंग की समस्या के कारण उनका विकास अवरू़द्ध हो रहा है। अगर आंकड़ो की भाषा में कहा जाये तो लगभग 54 मिलियन बच्चे जो कि कनाडा और नीदरलैंड की सयुक्त जनसंख्या के बराबर है।
यूनिसेफ द्वारा जारी,‘स्टाप स्टनटिंग इन साउथ एशिया’ रिपोर्ट में कहा गया है कि वैसे तो वैश्विक स्तर पर बच्चों के अंदर बौनेपन की समस्या देखी जा रही है, और दक्षिण एशिया इसका प्रमुख केंद्र है, जहां कुल स्टंटिग बच्चों के 40 फीसदी बच्चे निवास करते हैं। भारत में विश्व के कुल स्टंटिंग से प्रभावित बच्चों के 33 फीसदी बच्चे हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिण एशिया में लगभग 64 मिलियन बच्चों में इस समस्या के पीछे मुख्य वजह खानपान में कमी अर्थात पोषक तत्वों का अभाव है।
निश्चित रूप से खतरे की घंटी है। लेकिन इन आंकड़ो के बावजूद संतोषजनक ये है मीडिया चाहे तो इसमें बदलाव ला सकता है। यूनिसेफ के डिप्टी रिजनल डायरेक्टर फिलिप कोरी ने रिपोर्ट स्टाप स्टंटिंग इन साउथ एशिया जो कि मातृ एवं बाल पोषण पर अंतरर्राष्टीय जरनल का विशेष अंक है, को जारी करते हुए कहा कि ‘‘मीडिया नियम तय कर सकती है। और इसकी बदौलत समुदाय तक संदेश पहुंचेगा और यह पता चल सकता है कि उस समूह तक इसका कितना लाभ पहुंचा जिन्हे इसकी वास्तव में जरूरत है। जैसा कि ज्ञात है कि ज्यादातर स्टंटिंग के मामले जन्म के 1000 दिन के भीतर ही देखे जाते हैं अर्थात गर्भधारण से दो वर्ष की उम्र तक। यह वह समय है जब बच्चों के विकास पर पोषाहारों की कमी और पर्यावरण के दबाव का विशेष प्रभाव होता है। इन दिनों में स्तनपान के महत्व पर विशेष जोर देने की आवश्यकता है। ऐसे हालात में मीडिया की भूमिका पर जोर देते हुए कोरी कहते हैं कि,‘‘ जब एक ग्रामीण महिला खेत में काम करते हुए लगातार रेडियो पर नवजात शिशु को स्तनपान कराने के फायदे के विषय में सुनती है, तो निश्चित तौर पर उसपर इसका प्रभाव होता है। ’’ या फिर जब मीडिया द्वारा स्टंटिंग से प्रभावित बच्चों के दिमाग के विकास को रेखांकित किया जाता है या इसकी तस्वीर दिखाई जाती है तो इसके जरिए समाज को इस समस्या से अवगत होने और इस कमी को दूर करने के लिए जोर-शोर से काम करने में मदद मिलता है।’’
यूनिसेफ में दक्षिण एशिया के क्षेत्रीय निदेशक करीन हलशोफ के अनुसार, ‘‘दक्षिण एशियाई देशों को स्टंटिंग की रोकथाम के लिए समता आधारित सामाजिक एवं आर्थिक नीतियों के साथ-साथ बड़े पैमाने के कार्यक्रमों में निवेश करना होगा। ये कार्यक्रम प्रमाण आधारित होने चाहिएं और इनमें सबसे ज़्यादा संवेदनशील बच्चों एवं महिलाओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।’’ उन्होने कहा कि स्टंटिग को परिभाषित करने के लिए उम्र के हिसाब से कदकाठी के अपर्याप्त विकास को देखा जाता है। हालांकि ज्यादातर इस दिशा में लोगों का ध्यान नहीं जा पाता। जबकि आंकड़े बताते हैं कि प्रत्येक वर्ष इसकी वजह एक मिलियन बच्चों की मौत हो जाती है।
इस पूरे ईलाके में निवेश विशेष रूप से इन मुद्दों पर बहुत ही जरूरी है यदि हमें निर्धारित लक्ष्य को पूरा करना है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के 2015 के आंकड़ो पर गौर करें तो वर्ष 2010 में स्टंटेड बच्चों की संख्या 171 मिलियन थी जिसे कि 2025 तक 100 मिलियन तक लाना है। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए और आपसी भागीदारी के माध्यम से सभी दक्षिण एशियाई देशों मे 2025 तक पांच वर्ष तक के अवरुद्ध विकास वाले बच्चों की संख्या को 40 फीसदी तक कमी लाने का महत्वपूर्ण लक्ष्य रखा गया है, इसके लिए व्यापक निवेश की आवश्यकता है।
