विवेक मिश्रा लिखते हैं…..
प्रेमचंद जयंती पर ‘हंस’ के 31 वें वार्षिक आयोजन में ‘लोकतंत्र और राष्ट्रवाद: मीडिया की भूमिका’ विषय पर गोष्ठी में विनीत कुमार, मृणाल पांडे, चन्दन मित्रा, राजदीप सरदेसाई, सईद नक़वी तथा हरवंश मुखिया ने अपने विचार रखे। विनीत और राजदीप ने छद्म राष्ट्रवाद और उसकी दुहाई देते मीडिया पर अपनी बात बहुत साफ़ और दो टूक कही, वहीं सईद नक़वी ने ग्लोबल मीडिया के प्रोवोकेशन को नेशनल लेवल पर राजनीति में भुना लिए जाने की बात को इशारों में कहा। मृणाल पांडे हिंदी मीडिया की दयनीयता की आड़ में छुपकर असली मुद्दे से बचती दिखाई दीं। वहीं चन्दन मित्रा पूरे समय बिखरे-बिखरे और बगलें झांकते दिखाई दिए। कार्यक्रम का बहुत ही सधा हुआ और सटीक संचालन प्रो पुर्षोत्तम अग्रवाल ने किया और कहना होगा कि कोई वक्ता उनके मुखर बीज वक्तव्य से बाहर नहीं निकल सका.. पर कुल मिलाकर एक अच्छी और सार्थक चर्चा रही। अतिथियों का स्वागत संजय सहाय ने और धन्यवाद ज्ञापन रचना यादव ने किया।
आशीष कुमार अंशु लिखते हैं..
आज गया था हंस के आयोजन में। संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से आयोजित इस बार की संगोष्ठी डॉ पुरुषोत्तम अग्रवाल के संचालन में बेहद संतुलित रही। लगातार अच्छे संचालन के अभाव में इस आयोजन की पिछले कई सालों से भद्द पीट रही थी। यह कहते हुए कोई संकोच नहीं कि राजेन्द्र यादव से तमाम असहमतियों के बावजूद उनकी उपस्थिति मात्र से हंस के इस सालाना उत्सव को जो उष्मा मिलती थी, वह बात अब नहीं। आज भारतीय पत्रकारिता की यह दशा क्या हो गई?
वरिष्ट पत्रकार राजदीप के विषय में आशीष लिखते हैं..,ना जाने हंस की संगोष्ठी में जिसका जवाब राजदीप सरदेसाई को देना चाहिए था, उसका जवाब किससे मांग रहे थे।
मेरे पीछे बैठे एक सज्जन ने जरूर जवाब देने का प्रयास किया—
‘क्योंकि आप जैसे पत्रकारिता के शीर्ष पुरुषों ने पत्रकारिता के नाम पर दलाली शुरू कर दी।’
यह टिप्पणी राजदीप तक पहुंच पाती तो जरूर इस साल का आयोजन भी मानीखेज हो जाता।
उमेश चर्तुवेदी लिखते हैं..
हंस कथा मासिक की सालाना गोष्ठी का इस बार का विषय था, लोकतंत्र और राष्ट्रवाद: मीडिया की भूमिका। वक्ताओं की भारीभरकम फौज रही। हर बार की तरह इस बार भी हंस की वैचारिक धारा के प्रतिपक्षी वक्ता चंदन मित्रा को लेकर टोकाटाकी हुई…वे मीडिया के योगदान को याद करते हुए जब बता रहे थे कि मीडिया ने ही बोफोर्स, 2जी, मूंदड़ा कांड का खुलासा किया तो श्रोताओं ने व्यापम का नाम लेना शुरू कर दिया..दिलचस्प यह है कि जब राजदीप सरदेसाई बोल रहे थे तो उनके 22 जुलाई 2008 को किए काम के लिए टोकाटाकी नहीं हुई..उस दिन सांसद रिश्वत कांड का प्रोमो चलाने के बावजूद राजदीप की हिस्सेेदारी और एडिटर इन चीफ वाले चैनल सीएनएन आईबीएन ने खबर ही नहीं दिखाई…श्रोताओं ने उसके बारे में राजदीप को नहीं टोका..
चर्चा राष्ट्रवाद पर हो और हंस का कार्यक्रम हो तो प्रधानमंत्री मोदी और भारतीय जनता पार्टी की आलोचना ना हो, ऐसा हो ही नहीं सकता..कार्यक्रम के संचालक पुरूषोत्तम अग्रवाल ने राजेंद्र माथुर के नवभारत टाइम्स में लिखे 1990 के संपादकीय का उल्लेख करके मोदी पर बिना नाम लिए निशाना साधा। उन्होंने कहा कि तब रथयात्रा निकाल रहे आडवाणी को माथुर साहब ने चेताया था। बहरहाल अब आडवाणी कहां हैं और उनकी रथयात्रा के मैनेजर कहां हैं। पुरूषोत्तम अग्रवाल जी की जानकारी के मुताबिक रथयात्रा के मैनेजर नरेंद्र मोदी थे। पुरूषोत्तम जी को शायद पता नहीं है कि आडवाणी की रथयात्रा के मैनेजर स्वर्ग में हैं…अपनी आत्मकथा मेरा जीवन, मेरा देश में आडवाणी ने खुद स्वीकार किया है कि उनकी रथयात्रा के मैनेजर प्रमोद महाजन थे…
ऐवाने ग़ालिब में प्रेमचंद जयंती के अवसर पर हंस का 31 वां वार्षिक आयोजन संपन्न हुआ। प्रेमचंद खुद को ढूंढ़़ते से नज़र आए।
…किंतु विषय पर जमकर चर्चा हुई। बहस का विषय था “लोकतंत्र और राष्ट्रवाद:मीडिया की भूमिका”
वक्ता भी जमकर बोले -सईद नकवी, मृणाल पांडेय, चंदन मित्रा, हरबंस मुखिया, राजदीप सरदेसाई। संचालक थे पुरुषोत्तम अग्रवाल ।
हरबंस मुखिया के हवाले से विनित कुमार लिखते हैं..चंदन मित्रा ने एनडीटीवी डॉट कॉम पर लिखा कि जेएनयू को बंद कर देना चाहिए, लाल बहादुर शास्त्री संस्थान के प्रशासन को हैंडओवर कर देना चाहिए.
चंदन मित्रा के विषय में वे लिखते हैं कि चंदन ने ये बात शायद इसलिए लिखी है क्योंकि जेएनयू में सवाल किए जाते हैं. पिछले दिनों जेएनयू ने नेशनलिज्म पर सवाल उठाए और इस पर तीस-पैंतीस अलग-अलग लेक्चर हुए.
चंदन मित्रा ने कहा कि मैं एक- दो यूनिवर्सिटी के बारे में नहीं जानता लेकिन मेरे हिसाब से पूरा देश राष्ट्रवादी है। जिस राष्ट्रवाद में लोकतंत्र नहीं है, वो फासीवाद है।
नोट:किसी कारण से जा नहीं सका था तो फेसबुक से मित्रों की टिप्पणी साभार।

