जिगर मा बड़ी आग है….!

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आलोक रंजन, युवा पत्रकार

बीडी जलाई ले, जिगर से पिया, जिगर मां बड़ी आग है और ये जिगर की आग जैसे—जैसे बीड़ी जलती जाती है..वैसे—वैसे आपके शरीर को जलाती है और जिस पिया से पत्नी जिगर की आग से रास्ते लब के प्यास बुझाने की अपेक्षा करती है, वही बीच रास्ते में उसे छोड़ देता है या फिर आग जलाने के लायक नहीं रहता,और न ही प्यास बुझाने के। तेरा प्यार—प्यार..प्यार हुक्का बार…। हुक्के की परंपरा हमारे यहां नया नहीं है,लेकिन जिस तरह से महानगरों में बियर बार की तरह हुक्का बार खुल रहे हैं,और युवा दिन दोपहर, सरेशाम खुलेआम इस ओर रूख करता है। तो महानगरों में ही क्यों अब तो गांव—गांव सिग्रेट के धुंये को छल्ला बनाके,कॉलर को थोड़ा सा उपर चढ़ाके..युवा घूमते नजर आते है मानो इस गाने को गुनगुनाते ‘ मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया..हर फिक्र को धुयें में उड़ाता चला गया। कहानी यही खत्म नहीं होती गुटके की पिच—पिच..मुंह में रजनी गंधा.. तरहथी पे जान। लेकिन तरहथी भी खाली कहां..अस्सी चुटकी न दे ताल..तब देखो खैनी का हाल..हाल ही क्यों दावा है कि ये बुद्धी भी बढ़ाती है। लेकिन बुद्धि वो भी बढ़ी हुई तब काम आयेगी जब जान बचेगा। आप तो समझ ही गये होंगे कि यहां बात हो रही है तंबाकू की। जिसके हर पैकेट पर लिखा होता है ‘टुबैको किल्स’। लेकिन ध्यान कहा जाता है..। ध्यान तो शायद तब भी न जाये जब सरकार ने तंबाकू उत्पाद के प्रत्येक पैकेट पर तंबाकू की बीमारी का चित्र से 85 फीसदी हिस्से को घेर दिया है। हम बेपरवाह जो ठहरे।

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हमें यह बात स्वीकारने में गुरेज नहीं होना चाहिए कि भारत में पुराने समय से ही तम्बाकू का प्रचलन रहा है. पहले के समय में भी हुक्का-चिल्लम, बीड़ी, खैनी आदि के द्वारा लोग नशा करते रहे हैं, किन्तु आज स्थिति कहीं ज्यादा विस्फोटक हो चुकी है. अब तो जमाना एडवांस हो गया है और एडवांस हो गए हैं नशे करने के तरीके! बीड़ी की जगह सिगरेट ने ले लिया है तो हुक्का और चिल्लम की जगह स्मैक, ड्रग्स ने और खैनी बन गया है गुटखा! वहीं शराब की तो पूछनी ही नहीं है. पहले शराब अमीर लोगों का शौक हुआ करता था तो अब शराब के कई सस्ते वर्जन आम लोगों की दिनचर्या का अहम हिस्सा बन गया है. ये जानते हुए भी कि तम्बाकू एक धीमा जहर है, जो सेवन करने वाले व्यक्ति को धीरे-धीरे करके मौत के मुँह मे धकेलता रहता है, तब भी लोग बेपरवाह हो कर इसका इस्तेमाल किये जा रहे हैं. वैसे तो देश तमाम बीमारियों के कहर से परेशान है, लेकिन इन सब में तम्बाकू से होने वाली बीमारियां और नुकसान अपनी जड़ें और गहरी करती जा रही हैं. लोग जाने-अनजाने या शौकिया तौर पर तम्बाकू उत्पादों का सेवन करना शुरू करते हैं धीरे धीरे शौक लत में परिवर्तित हो जाता है. ‘नशा’ एक ऐसी बीमारी है जो हमें और हमारे समाज को, हमारे देश को तेजी से निगलती जा रही है, लेकिन सबसे बड़ा दुःख ये है की हमारा युवा-वर्ग इसकी चपेट में कहीं बड़े स्तर पर आ चुका है. पहले के समय और आज के समय में यह सबसे बड़ा अंतर है, क्योंकि पहले बुजुर्ग लोग हुक्का-चिल्लम इत्यादि का सेवन करते थे तो आज 15 साल के बच्चों को भी धड़ल्ले से सिगरेट, शराब, यहाँ तक कि शहरों में ‘ड्रग्स’ सेवन करते पाया गया है. ऐसे में देश के भविष्य को लेकर चिंता होनी ही है. आज शहर और गाँवों में पढ़ने खेलने की उम्र में स्कूल और कॉलेज के बच्चे, युवा वर्ग मादक पदार्थों के सेवन के आदी हो गए हैं, लेकिन इसमें सारी गलती बच्चों की ही नहीं है. गौर से देखा जाये तो कुछ हद तक इस स्थिति के जिम्मेदार हम लोग भी हैं जो इस कदर अपने कैरियर को बढ़ाने में मशगुल हैं कि हमें परवाह ही नहीं है कि हमारे बच्चे क्या कर रहे हैं, कहाँ जा रहे हैं, किससे मिल रहे हैं, ये सब जानने की हमें फुर्सत ही नहीं है! बस बच्चों की मांगे पूरी करना ही हम अपनी जिम्मेदारी समझ बैठे हैं. कभी दूसरों की देखा देखी, कभी बुरी संगत में पड़कर, कभी मित्रों के दबाब में, कई बार कम उम्र में खुद को बड़ा दिखाने की चाहत में तो कभी धुएँ के छ्ल्ले उडाने की ललक, कभी फिल्मों मे अपने प्रिय अभिनेता को धूम्रपान करते हुए देखकर तो कभी पारिवारिक माहौल का असर तम्बाकू उत्पादों की लत का प्रमुख कारण बनता है. इसी कड़ी में, टीवी और पोस्टरों में तम्बाकू के विज्ञापन देखकर अधिकांश किशोर धूम्रपान की ओर आकर्षित हो जाते हैं.