स्टाॅप स्टंटिंग इन साउथ एशिया रिपोर्ट में इस क्षेत्र में बच्चों में अवरुद्ध विकास के तीन मुख्य कारकों पर ध्यान केन्द्रित किया गया हैः जीवन के पहले दो सालों में बच्चों को उचित आहार उपलब्ध न होना; गर्भावस्था के दौरान और इससे पहले महिलाओं को उचित पोषण न मिलना; और घर एवं समुदाय में साफ-सफाई की खराब स्थिति। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पानी, शौचालय एवं स्वच्छता का स्टंटिंग में और पोषण की कमी में महत्वपूर्ण योगदान है। रोचक तथ्य यह है कुपोषण के लगभग 50 फीसदी मामले खाने की कमी या फिर भोजन में पोषाहार की मात्रा की कमी की वजह से नहीं होते बल्कि खराब साफ सफाई की व्यवस्था और उचित स्वच्छता व्यवहारों की कमी की वजह से जैसे साबुन से सही तरीके से हाथ न धोना आदि, इसकी वजह से संक्रमण होता है और डायरिया जैसी बीमारियां होती हैं। सीएमआरटी से बातचीत में कोरी ने कहा कि यूनिसेफ भारत में बड़े जोरशोर से वास कार्यक्रम चला रहा है। इसके साथ ही माताओं, नवजात शिशूओं और बच्चों के पोषण पर भी ध्यान दिया जा रहा है। साथ ही साथ यूनिसेफ शौचालय एवं स्वच्छता में सुधार की विशेष पहल कर रहा है ताकि उनके स्वास्थय में सुधार हो उनके जीवित रहने की संभावना बढ़े। मीडिया इन प्रयासों के विषय में लगातार रिर्पोटिंग कर लोगों तक संदेश पहुंचाने में काफी सहायक हो सकता है।
सबकुछ खराब ही हो ऐसा भी नहीं है। पिछले दो दशक में दक्षिण एशिया में स्टंटिंग के मामले में 61 फीसदी से घटकर 38 फीसदी हो गए हैं। दक्षिण एशिया के लिए यूनिसेफ के क्षेत्रीय पोषण सलाहकार अगुआयो कहते हैं कि, एक अध्ययन के मुताबिक यदि पोषाहार में एक अमेरिकी डाॅलर खर्च किया जाता है तो इससे बदले में 18 अमेरिकी डाॅलर का आर्थिक उपार्जन होता है। बच्चों के स्टंटिग के मामलों में व्यापक स्तर पर सुधार के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति एवं साक्ष्यों पर आधारित सुधार की आवश्यकता है।
अगर पेरू का उदाहरण लें तो जिस तरह से वहां स्टंटिंग के आंकड़ों में 50 फीसदी की गिरावट आयी है, उसकी सफलता से विश्व बिरादरी को एक उम्मीद बंधी है। वर्ष 2001 में पेरू में 5 वर्ष से कम उम्र के 3 बच्चों में से एक गंभीर रूप से कुपोषण से ग्रसित थे। वर्ष 2007 आते आते ये आंकड़े लगभग आधे हो गए हैं। लगभग आधा मिलियन बच्चे गंभीर कुपोषण की समस्या से पार पाने में सफल हुए हैं, और वे अपने जीवन को अब बेहतर तरीके से शुरू कर पाने में सक्षम हैं। पेरू को यह सफलता उस पहल के जरिए मिली है जिसमें राजनीतिक नेतृत्व को बच्चों में स्टंटिंग के मामले में गिरावट का वादा करना पड़ा गांव और शहर के बीच की दूरी को कम करने की पहल का समर्थन किया गया। पेरू को मिले इस सफलता में सतत रूप से चलाये गये मीडिया अभियान की अहम भूमिका रही है।
भारतीय ज्ञान,शैक्षणिक डिग्री और जीवन में सफलता को लेकर जागरूक होते हैं। अगुआयो कहते हैं कि पोषण उनकी जीवन की आकांक्षाओं को पूरा करने में अहम भूमिका निभा सकता है। नवजात शिशूओं या बच्चों में स्टंटिंग का प्रभाव जीवन पर्यंत देखा जाता है। बच्चों की शारीरिक एवं तंत्रिका प्रणाली को ऐसा नुकसान पहुंचता है जो अपरिवर्तनीय होता है। ऐसे बच्चों का न केवल शरीर बल्कि दिमाग भी पूरी तरह से विकसित नहीं हो पाता, ऐसे में इनका जीवन अपने आप में अविकसित होता है जो पूरे समाज के विकास में बाधक बन जाता है। बचपन मे उनका पढ़ाई प्रभावित होने के साथ ही, युवा वस्था में ठिगनापन और उनकी आमदनी प्रभावित होती है। यूनिसेफ की बाल विकास एवं पोषण प्रमुख डाॅ सबा मेबाहट्टू कहती हैं कि यह कहना उचित होगा कि हम पोषण के विषय में लोगों को जागरूक कर भारतीय परिवारों के अच्छे पोषण के फायदे के विषय में समझ विकसित कर सकते हैं। वे कहती हैं कि, मीडिया नीतियों के निर्माण, कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने और लोगों के अंदर व्यवहारिक बदलाव लाने में अहम भूमिका अदा कर सकता है। ये सारी चीजें ज्ञान से जुड़ी हैं, और मीडिया इसे कर सकता है।
स्टाप स्टंटिंग इन साउथ एशिया नामक इस विशेष संस्करण के जरिए जच्चा-बच्चा पोषण के विश्वस्तरीय विशेषज्ञों के विचारों को प्रस्तुत किया गया है तथा पोषण एवं सेनिटेशन के बीच सम्बन्ध पर प्रकाश डाला गया है। इसमें दक्षिण एशिया के विशेषज्ञों ने अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भुटान, भारत, नेपाल एवं पाकिस्तान जैसे देशों के संदर्भ में अपने विचार प्रस्तुत किए हैं – गौरतलब है कि ये देश स्टंटिंग के बोझ में सबसे ज़्यादा योगदान देते हैं।
विक्टर एम. अगुआयो (यूनिसेफ) और पुर्णिमा मेनन (आईएफपीआरआई) स्टाप स्टंटिंग इन साउथ एशिया के अतिथि सम्पादक हैं, जो जच्चा-बच्चा पोषण पर आधारित एक अन्तरराष्ट्रीय पत्रिका का विशेष संस्करण है।



