बुंदेलखंड सूखे का सच..मवेशियों का चारा चर गये अफसर

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मनीष अग्रहरि

देश का बुंदेलखंड क्षेत्र अपने खास भौगोलिक स्थित में होने के कारण हर साल सूखे जैसे कुदरती मार का बुरी तरीके से शिकार होता है इस बार यह कहर और ज्यादा है। इसी कारण यहां किसानो की आत्महत्याए भी खूब हो रहीं है। पिछले दो वर्षो के लगातार भयंकर सूखे के कारण यहां के तकरीबन 85 फीसदी खेत खाली रह गए, जिन खेतो में बोआई भी हुई उसे वहां के मवेशी चर गए।

अब जब कि सभी खेत-पगडंडिया सूख़ चुके है तो वहा के किसान वर्षो से चले आ रहे अन्ना प्रथा अपना चुके है, मगर दूर दूर तक कही चारा न मिल सकने के कारण बहुत सारे पशु दम तोड़ दे रहे है। बदहाली का आलम यह है कि दूधारू पशुओ को भी किसान अब औने पौने दामो में बेच दे रहे है या फिर कोई बिकल्प न होने के कारण अन्ना प्रथा के भरोसे छोड़ दे रहे है, जिससे अंत में पशुओं को दर्दनाक मौत ही मिल रही है।

हालात के मदृदेनजर उत्तर प्रदेश सरकार ने आदेश दिया कि कैंप लगाकर किसानो को अनाज और पशुओं को चारा बांटा जाए मगर हकीकत यह है कि जिन स्थानो पर जितना चारा पहुंचना चाहिए था पहुंच ही नही पाया या बांदा सहित दूसरे हिस्सो में टेंडर द्वारा भूसा खरीद के कारण समय पर भूसा खरीद नही हो सकी है।

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हलाकि विभागीय अफसर कागजी कार्यवाही में पूरा काम कर चुके है जिससे किसी भी चूक से साफ इन्कार कर रहे है। कुल मिलाकर मीडिया के मार्फत आई रिपोर्ट के मुताबिक अन्ना पशुओं का चारा अफसर हजम कर रहे है, नतीजतन बड़ी संख्या में पशु दम तोड़ दे रहे है और देश की अर्थव्वस्था में पलीता लग रहा है।

बुंदेलखंड में अपनी सियासत को चमकाने के लिए नेताओं ने कोई कोर कसर भी नही छोड़ा है मगर इससे कोई अच्छा असर नही पड़ सका है। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के बुन्देलखंड इलाके में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी जहां पदयात्रा कर चुके है तो वही दूसरी ओर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव व मुख्य सचिव आलोक रंजन दो बार दौरा कर चुके है। मगर राहत पैकेज से ज्यादा अब तक कोई ठोस जमीनी काम नही हो सका है।

क्या है अन्ना प्रथाः सूखे में जब पशुपालक पशुओं को चारा- पानी देने में असमर्थ हो जाते है तो उन्हे मजबूरी में छुट्टा छोड़ देते है। इनमे गैर दुधारू पशु होते है मगर हाल के वर्षो में सकट बढ़ जाने से दुधारू पशु भी कुदरत के भरोसे छोड़े जा रहे है।

कहा है बुंदेलखंडः यूपी के दक्षिणी एवं मघ्य प्रदेश के उत्तरी हिस्से में यह क्षेत्र पड़ता है। भौगोलिक रूप से देखे तो पूरा बुन्देलखंड मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश दोनो सूबों के 13 जिलो तक फैला है।जिनमें से उत्तर प्रदेश के सात जिले बांदा, चित्रकूट,महोबा,जालौन,ललितपुर,झांसी, हमीरपुर है। वही दूसरी तरफ दतिया, टीकमगढ़,छतरपुर, पन्ना,सागर, दमोह मघ्य प्रदेश के जिले है।यह क्षेत्र यमुना- बेतवा और केन नदियो के किनारे बसा है।

किस हाल में जानवर और किसानः इस बार भीषण सूखे के चलते तकरीबन 85 फीसदी खेत खाली रह गए, जिन खेतो में बोआई की गई उन्हे पशुओं ने चर डाला। अब जब कि हर जगह चारे की कमी पड़ गई है, तो अन्ना प्रथा जोर पकड़ चुकी है। एक अनुमान के मुताबिक पूरे बुंदेलखंड में एक करोड़ पशुओं पर मुसीबत आ गई है। हालात यह है कि किसान मोटा मुनाफा देने वाले दुधारू पशुओं को भी औने पौने दामो पर बेच दे रहे है। बहुत सारे किसानो के डेयरी में ताले लग चुके है।

क्या है संकट से निबटने को सरकारी मददः उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव सुरेश चंदªा ने वित्तीय वर्ष 2015–2016 में सूखा प्रभावित बुन्देलखंड के सभी सात जनपदो हेतु आपदा मोचक निधि से सात करोड़ रूपए (प्रत्येक जनपद को एक करोड रूपए) जारी किए। इस रकम को पशुओं के लिए चारा और दाना आपूर्ति का प्रावधान है जिससे पशु भूख और प्यास से न मर सके।

सख्त निर्देश है कि इस रकम का उपयोग दूसरे किसी काम में नही हो पाएगा। राहत राशि की पावती और लाभार्थी के पहचान प्रमाण के रूप में रसीद पर स्थानीय लेखपाल व ग्राम प्रधान के हस्ताक्षर कर इसे रिकार्ड में सुरक्षित किया जाए, साथ ही बाॅटी गई रकम ग्राम सभा के नोटिस बोर्ड पर प्रदर्शित की जाए। यह भी निर्देश है कि आपदा समिति लगातार इसकी माॅनीटिरिंग करेगी।