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यह भी बेहद दुःख की बात है, भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के कई चर्चित अभिनेता-अभिनेत्री भले ही प्रत्यक्ष रूप से तंबाकू का विज्ञापन न हो,लेकिन मिलते जुलते उत्पादों का विज्ञापन कर सिगरेट, शराब, गुटखा का खुलकर प्रचार करते हैं और सरकारी नियम इस मामले में उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाते हैं. ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित एक ताजा अध्ययन में कहा गया है कि तम्बाकू के विज्ञापन देखने से किशोरों में धूम्रपान शुरू करने का खतरा बढ़ जाता है. शोधकर्ताओं ने पाया है कि 38 प्रतिशत किशोर, तम्बाकू के 10 अतिरिक्त विज्ञापन देखने से धूम्रपान की ओर आकर्षित होते हैं. वहीं गौर करने वाली बात ये भी है कि भारत समेत दुनिया के कई देशों में तम्बाकू विज्ञापनों पर प्रतिबंध है और संचार के किसी भी माध्यम पर तम्बाकू और उससे जुड़े उत्‍पादों का विज्ञापन नहीं दिखाया जा सकता है, तथा फिल्‍मों में भी धूम्रपान या अन्‍य किसी तम्बाकू उत्‍पाद का सेवन करते समय नीचे वैधानिक चेतावनी दिखायी जानी जरूरी है. बावजूद इसके छिपे रूप में और खुलकर तम्बाकू उत्पादों का प्रचार-प्रसार धड़ल्ले से चल रहा है. फिर भी तम्बाकू के फैलते प्रभाव को रोकने में सरकार पूरी तरह से अगर असमर्थ नज़र आती है, तो इसके पीछे उसका नकारापन कहीं ज्यादा जिम्मेदार है. सरकार के नाक के नीचे धड़ल्ले से नशे की सामग्री बेची जा रही है.

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हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने आदेश तो दे दिया है कि तम्बाकू उत्पादों पर 85 प्रतिशत कंटेंट चेतावनी के होंगे, लेकिन चेतावनी तो पहले भी लिखी होती थी तम्बाकू उत्पादों पर! क्या सिर्फ चेतावनी भर से इस मर्ज़ का इलाज किया जा सकता है? कई तम्बाकू निर्माता चेतावनी भी कुछ इस अंदाज में लिखते हैं कि वह ‘विज्ञापन’ ज्यादा दिखता है, खतरा कम! नशे के कारोबार ने देश में अपना बहुत बड़ा बाजार खड़ा कर लिया है और बड़े-बड़े औद्योगिक घराने इसमें शामिल हैं. लेकिन आम जन मानस तक इसकी पहुँच कम तो की ही जा सकती है और अगर ठीक ढंग से इच्छाशक्ति प्रदर्शित की गयी तभी इस जानलेवा जहर से ​मुक्ति पायी जा सकती है।

 

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