रामबहादुर राय
जो लोग इस देश को बाजारवाद की गिरफ्त से निकालने के लिए उपाय खोज रहे हैं उन्हें एक कहानी से मदद मिल सकती है। यह पंचायत से जुडी लंबी कहानी है। इसका दिलचस्प किस्सा पीवी नरसिंह राव के जमाने में शुरू हुआ। पहले उस सरकार ने बाजारवाद के आगे समर्पण कर दिया। भूमंडलीकरण की ताकतों को मनमर्जी से खेलने का खुला मैदान दे दिया। दो साल बाद उस सरकार ने पंचायत प्रणाली को पूरे देश में लागू करने के लिए संविधान में संsशोधन कराया। यह 73वां संशोधन था। उससे देश में पंचायत प्रणाली की पुरानी मांग पूरी हुई। पंचायत प्रणाली के बारे में बहस आजादी के आंदोलन में ही शुरू हो गई थी। इसके बावजूद संविधान निर्माताओं से एक असावधानी हो गई। वे भूल गए कि पंचायत प्रणाली के लिए व्यवस्था करनी है। उस भूल को सुधारने के लिए समय-समय पर अनेक कदम उठाए गए। उसका लंबा इतिहास है। आखिरकार पीवी नरसिंहा राव को वह श्रेय हासिल हुआ। जो संविधान संशोधन उस सरकार ने पारित करवाया उसकी शुरूआत राजीव गांधी ने की थी। यह गौर करने लायक है कि देश को बाजारवाद का तजुर्बा एक दशक पुराना हो गया है तो पंचायत प्रणाली का जो खट्टा-मिठा अनुभव है वह भी आधा दशक पुराना है।
पंचायत का एक ऐतिहासिक संदर्भ है। कहते हैं कि वैदिक काल में भी पंचायतें थी। उनका स्वतंत्र अस्तित्व था। इसके कुछ प्रमाण वेद की ऋचाओं में हैं। इस पर काफी कुछ सामग्री उपलब्ध है। उससे पता चलता है कि रामायण और महाभारत में पंचायतों का जिक्र आया है। पंचायत की जड़े कितनी पुरानी हैं यह जानने के लिए ये संदर्भ काम के हैं। लेकिन अगर कोई यह खोजना चाहे कि उस दौर में पंचायतें कैसी थी और उनका कामकाज कैसे चलता था, उसका ज्यादा विवरण नहीं मिलता है। कुछ सूत्र मिल जाते हैं। उनसे पंचायत व्यवस्था के बारे में मोटी जानकारी मिलती है। उसके आधार पर एक धारणा बनी हुई है कि हजार साल के अंधेरे काल को देश इस कारण झेल सका कि वहां गांव स्वाधीन और स्वावलंबी थे। पंचायत प्रणाली के कारण वे अपनी स्वाधीनता बनाए रख सके थे। इस बारे में प्रमाणिक तथ्य उपलब्ध हैं। उन तथ्यों को ‘पंचायत और गांव-समाज में तरतीब से रखा गया है। यह पुस्तक पंच परमेष्वर आंदोलन के हिस्से के तौर पर छापी गई है। पंचायत को समग्रता में देखने का यह प्रयास भी आधा दशक पुराना है। चंद्रषेखर प्राण की दृष्टि में यह पुनर्जागरण की राह है।
इस राह पर चलने वालों को पंचायत का इतिहास मालूम होना चाहिए। कुछ बातें कम ही लोगों को पता है। जैसे ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1812 में एक कमेटी बनाई थी। उसे गांव को बारीकी से देखना था। उसकी रिपोर्ट से भारत के गांव की ताकत का पता चलता है। राजा कौन है और उसका क्या होता है, इससे उस जमाने के गांव ज्यादा प्रभावित नहीं होते थे। ऐसा ही एक अध्ययन 1830 में हुआ। लार्ड मेटकाफ ने उस जमाने में पंचायतों और गांवों का अध्ययन किया। वह इस नतीजे पर पहुंचा कि केन्द्रीय सत्ता के परिवर्तन