संतोष कुमार सिंह
मोतीहारी: अभी हाल ही में बिहार में पंचायत चुनाव संपन्न हुआ है। बड़ी संख्या में महिला मतदाताओं ने पंचायत चुनाव में मताधिकार का प्रयोग किया। बड़ी संख्या में महिलायें चुनाव जीतकर आयीं भी। लेकिन अक्सर यह कहा जाता है कि ज्यादातर प्रतिनिधि अपने पति के प्रॉक्सी के रूप में चुनाव लड़ रहीं थी, अर्थात मुखिया पति और सरपंच पति जैसी अवधारणाएं बनी रहेंगी। हो सकता है,इसमें सच्चाई हो,लेकिन साथ ही यह भी सही है कि महिलाएं आगे रही हैं। इसका नमूना आप देख सकते हैं तुरकौलिया पूर्वी पंचायत के मुखिया बेबी आलम के रूप में। जिनके पंचायत को ‘ राष्ट्रीय गौरव ग्रामसभा पुरस्कार’ मिला है। आज दिल्ली स्थित बिहार भवन में तुरकौलिया पूर्वी पंचायत के मुखिया बेबी आलम ने पुरस्कार ग्रहण किया। । भारत सरकार के पंचायती राज विभाग के द्वारा उन्हें पुरस्कार दिया गया । पुरस्कार के तौर पर 10 लाख रुपये का चेक, शिल्ड व प्रशस्ति पत्र उन्हे दिया गया। पुरस्कार पाकर प्रसन्न बेबी आलम ने कहा कि इससे उनका हौसला बढ़ा है। पंचायत के ग्रामीणों के वजह से पुरस्कार मिला है। उन्हें न सिर्फ बिहार में बल्कि पूरे देश में इस पंचायत को सबसे बेहतर बनाना है।
क्यों दिया जाता ये पुरस्कार
यह पुरस्कार भारत सरकार के पंचायती राज मंत्रालय द्वारा उन पंचायतों को दिया जाता है, जो ग्राम सभा के माध्यम से सामाजिक-आर्थिक विकास में अग्रणी भूमिका निभाते हैं। राज्य सरकार की अनुशंसा पर हर वर्ष प्रत्येक राज्य के एक-एक पंचायत को यह पुरस्कार दिया जाता है। इसके लिए हर वर्ष केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित तिथि के पहले पंचायतों को ऑनलाइन आवेदन करना होता है। प्रत्येक राज्य सरकार इस पुरस्कार के लिए दो या तीन पंचायतों का चयन कर केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजती है। जिसमें अंतिम रूप से चयनित एक पंचायत को केंद्र सरकार यह पुरस्कार देती है।
पूर्व मुखिया हैं पुरस्कार की असली हकदार
ग्रामीणों की माने तो बेबी आलम को यह पुरस्कार पूर्व मुखिया सुनीता देवी के बेहतर काम की बदौलत प्राप्त हुआ है। वर्ष 2014-15 के इस पुरस्कार के लिए इस पंचायत की तत्कालीन मुखिया सुनीता देवी ने वर्ष 2015 में ही ऑनलाइन आवेदन किया था। इनके कार्यकाल की उपलब्धियों के आधार पर ही पंचायत का चयन इस पुरस्कार के लिए हुआ। मगर इसी बीच पंचायत चुनाव में हार के बाद वे पुरस्कार लेने से वंचित रह गयी।



