-
ज्यादातर महिलायें सिंदूर तो इस्तेमाल करती हैं लेकिन पता नहीं चल पाता कि वे केमिकलयुक्त सिंदूर लगा रही हैं या प्राकृतिक सिंदूर
-
प्राकृतिक सिंदूर एक पेड़ से प्राप्त होता है और इसकी खेती (Sindoor Farming) करके कई किसान अच्छा खासा मुनाफ़ा कमा रहे हैं और यह स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है
नयी दिल्ली: भारत में महिलाओं में सिंदूर लगाने का प्रचलन है। विशेष रूप से हिंदू समाज में महिलायें सिंदूर लगाती हैं और इसे सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। लेकिन क्या आपने कभी ये जानने की कोशिश की है कि आखिर ये सिंदूर आता कहां से है। कैसे होती है सिंदूर की खेती और क्यों बढ़ रहा है कि आजकल केमिकल युक्त सिंदूर का प्रचलन जिसकी वजह से न सिर्फ त्वचा संबंधी कई समस्याएं हो सकती हैं बल्कि इनके प्रयोग के जरिए आप चर्मरोग, सिरदर्द, जैसी कई गंभीर बीमारियों को भी निमंत्रण देते हैं। हालांकि जो लोग सजग हैं वे अभी भी केमिकलयुक्त सिंदूर की जगह प्राकृतिक सिंदूर का इस्तेमाल करते हैं।
पेड़ से प्राप्त होता है प्राकृतिक सिंदूर
जाहिर है ये सब बातें जाननी काफी जरूरी है और शायद कम लोगों को ही इस बारे में जानकारी होगी कि प्राकृतिक सिंदूर एक पेड़ से प्राप्त होता है। जिसकी खेती कई किसान (Sindoor Farming) अच्छा खासा मुनाफ़ा भी कमा रहे हैं। उन्हीं में से एक किसान हैं उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के अशोक तपस्वी जो सिंदूर की खेती (Sindoor Farming) करते हैं और प्रत्येक साल अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। उन्होंने पुणे महाराष्ट्र से फतेहपुर आकर अपने पैतृक गांव में 100 एकड़ बंजर खेत को जैविक तकनीक के जरिए उपजाऊ बनाने का कार्य किया।
एक संयोग बन गया प्रयोग
प्रगतिशील किसान अशोक तपस्वी कहते हैं कि 12 साल पहले वे नहीं जानते थे कि सिंदूर पेड़ से प्राप्त होता है। लेकिन महाराष्ट्र से लौटते वक्त उन्हें इस बात की जानकारी तब मिली जब उन्होंने जंगल में जंगल में सिंदूर का पौधा दिखा था. इस एक पौधे से उन्होंने पांच से छ: पौधे तैयार किये। शुरूआत में वो इस बात से अनभिज्ञ थे लेकिन जब पौधों में फूल खिले तब बाद में जब उन्होने इस संबंध में अधिक जानकारी जुटाई तो पता चला की ये सिंदूर का पौधा है। ये जानकारी उनके लिए नई थी और इसी से प्रेरित होकर उन्होंने इसकी खेती शुरू कर दी।
ये भी पढ़ें…
प्राकृतिक सिंदूर की ज्यादा मांग
प्रगतिशील किसान अशोक तपस्वी कहते हैं कि बाजार में मिल रहे मिलावटी केमिकल युक्त सिंदूर की जगह प्राकृतिक सिंदूर की मांग ज्यादा है। यही कारण है कि जो भी किसान प्राकृतिक सिंदूर की खेती करते हैं वे अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। इतना ही नहीं इसके जरिये कई प्रकार के प्रोडक्ट्स भी बनाए जाते हैं। साथ ही यह स्वास्थ्य के लिहाज से भी अच्छा है और जो महिलायें प्राकृतिक सिंदूर का इस्तेमाल करने से महिलाओं का दिमाग भी ठंडा रहता है।
बाजार में बेचकर कमाया अच्छा मुनाफा
प्रकृति प्रेमी अशोक तपस्वी उत्तर प्रदेश के फतेहपुर शहर से महज 5 किलोमीटर की दूरी में कुमकुम के वृक्ष लगाकर किसानों को धनार्जन करने के लिए प्रेरित कर रहे है। उन्होने बताया कि कुमकुम लगाने से महिलाओं का मष्तिस्क ठंडा होने के साथ-साथ उनकी सौंदर्य में निखार पैदा करता है। उनका मानना है कि कुमकुम और चंदन जैसे औषधीय वृक्षों के नाम का लेबल लगाकर मिलावटखोर नकली और बनावटी क्रीम एवं अन्य सौन्दर्य प्रसाधन तैयार कर बाजारों में बेचते है जो मानव जीवन के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है।
अन्य किसानों के लिए प्रेरणा बने अशोक तपस्वी
सिंदूर उत्पादक किसान अशोक तपस्वी का कहना है कि पहले सिंदूर की खेती नहीं होती थी। लेकिन अब उनसे इलाके के अन्य किसान भी प्रेरित हुए हैं। वैसे भी सरकार परंपरागत कृषकों को बागवानी और औषधीय पौधों की खेती करने की प्रेरणा देते रहती है। आजकल किसान अनाज के उत्पादन के साथ ही औषधीय पौधे लगाकर भी अच्छी कमाई कर रहे हैं। इन औषधीय पौधों में एलोवेरा, गुरीच, जैसे कई प्रकार के पौधों की मांग तेजी से बढ़ती जा रही है। इनकी खेती बहुत कम जगह में भी शुरू की जा सकती है।
क्या है परंपरागत मान्यता
सिंदूर के विषय में परंपरागत मान्यता है कि वन प्रवास के दौरान माता सीता इसी फल के पराग को अपनी मांग में लगाती थी। महाबली हनुमान इसी फल को अपने शरीर में लगाते थे। 20 से 25 फुट ऊंचे इस वृक्ष में फली गुच्छ रूप में लगती है। शरद ऋतु में वृक्ष फली से लद जाता है। इसके बीजों को बिना कुछ मिलाए विशुद्ध सिंदूर रोरी कुमकुम की तरह प्रयोग किया जाता है। यद्यपि यह पौधा हिमालय बेल्ट में होता है लेकिन इसे मैदानी क्षेत्रों में भी उगाया जाता है। लगाने के तीन चार साल बाद इसमें फल आने लगते हैं।
सिंदूर के पौधे में है औषधीय गुण
त्वचा रोग के उपचार में इसका प्रमुख रूप से प्रयोग किया जाता है। इससे प्राप्त चंदन मानसिक शांति प्रदान करता है। पीलिया में पत्तियों का क्वाथ बनाया जाता है। पत्तियों को सफेद दाग पर घिसने से रोग ठीक हो जाता है। बिहार के आदिवासी इसका उपयोग सामान्य चर्म रोगों में, कटने, जलने एवं लयूकोडरमा में करते हैं। इसे बीज एवं कलम दोनों से लगा सकते हैं। इसके जनवरी-फरवरी में फूल एवं मार्च में फल आते हैं।
यदि किसान भाई चाहें तो कई किसान मिलकर सिंदूर के खेती का व्यवसायिक उत्पादन कर अधिक मुनाफा कमा सकते हैं। इतना ही नहीं यदि आप बड़े पैमाने पर सिंदूर की खेती नहीं भी करना चाहें तो खुद के इस्तेमाल के लिए घर पर भी इनके पौधे लगा सकते हैं, जिससे घर परिवार की महिलायें भी सुरक्षित रहेंगी और पैसे भी बचेंगे।


