कोसी के ग्रामीण जनजीवन को रेखांकित करती है ‘रेडियो कोसी’

0
592

PUSHYA-PROFILE-1पुष्यमित्र
कोसी की एक ही कहानी है, जो रेणु जी ने परती परिकथा में लिखी, नागार्जुन ने वरुण के बेटे उपन्यास में लिखी, मायानंद मिश्र ने माटी के लोग सोने की नैया में लिखी, दिनेश मिश्र जी ने दुई पाटन के लोग में लिखी और आज मैंने उसे लिखने की कोशिश की है। इनमें से दिनेश मिश्र जी किताब गैर साहित्यिक कृति है, बांकी लोगों की साहित्यिक कृति है। कुल मिलाकर यह वही पुरानी कहानी ही है।
एक पुराना रोग है। सरकारें बार-बार इसका अंग्रेजी इलाज कराती रही है। मगर हर सर्जरी के बाद इसका रोग बढ़ ही जाता है, क्योंकि इसका इलाज अंग्रेजी डॉक्टरों यानी जल संसाधन विभाग के इंजीनियरों के पास नहीं है। वे हर बार इस चंचल और आजाद तबीयत नदी को बांधने की कोशिश करते हैं, मगर हर कुछेक साल में यह नदी बंधन तोड़ कर आजाद हो जाती है। और इस नासमझी भरे प्रयोग में बार-बार पिस कर कोसी के किनारे बसी लाखों की आबादी तबाह होती रहती है।
तो रेडियो कोसी की भी यही पृष्ठभूमि है, यही कैनवास है। कोसी तटबंध के बीच फंसे 300 गांवों के लोग हैं, जो इस इक्कीसवीं सदी में भी 18वीं सदी जैसे हालात के बीच रहते हैं। वहां न सड़कें हैं, न बिजली, न स्कूल, न अस्पताल, न थाना पुलिस। मतलब सरकार आज भी वहीँ पहुंची ही नहीं है और भूल गयी है कि यह भी कोई दुनिया है और उसके विकास की जिम्मेदारी भी उसी की है।

pusya mitranउस दुनिया में एक लड़का जुगाड़ टेक्निक से एक रेडियो स्टेशन चलाता है। 5 रुपये लेकर लोगों को गाने सुनाता है, उनके छोटे-छोटे विज्ञापन प्रसारित करता है। और उस इलाके में जहां न अख़बार की पहुँच है, न टीवी चलते हैं यह रेडियो स्टेशन वहां के लोगों के जीवन का सहारा बन जाता है। एक नेशनल टीवी चैनल की रिपोर्ट के जरिये उस रेडियो स्टेशन की खबर बाहर आती है और फिर कुछ लोग उस रेडियो स्टेशन को बंद कराने में जुट जाते हैं क्योंकि इसने लाइसेंस नहीं लिया है।
पुलिसिया दबिश शुरू होती है और यह दबिश वहां के लोगों को उत्तेजित कर देती। लोग भड़क जाते हैं कि अब तक सरकार कहाँ थी। आज यह सरकार हमारे मामले में सरकार बनने क्यों आई है। और फिर पुलिस प्रशासन और गांव वालों के बीच चूहे बिल्ली का खेल शुरू होता है। यही इस किताब की कथा है।
मैं आंचलिक कथाकार हूँ। क्योंकि अब तक खुद को कोसी के कैद से ही आजाद नहीं करा पाया। तीन किताबें लिखी। दो फिक्शन और एक रिपोर्ताज। तीनों का विषय कोसी नदी ही है। इस किताब के बाद पहली बार चंपारण सत्याग्रह के विषय को हाथ लगाने की कोशिश कर रहा हूँ। मेरी सोच की सीमा यही है। अभी तक उत्तर बिहार से ही बाहर नहीं निकल पाया हूँ। पत्रकारिता भी बिहार-झारखण्ड की सीमा में बंध कर कर रहा हूँ। और यह कोई छोटा इलाका नहीं है। यूरोप के कई मुल्क इससे काफी छोटे हैं। इस लिहाज से इस बड़े इलाके में खुद को सीमित कर भी लें तो लिखने के लिये कई बड़े विषय हैं। अब चुकी मेरे लिखने की जगह ही उत्तर बिहार की है तो जाहिर है भाषा में वहां के शब्द आते हैं और फिर वह आंचलिक हिंदी बन जाती है, जिसे रेणु ने गढ़ा है।
मैं मूलतः किस्से कहानियों वाला आदमी हूँ। मुझे लगता है कि किसी बात को अगर समझाना हो तो किस्से अधिक कारगर होते हैं। इसलिये खबरें लिखते वक़्त भी मैं कोशिश करता हूँ कि उसमें कोई न कोई किस्सा हो जो लोगों को कन्विंस कर सके। किसी की आपबीती, किसी का अनुभव। आंकड़े और बयानों के साथ अगर खबरों में कोई किस्सा हो तो फिर खबर दिलचस्प बन जाती है। मेरा जोर आम लोगों की लार्जर दैन लाइफ कहानियाँ तलाशने में रहता है। अब देखिये जैसे महावीर सिंह फोगट की कहानी। यह कहानी पहले खबर ही बनी थी, बाद में उस खबर से दंगल फ़िल्म भी बनी। किसी की किताब भी बन सकती थी। मेरे एक मित्र ने रांची में एक रिक्शे वाले की रिपोर्ट लिखी थी जो अपनी पत्नी के कैंसर का इलाज कराने गांव से जमीन बेचकर रांची चला आया था और जब सारे पैसे खर्च हो गये तो वह रिक्शा चलाने लगा ताकि अपनी पत्नी की केमोथेरेपी का खर्च उठा सके। क्या इस न्यूज रिपोर्ट में एक उपन्यास की संभावना नहीं है।

Kosi villageहर पत्रकार को अपने कैरियर में कोई न कोई बहुत बड़ी स्टोरी मिल जाती है। वह उसे अख़बार के छोटे से स्पेस में छाप कर संतुष्ट नहीं होता है। फिर वह उसे किताब की शक्ल देता है। चाहे रिपोर्ताज के रूप में या कहानी-उपन्यास के रूप में या नॉन फिक्शन के रूप में। मेरे कैरियर में भी मुझे कुछ किस्से ऐसे मिले हैं जो मुझे किताब लिखने के लिये प्रेरित करते हैं।
पत्रकारिता के कैरियर में रोज अलग अलग किस्सों से परिचय होता है। मगर कई दफा कुछ किस्से आपको पकड़ लेते हैं। उसे लिख कर ही उससे मुक्ति हासिल की जा सकती है। 2008 की भीषण बाढ़ में मैं कोसी के इलाके में गया था। उस वक़्त मैं इतना परेशान हुआ कि नौकरी छोड़ दी और एक साल तक उसी इलाके में भटकता रहा। फिर दुबारा नौकरी में आया तब भी मन उसी इलाके में भटकता रहा। बार-बार रिपोर्टिंग करने वहीँ जाता था। फिर CSDS से वहां शोध करने के लिये फेलोशिप मिली। उसका भी इस्तेमाल इस मसले को और समझने में किया। फिर फरकिया के नाम से रिपोर्ताज की एक किताब लिखी जो ई बुक बनी है। अब यह किताब उपन्यास के रूप में आई है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here