अमरनाथ
घूंघट वाली महिलाएं भी बडे पैमाने पर वोट देती दिखीं। इसके लिए घंटों लाइन में खडे रहने से भी उन्हें परहेज नहीं।
बिहार में पंचायत चुनावों के दौरान बदला बदला सा नजारा रहा। शराबबंदी का असर तो रहा ही, महिलाओं की सचेतन हिस्सेदारी रही। इन चुनावों में कई महिलाएं किसी की पत्नी, भाभी, चाची के रूप में नहीं, अपनी निजी हैसियत से उम्मीदवार बनी और चुनावी मुकाबले में बीस साबित हुईं। यह स्वयं सहायता समूहों और ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम अर्थात जीविका की बदौलत आर्थिक हैसियत बढ़ने और आत्मसम्मान का भाव जगने का नतीजा है।
चुनावों में धनबल और बाहुबल की जोर आजमाइश तो हुई, पर कुल मिलाकार देखें तो इनका प्रभाव बीते विधानसभा चुनावों के मुकाबले कम ही रहा। कई इलाकों में दागी उम्मीदवार भी भाई, भतीजे या दूसरे रिष्तेदारों को सामने करके जोर-आजमाइश करने उतरे। लेकिन मतदाताओं को रुख उनके अनुकूल नहीं लग रहा था। शराबबंदी को धत्ता बताते हुए शराब बांटने की कोशिश भी हुई। टयूब में शराब भरकर उसे नदियों के सहारे नेपाल और उत्तरप्रदेश या झारखंड से मंगाने की कोशिश भी हुई। परन्तु रोक तो शराब पीने पर है और शराब पीने पर सजा का प्रावधान होने से मुफत मिलने पर भी उसका सेवन करने से आम मतदाता कतराते रहे।
धनबल के सहारे चुनाव मैदान में उतरे उम्मीदवारों ने शराब बांटने में नाकाम रहने पर दूसरे रास्ते खोजे। सड़ी हुई गरमी में कोल्ड ड्रिंक्स बांटने का यह नुक्शा मतदान के दिन तक आजमाया गया। बूथों पर लाइनों में लगे मतदाताओं को कोल्ड ड्रिंक्स और शरबत पिलाने का इंतजाम किया गया। कतार में लगे मतदाताओं के लिए पेयजल का इंतजाम तो कायदे से चुनाव अधिकारियों को करना चाहिए, पर इसमें अधिकांष जगहों पर मतदान कर्मचारी कोताही बरतते हैं। कई जगहों पर उन्हें अपने लिए पेयजल का इंतजाम करना भी कठिन होता है। इसलिए प्रत्याशियों ने ठंडा पानी लेकर अपने वर्करों को मुस्तैद रखा।
मतदान में महिलाओं ने बढ चढकर हिस्सा लिया। घूंघट वाली महिलाएं भी बडे पैमाने पर वोट देती दिखीं। इसके लिए घंटों लाइन में खडे रहने से भी उन्हें परहेज नहीं। मतदान प्रतिशत का पूरा विवरण अभी उपलब्ध नहीं है, लेकिन विभिन्न जिलों में जिसतरह महिलाएं कतारों में खडी दिखी, उनका प्रतिशत अधिक होना एकदम निशिचत है। हालांकि पुरुषों के मुकाबले अधिक महिलाओं के वोट देने की परिघटना तो बीते विधानसभा चुनावों में भी दिखी थी। कई जगह महिला मतदाताओं की हिस्सेदारी पांच प्रतिशत तक अधिक रही थी।
सबसे रोचक पंचायत चुनावों में उन मौसमी नेताओं को वोटरों का टका सा जबाब मिलना रहा जो अचानक मेहरबानी दिखाने लगे थे। बूथों के आसपास मंडराते प्रत्याशियों को भला बुरा कहने में भी वोटरों को परहेज नहीं। यह स्वभाविक भी है। कहीं पेयजल का संकट है तो कहीं सडक नहीं। पहले लोग इन बुनियादी समस्याओं के लिए सरकार को जिम्मेवार मानते थे, पर बीते विधानसभा चुनावों के दौरान उन्हें जानकारी मिल गई है कि स्थानीय बुनियादी समस्याओं के समाधान के लिए पंचायती राज संस्थाएं जिम्मेवार हैं और उन्हें इन कामों के लिए केन्द्र प्रायोजित योजनाओं को लागू करने के लिए केन्द्र से सीधे पैसे मिलते हैं। इसमें राज्य सरकारों की कोई भूमिका नहीं होती।
पेयजल, पटवन, स्कूल, अस्पताल, सडक और सफाई ऐसी बुनियादी समस्याएं हैं जिनका निराकरण पंचायती राज संस्थाओं को करना होता है। इसके लिए केन्द्र और राज्य सरकार की कई योजनाएं हैं जिनका कार्यान्वयन ग्राम पंचायत व पंचायत समितियों को करना होता है। इसकी जानकारी होने के बाद मतदाता झूठे वायदों के फेर में फंसते नहीं दिखते। वैसे भी बिहार में चुनाव चाहे किसी पद का हो, निर्णायक जातिगत आधार ही होता है। यह पंचायत चुनाव भी अपवाद नहीं होगा। पर जातीय जकडबंदी से मतदाता कितना निकल पाते हैं, इसे देखना रोचक होगा।