का प्रभाव या दुष्प्रभाव गांव पर नहीं पड़ता था क्योंकि पंचायत प्रणाली मजबूत थी। ये दोनों अध्ययन खास मकसद से कराए गए थे। अंग्रेजों ने अपने कारोबार के रास्ते में स्वालंबी गांव को बाधक माना। जाहिर है कि बाधाओं को पहचानने के लिए ये अध्ययन हुए थे। उसका नतीजा सामने आया। अंग्रेजों ने गांव के मामले में हस्तक्षेप शुरू कर दिए। अभी उसका पूरा ब्यौरा उपलब्ध नहीं है। इतना ही मालूम है कि नए कानून बनाकर अंग्रेजों ने गांव के स्वालंबन और स्वशासन को तोड़ा। इस बारे में इतिहासकार रमेश चंद दत्त प्रामाणिक जानकारी देते हैं कि भारत में अग्रेजी राज के दौरान गांव व्यवस्था ध्वस्त हो गई। इससे गांव स्वावलंबी नहीं रहे। उनके कामकाज में दखल बढ गया। अंग्रेजों के खिलाफ भारत में स्वतंत्रता संग्राम की पहली लड़ाई 1857 में लड़ी गई। उसे अंग्रेजों ने विद्रोह कहा। वास्तव में वह आजादी की लड़ाई थी। इस लडाई में विफलता के बाद जब छानबीन हुई तो पाया गया कि स्वाधीनता की प्रेरणा गांव से निकली थी।
अपनी राज्य व्यवस्था को अधिक मजबूत करने के लिए अंग्रेजों ने जरूरी समझा कि गांव वैसा ही बनें जैसा वे चाहते हैं। उनके लिए भारत के गांव पराधीन ही अच्छे थे। इसकी व्यवस्था 1870 से तेजी से शुरू हुई। 1870 में लार्ड मेयो और 1882 में लार्ड रिपन के प्रस्ताव आए। इनमें तरह-तरह के सुझाव थे। उनका उदेश्य गांव को नियंत्रण में ले आना था। कहने के लिए अंग्रेजों ने वहां मुहावरे अपनाए जिनसे लोग परिचित थे। लेकिन उनका उपयोग कर अंग्रेजों ने गांवों को अपनी मुट्ठी में किया। इसे अगर बारीकी से न देखें तो यह भ्रम होता है कि अंग्रेज भी पंचायत प्रणाली लागू करना चाहते थे। यह भ्रम बनाए रखना अंग्रेजों के लिए जरूरी था एक विकेन्द्रीकरण आयोग बनाया गया था। उसके नाम से लगता है कि उस समय सत्ता के विकेन्द्रीकरण की कोशिश थी। असल में नाम विकेन्द्रीकरण का था और काम ठीक उसके उलटा किया गया। शाही विकेन्द्रीकरण आयोग पर भरपूर अध्ययन होना है। उसकी शुरूआत पंचायत और गांव समाज में की गई है। इससे पता चलता है कि अंग्रेजों ने जो पंचायती राज व्यवस्था बनाई उससे गांव समाज की स्वायत्तता खत्म हो गई। गांव केन्द्रीय सत्ता के गुलाम हो गए।
इस प्रक्रिया में जितने कानून बने उनसे यही लक्ष्य साधा गया। सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट से पंचायतों की स्वायत्तता सबसे अधिक प्रभावित हुई। उससे सीधा हस्तक्षेप संभव हुआ। पंचायतें नौकरशाही की एजेंसी बनकर रह गईं। तब से अब तक पंचायतों के पुनरुद्धार के लिए समय-समय पर जो भी कोशिश हुई हैं वे निष्फल सी रही हैं। अब तक पंचायतें नौकरशाही के चंगुल से बाहर नहीं आ सकी हैं। 73 वें संविधान संशोधन के बाद आशा थी कि पंचायती प्रणाली पटरी पर लौट आएगी। उसका गौरवमय अतीत लौटेगा। यह आशा पूरी नहीं हुई है। इसके कारणों की खोजबीन जारी है। अनेक तरह से खोजा जा रहा है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ?
