बिहार में जल अधिकार कानून की जरूरत-राजेन्द्र सिंह

संतोष कुमार सिंह

बिहार में जल अधिकार कानून की जरूरत है। लोगों के जलाधिकार को जल सुरक्षा में बदला जा सकेगा। यह बात जलपुरुष राजेन्द्र सिंह ने जेपी द्वारा स्थापित ग्राम निर्माण मंडल, सर्वोदय आश्रम में जल-संकल्प यात्रा के समापन के अवसर पर कही। आश्रम नवादा जिला के कौआकोल प्रखंड के सेखोदेवरा गांव में स्थित है। यात्रा का आरंभ चंपारण में गांधीजी द्वारा स्थापित भितिहरवा आश्रम से 15 अप्रैल को हुआ था। चंपारण में गांधीजी का पदार्पण इसी दिन हुआ था।

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राजेन्द्र सिंह ने कहा कि बिहार बाढ़ और सुखाड़ दोनों से तबाह होता है। इन दोनों का इलाज नदियों के जल के बेहतर प्रबंधन में है। नदियों को पुनर्जीवित करना जरूरी है। इसके लिए समुदायों को प्रयास करना होगा। तभी बिहार के हर इलाके को पानीदार बनाया जा सकेगा। आहर-पइन या चेकडैम की खुदाई-सफाई का काम ठेकेदारों को देने का विरोध करते हुए उन्होंने कहा कि ठेकेदार के काम से आमलोग लाभन्वित नहीं होते, केवल सरकारी अफसर और नेता-ठेकेदार को फायदा होता है।

जलपुरुष राजेन्द्र सिंह ने ‘नदियों के अधिकार’ का मामला उठाते हुए कहा कि जल के अधिकार का कानून बने तो मनुष्य के अलावा पशु-पक्षी, खेत और स्वयं नदियों के अधिकार का सम्मान होगा। नदियों का अधिकार है कि वे अपने प्रवाह क्षेत्र में अबाध रूप से प्रवाहित हों। नदियों की विनाश लीला से बचने और नदियों को सूखने से बचाने के लिए उनका यह अधिकार वापस लौटाना होगा। परन्तु दुर्भाग्य है कि नदी क्षेत्र का कोई रिकार्ड नहीं है। नदियों का सीमांकन नहीं हुआ। इसे कराना होगा। इसके बगैर नदियों को बचाना कठिन होगा।

नदी क्षेत्र का विस्तार उसकी मूल धारा से लेकर वहां तक होता है, जहां तक उसका पानी जाता है। इस अति बाढ़प्रवण और बाढ़प्रवण क्षेत्र में कायदे से कोई निर्माण कार्य नहीं होना चाहिए और अगर अनिवार्य हो तो ध्यान रखना चाहिए कि नदी के स्वाभाविक प्रवाह में अड़चन न आए। परन्तु लोगों ने उन क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया है। इसे रोकना और हटाना होगा। नदियों में हो रहे परिवर्तन का अध्ययन करना और इसे चिन्हित करना है कि कौन-सी समस्या प्राकृतिक है और कौन-सी मानवकृत। यह भी सोचना होगा कि नदियों को पुर्नजीवित करने के लिए सचमुच करना क्या है? नदियों पर पहला अधिकार समाज का है, समुदाय का है तो नदी के प्रति समाज का कुछ कर्तव्य भी है। सामूहिक प्रयासों से हम अपने पारंपरिक जलस्रोतों-नदी, तालाब, पोखरा, कुआं, आहर-पइन इत्यादि को जिंदा रख सकते हैं। सभी एक दूसरे के पूरक होते हैं।

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उन्होंने कहा कि दुनिया में सबसे ज्यादा सिल्ट लेकर बहने वाली नदियों को तटबंधों से घेर देने से नदी तल का उंचा होना, धारा का फैलना और बाढ़ आना स्वाभाविक है। पानी जहां बरसे-वहां रोककर रखना, जहां दौड़ने लगे-वहां रोकना और प्रवाह की गति कम करके जाने देना तथा अंत में तेजी से निकल जाने का रास्ता देना, वर्षा जल प्रबंधन का सर्वोत्तम ढंग है। पानी को रोकने, रखने और जाने देने की यह संरचना तालाब होती है जिसके अंगों को राजस्थान में झाल-पाल-ताल कहते हैं। वहां जन सहयोग से ग्यारह हजार झाल-ताल-पाल को पुनर्जीवित किया गया जिससे सात सूखी नदियां फिर से सदानीरा हो गई। दक्षिण बिहार में आहर-पइन यही काम करते हैं। समुदाय के प्रयास के जीवित नदियां समुदाय के अधिकार में होंगी।

सरकार और समाज दोनों को मिलकर साझे भविष्य की चिंता करनी है। हमें समझना होगा कि नदी के प्रति हमारी जिम्मेवारी क्या है? उन्होंने कहा कि नदी को जोड़ने से बाढ़ और सूखाड़ से छुटकारा नहीं मिलेगा। नदी का अधिकार सौंपने से मिलेगा। नदियों के गवर्नेंन्स का काम नदी-पंचायत बनाकर उसे सौंप दिया जाए। उसमें समाज और सरकार दोनों के लोग हों तो नदी विवाद नहीं होगा। नदी जोड़ योजना तो इतने विवाद पैदा कर देगी कि कोई हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट आसानी से फैसला नहीं कर पाएगा। नदियों के विवाद को निपटाने की कोई स्पष्ट कानून नहीं है, अदालतों के सामने स्पष्टता नहीं है। असल में नदियों को बांधे बिना, जोड़े बिना बाढ़ और सुखाड़ से कैसे बचें! इसका नया विज्ञान खोजने की जरूरत है।

भले ही यह जल-संकल्प यात्रा के समापन का कार्यक्रम था, मगर यहां से नवादा की नदियों को बचाने और पुनर्जीवित करने का अभियान आरंभ भी किया गया। नवादा की खुरी नदी से इस अभियान की           शुरूआत हुई। सर्वोदय आश्रम के अध्यक्ष प्रभाकर कुमार की अध्यक्षता में 12 जून को हुए कार्यक्रम का आयोजन आहर पईन बचाओ अभियान के एमपी सिन्हा ने किया था। उन्होंने कहा कि खुरी नदी से आरंभ कर बिहार की सभी नदियों का सीमांकन, जलस्रोतों का संरक्षण, परंपरागत जल संचयन तकनीकों का संरक्षण इत्यादि कार्य इस अभियान के अंतर्गत किया जाएगा। जलपुरुष ने कहा कि जेपी द्वारा स्थापित इस आश्रम से दक्षिण बिहार के सूखाग्रस्त इलाके को पानीदार बनाने का भागीरथ प्रयास आरंभ हुआ है।

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