बेकार हो गई है सोन नहर

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अमरनाथ

सोन नहर प्रणाली बेकार हो गई है. नहर में पानी नहीं है. बिहार सरकार के जल संसाधन विभाग ने सोन नहर पर निर्भर किसानों को सिंचाई के वैकल्पिक उपाय करने के लिए कहा है. करीब ढ़ाई सौ साल पुरानी इस नहर प्रणाली का कमान क्षेत्र लगभग आठ लाख हेक्टयर   में फैला   है जो पुराना शाहाबाद के चार जिले-रोहतास,कैमुर,बक्सर,भोजपुरके अलावा पड़ोस के पटना, अरवल व गया जिले के कुछ इलाके में पडता है.

अग्रेजों ने १८५७ के विद्रोह के बाद इस नहर प्रणाली का पुनरुध्दार कराया था ताकि किसानों को राहत देने के साथ ही सिंचाई कर के तौर पर सरकार को कमाई हो. इसके साथ एक गुप्त अजेंडा भी था कि हजारीबाग के जंगलों से लकडी की ढुलाई सुगम हो और आवश्यकता होनेपर फौजी टूकडियोंकी आवाजाही आसान हो. बतातेहैंकि अंग्रेजी काल मेंयह निर्माण प्रचीन सिंचाई प्रणाली केअवशेष की बुनियाद पर हुआ था जिसका निर्माण शेरशाह सूरी ने कराया था.

मध्यप्रदेश में अमरकंटक की पहाडियों सेनिकली सोन नदी उत्तर प्रदेश की सीमाओंसे होकर बिहार में आती हैऔर गंगा नदी मेदाहिनी ओर से समाहित हो जाती है.ंतीनों राज्यों के बीच सोन नदी के जल के बंटवारा के बारे मे बाणसागर समझौता हैजिसपर िबहार केतत्कालीन मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री   ्प्रकाश चंद्र सेठी और उत्तर प्रदेश केतत्कालीन गवर्नर नेवर्ष १९७६ मेहस्ताक्षर किए थे. बाद मेंसोन की प्रमुख सहायक नदी रिहंद पर उत्तर प्रदेश मेंडैम बन गया, फिर इंद्रपुरी बराज में बाणसागर समझौता के मुताबिक पानी आना घटने लगा.

soan naharइस वर्ष सोन नदी केजलग्रहण क्षेत्र में वर्षाा कम होने से नहर प्रणाली में स्वाभाविक तौर से पानी काफी   कम है. उपरी बहाव क्षेत्र में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की जरूरतेपूरा करनेके बाद बिचले बहाव क्षेत्र में बहुत कम पानी पहुंच पाता है. इसलिए किसानों को सिंचाई के लिए पानी की व्यवस्था दूसरे स्रोतों सेकरने के लिए कह दिया गया है. हालांकि सरकारी तौर पर हाथ खड़ा किए जानेकेपहलेनहर में पानी आनेका इंतजार करनेमें किसानों क रब्बी की फसल काफी हद तक सूख गई है.

जल संसाधन विभाग केमुख्य अभियंता रामेश्वर चौधरी ने कहा कि बाणसागर जलाशय में पानी की कमी का एक कारण रिहंद डैम से करार के मुंताबिक पानी नहीं आना है. रिहंद से करार के मुताबिक आठ हजार क्यूसेक पानी आना चाहिए पर पिछले कई वर्षों से औसत न तीन हजार क्यूपानी आता है जो घटकर कई बार पांच सौ क्यूसेक तक रह जाता है.

बिहार को सोन नहर प्रणाली से खरीफ फसल के दौरान १५ हजार क्यूसेक और रब्बी फसल के दौरान 8 हजार क्यूसेक पानी की जरूरत होती है, पर कम वर्षा और जलग्रहण क्षेत्र में पानी की कमी की वजह से पूरी प्रणाली अभूतपूर्व समस्या में है. सरकार ने रब्बी मौसम के आरंभ में ही आसन्न संकट से लोगों को अगाह किया था. अभी उपलब्ध पानी नहरों में छोडा जा रहा है,पर अधिकतर वितरणियों में आखिरी सिरे तक पानी नहीं पहुंच पा रहा.

किसानों का कहना है कि सरकार ने अगर कदवन में प्रस्तावित जलाशय बनाने में तत्परता दिखाई होती ऐसी स्थिति नहीं आती. कदवन जलाशय का निर्माण इंद्रपुरी बराज से६० किलोमीटर ऊपर बनाना प्रस्तावित है. पर ४० वर्षों से इसकी चर्चा भर हो रही है,कोई काम नहीं हुआ.

soan nahar 1उल्लेखनीय है कि सोन नदी अमरकंटक की पहाडियों से निकलती है जो मध्यपरदेश में पड़ता है.उत्तरप्रदेश की सीमाओं को छूते हुए यह नदी बिहार में गंगा नदी में समाहित हो जाती है. इसकी प्रमुख सहायक नदी रिहंद उत्तर प्रदेश से आती है. रिहंद नदी पर उत्तर प्रदेश मेंडैम बननेकेबाद समस्याएं पैदा होनेलगी. उसकी वजह से सोन नदी में पानी आना घटता गया. सोन के जलग्रहण क्षेत्र मेंवर्षा कम होने पर समस्या उत्पन्न हो जाती हैयह साल अल्पवृष्टि का लगातार तीसरा साल है.

कदवन जलाशय केनिर्माण केबारे में केन्द्रीय स्तर पर बैठक आयोजित हुई थी पर उत्तर प्रदेश सरकार नेअडंगा डाल दिया. उसका कहना था कि कदवन जलाशय बननेसेझारखंड क्षेत्र में अवस्थित ओबरा िवजली प्रकल्प डूब जाएगा. हालांपर नहीं है कि डूब क्षेत्र के बारे में बिहार सरकार के सर्वेक्षण के अनुसार     वन्यजीव वासस्थान प्रभावित नहीं होगा.इसलिए वन विभाग या वन्यजीव बोर्ड सेअनुमति लेनेकी जरूरत नहीं है.

किसान मजदूर संघ के विजय बहादुर सिंह, ने आरोप लगाया कि बिहार की सभी सरकारों ने कदवन जलाशय के मसले की अनदेखी की है. इसवर्ष मानसून के असफल होने से किसान संकट में पड गए हैं.

इस वर्ष पानी की कमी का यह आलम हैकि जहां६००-७०० क्यूसेक पानी आना चाहिए वहां ४०-५० क्यूसेक पानी आ पाता है.पटना जिले के विक्रम क्षेत्र के अभियंता रामजी राम ने बताया कि बराज से मात्र तीन सौ क्यूसेक मिल पा रहा है जिससे नहर के आखिरी छोर तक पानी पहुंचना असंभव है.

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