पंचायत की धारा में हमेशा दो पाट रहे हैं। एक तरफ सत्ता संभालने वाले होते हैं। वे दिखाते हैं कि पंचायत प्रणाली मजबूत की जा रही है। लेकिन पंचायत के बहाने वे अपनी सत्ता को मजबूत करते हैं। दूसरी तरफ पंचायत के माध्यम से आम आदमी की भूमिका को बढाने का प्रयास होता है। यह जो दूसरा स्वरूप है उस पर आजादी की लड़ाई के दौरान महात्मा गांधी ने जोर दिया। ग्राम स्वराज की कल्पना उसमें से ही निकली। महात्मा गांधी ने आजादी की लड़ाई का उसे हिस्सा बनाया। उनकी प्रेरणा से उत्तर प्रदेश में कई जगहों पर पंचायती प्रणाली कायम हुई। खासकर उत्तर प्रदेश की दो रियासतों में ये प्रयोग हुए। लेकिन जब संविधान बन रहा था उस वक्त इसे भुला दिया गया। कहते हैं कि किसी ने महात्मा गांधी को पत्र लिखा। जानकारी दी कि संविधान सभा के एजेंडे पर पंचायत नहीं है। उसे महात्मा गांधी ने हरिजन में छापा। लोगों का उसपर ध्यान गया। डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद ने कोशिश की कि भूल सुधार हो जाए। लेकिन देर हो चुकी थी। इतनी देर हो चुकी थी कि संविधान पूरा बदलना पड़ता। इसलिए रास्ता निकाला गया। नीति निदेशक तत्व में पंचायत को जगह दी गई।
पंचायतें आजादी का प्रतिनिधित्व करती हैं। 1947 में आजादी नहीं आई, सत्ता का हस्तांतरण हुआ । यही वजह थी कि संविधान में पंचायत का किसी को ख्याल नहीं आया। आजादी के बाद जवाहरलाल नेहरू के जमाने में विकास का जो रास्ता चुना गया उसमें भी पंचायतों की भूमिका वैसी नहीं थी जैसी होनी चाहिए। सरकार ने पंचायतों को वहीं भूमिका दी जो कभी अंग्रेजों ने दी थी। सामुदायिक विकास कार्यक्रम का रास्ता सरकार ने चुना था। जवाहरलाल नेहरू को अपने प्रयोगों से कुछ सीखने का अवसर भी था। जब उन्होंने देखा कि सुधार की जरूरत है तो बाकायदा 1956 में एक दिन सामुदायिक विकास के लिए एक मंत्रालय बना दिया। उन दिनों एस के डे इस प्रयोग में लगे थे। उन्हें ही मंत्री बनाकर यह विभाग जवाहरलाल नेहरू ने सौंप दिया। उस दौर में ऐसा लगा कि सरकार आम आदमी को उतना ही सत्ता संपन्न बनाने जा रही है जितना उसे होने का हक है। एक समानांतर प्रयोग भी चला। बलवंत राय मेहता कमेटी की रिपोर्ट आई। उसके आधार पर पंचायत प्रणाली को लागू करने का फैसला किया गया। इन सारे प्रयोगों में जो बात समझने लायक है वह यह है कि सत्ता केन्द्र में थी। उसे ही अधिकार था कि वह आम आदमी को कितनी आजादी देती है। इस तरह के उपायों से जो पंचायत प्रणाली लागू की गई उसे विफल होना ही था। जिस वक्त जवाहरलाल नेहरू यह काम कर रहे थे उस दौर में जेपी जनता के बल पर पंचायत प्रणाली के पुनरोद्धार का आंदोलन चला रहे थे।
जेपी के प्रयासों का कुछ असर पड़ा। लेकिन वास्तविक अर्थों में पंचायत प्रणाली लागू नहीं हो पाई। एक बार फिर जब आपातकाल खत्म हुआ और लोकतंत्र की बहाली हुई उस वक्त जेपी की सलाह पर अशोक मेहता की कमेटी इस बात के लिए बनी कि पंचायत प्रणाली को केन्द्रीय भूमिका दी जाए। जनता पार्टी की सरकार कुछ दिन और अगर रह जाती तो हो सकता था कि यह काम सातवें दशक में ही पूरा हो जाता। राजनीतिक अस्थिरता ने अशोक मेहता कमेटी की रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया। यह एक संयोग मात्र नहीं है कि सत्ता में बैठे हुए लोगों को पंचायत का ख्याल तभी आता है जब वे संकट में होते हैं। पंचायत इस मायने में राम बाण है। कोई भी सत्ताधारी चाहे वह अंग्रेज रहा हो या हिन्दुस्तानी वह पंचायत का इस्तेमाल अपनी लोकप्रियता को बढ़ाने के लिए करता रहा है। इसमें पंचायत संस्था का भला कम होता है। यही एकबार राजीव गांधी ने किया। जब वे बोफ़ोर्स घोटाले में फंसे तो उन्हें पंचायत की याद आई। संविधान के 64वें संशोधन का प्रस्ताव कर उन्होंने देश को दिखाया कि वे सत्ता का विकेन्द्रीकरण चाहते हैं। कम ही लोगों को मालूम है कि राजीव गांधी ने राजनैतिक कारणों से अपने ही संविधान संशोधन को राज्य सभा में पराजित होने दिया ताकि कह सके कि विपक्ष उनके इस बड़े काम में अड़गेबाजी कर रहा है। राजीव गांधी के लिए पंचायत प्रणाली चुनावी हथकंडा था। वहीं रवैया आज भी बना हुआ है। उसमें पहले से ज्यादा गिरावट आ गई है। पंचायत प्रणाली लागू तो हो गई है लेकिन उसे अपनी मंजिल पर पहुंचने में वक्त लगेगा।
(राम बहादुर राय वरिष्ट पत्रकार हैं। वर्तमान में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष हैं। यह लेख उन्होंने 24 नवंबर 2001जनसत्ता में लिखा था जो आज भी प्रासंगिक है)