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कहां गई सरकारी मदद: भूख- प्यास के कारण पशु दम न तोड़ सके इसके लिए बुदेलखंड के सातो जिलो में सरकारी प्रयासो से क्या चल रहा है इसकी पोल केवल हम मध्य फरवरी तक हमीरपुर जिले में हुए कामो से अंदाजा लगा सकते है कि बाकी जिलो में भी कमोबेस यही हाल होगा। इस जिले में कुल 25 केन्दª बनाए गए है,इन में से आधा दर्जन केन्दªो में तो भूसा ही नही भेजा गया था। जिन केन्दªो पर भेजा गया वहा पर मौरंग और मिट्टी के सहारे वजन बढ़ाए जाने की शिकायतें लगातार आती रही।

यही नही जिले के ज्यादातर केन्दोª पर तौल से कम भूसा देने और खरीद की रसीद का अधिक दिखाए जाने का आरोप लगातार लगते रहे है। ताज्जुब कि बात तो यह है कि जिले के इंगोहटा पौथिया केन्दª पर भूसा पहुचा ही नही।

सुमेरपुर ब्लाक के मुंडेरा केन्दª पर मंडी समिति में दो सौ जानवर थे। नियमानुसार 12 क्विंटल भूसा पहुंचना था मगर मात्र 2 क्विंटल ही पहुंच पाया था। इसकी शिकायत ग्राम प्रधान संगीता ने जिलाधिकारी से की थी।

सिसोलर ग्राम पंचायत के ग्राम प्रधान विजय शंकर ने आरोप लगाया कि उनके केन्दª पर भूसा लेकर गई गाड़ी के चालक ने 40 क्विंटल की रसीद दिखाई जब कि भूसा 25-30 क्विंटल ही था। इसी प्रकार इचैली केन्दª में 41 क्विंटल 5 किलो की रसीद दिखाई थी लेकिन भूसा 30 क्विंटल ही निकला। इस तरह हुए धांधलियों की एक लंबी फेहरिस्त है यह तो बानगी भर है, जब कि हालात इससे भी ज्यादा खराब है।

उल्लेखनीय है कि बुंदेलखंड राहत पैकेज के नाम पर केंदª सरकार ने भी 3,606 करोड़ रूपये दिए है। वही दूसरी ओर इस बार उत्तर प्रदेश सरकार ने बुंदेलखंड राहत के लिए आगामी विधानसभा चुनावो को देखते हुए लुभावना बजट बनाया है। बंुदेलखंड एवं विंध्य क्षेत्र में सतह आधारित ग्रामीण पेयजल परियोजनाओं के लिए बजट में 500 करोड़ रूपये का प्रावधान किया है। बंुदेलखंड विकास निधि में इजाफा करते हुए 200 करोड़ रूपये का प्रावधान हुआ है। मगर एैसी ही अव्यवस्थाएं बनी रही तो इन रकमों के सही इस्तेमाल से सूरत बदलने की कल्पना भी केवल कोरी ही होगी।

क्या बोले जिम्मेदारः इस संबंध मे हमीरपुर के मुख्य पशुचिकित्साधिकारी जेएन पांडेय इन बातो से पल्ला झाड़ते हुए कहते है कि सेंटरो पर भूसा पहुचा दिया गया है जहा पर भूसा कम होता है वही पर भेजा जा रहा है। इसी तरह झांसी मंडल के अतिरिक्त पशु पालन निदेशक डॉ प्रकाश चन्दª वर्मा ने भूसा धांधली को सिरे से खारिज करते हुए इस प्रतिनिधि से कहते है दरअसल में यह भूसा केवल सीमांत और खेतिहर किसानों के जानवरो के लिए है, बड़े किसानो को इसका लाभ नही मिल पा रहा है, जिसकी वजह से हल्ला मचाया जा रहा है।

bundu 42_n       कैसे होगा सुधारः केंद्र और राज्य सरकारो की तरफ से जो योजनाएं बनाई गई है, केवल वही सही तरीके से लागू हो जाए तो बुंदेलखंड की सूरत बदल सकती है। असल समस्या तो यही है कि योजनाएं तो बन रही है मगर सही तरीके से लागू नही हो पा रही है।पशुओं के चारे और दवाइयों में हेराफेरा करने वाले अधिकारियो और कर्मचारियो से सख्ती से पेश आकर कठोर दंड देना चाहिए जिससे दोबारा एैसी धांधली सुनने को न मिले।

बुंदेलखंड मे सूखा जरूर पड़ता है मगर एक अनुमान के मुताबिक यहां 600 मिलीमीटर वार्षिक बरसात होती है, बरसात के इस पानी को अच्छी तरह से सामुदायिक रूप से संरक्षित करने की कोशिश होनी चाहिए जिससे सतह जल स्तर बेहतर बन सके। सतह जल स्तर बेहतर बनने पर सिंचाई के आभाव मे फसले सूखेगी नही। बुंदेलखंड में सौर उर्जा समेत अन्य कुदरती चीजो की भी भरमार है जिसे सामुदायिक रूप से भरपूर रूप से इस्तेमाल करना चाहिए।

उल्लेखनीय है कि समाजसेवी अन्ना हजारे के गाव रालेगढ़ सिद्वि (महाराष्ट्र) में औसत वार्षिक वर्षा मात्र 150 मिली मीटर ही होती है मगर वहा पर ऊपर बताए गए सुझावो से खुशहाली आ गई तो भला बुंदेलखंड की धरती पर क्यो नही बदहाली दूर हो सकती है। (साभार:फार्म एंड फूड)

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