न करें नादानी..किसान कदापि न जलाएं धान का डंठल

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पंचायत खबर टोली
मऊ :धान के डंठल जिसे कहीं पराली कहा जाता है तो कहीं पुआल। किसान से लेकर प्रशासन तक के लिए परेशानी का सबब बना हुआ है। एक तरफ रबी के सीजन की भागदौड़ और मजदूरों की किल्लत बीच बड़े किसान हारर्वेस्टर से धान की कटाई करा रहे हैं। भराई से पूर्व जोताई की तेजी में खेतों में पड़े डंठल को वह जला रहे हैं। इसकी वजह से सिर्फ दिल्ली,हरियाणा,पंजाब ही नहीं अपितु देश के अन्य हिस्सों में भी बढ़ते प्रदूशन का खतरा है।

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वैज्ञानिक इसे लेकर कई तरह की चेतावनी दे रहे हैं। उनका कहना है कि ऐसा करना माटी की सेहत के लिए बहुत ही खतरनाक है। कृषि विशेषज्ञों ने ऐसा कदापि नहीं करने की सलाह दिया है। बताया कि आग लगाने के साथ ही मिट्टी उपरी परत के कार्बन जीवांश मरने के साथ ही परत भी प्रभावित होती है। इसका असर रबी के साथ जायद में भी बना रहता है।
जलाने से मिट्टी की उर्वरता होगी प्रभवित
जिला कृषि सलाहकार व केवीके वरिष्ठ वैज्ञानिक डा.एनके सिंह बताते हैं कि खेती की तत्परता में किसानों के इस कदम को नासमझी भरी नादानी कहा जा सकता है। मिट्टी की संरचना में नाइट्रोजन, फास्फोरस, सल्फर, जिंक, पोटाश, मैग्नीज, कोबाल्ट, कापर, कैल्शियम, बोरान, मैग्निशियम, आयरन, सिलिकाल सहित 17 तत्व पाए जाते हैं। पौधों को कार्बन, हाइड्रोजन व आक्सीजन हवा से मिल जाता है। मिट्टी में उर्वरक डालने के बाद रासायनिक अभिक्रिया के सूत्रधार सूक्ष्मजीव ही होते हैं। फसल कटाई के बाद खेत जला देने उपरी परत के सभी मित्र कीट मर जाते हैं। इन अनभिज्ञता से माटी बांझ होती जा रही है। कई सीजन तक लगातार डंठल जलाने की दशा में मिट्टी की उपरी परत की उपजाऊ क्षमता समाप्त प्राप्त हो जाती है। खेती की परंपरागत प्रणाली से इतर आधुनिक तकनीक के प्रयोग से फसल के अवशेष को मिट्टी के लिए वरदान के रुप में बदला जा सकता है।

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अवशेष काे सड़ा बनाए खाद
डा.सिंह बताते हैं कि हार्वेस्टर से कटाई के बाद किसान फसल अवशेष को अमूमन जला देते हैं। इससे मिट्टी की उपरी परत कड़ी होने के साथ सूक्ष्मजीव भी मर जाते हैं। यह दोहरा नुकसान है। फसल अवशेष के दौरान तवा या कल्टीवेटर से मिट्टी की गहरी जुताई के बाद सिंचाई कर यूरिया का छिड़काव करने से यह सड़ जाता है। इससे मिट्टी की उर्वरा क्षमता का विकास होने के साथ सूक्ष्मजीवों का भी विकास होने लगाता है। कुछ वर्षों तक इस प्रक्रिया को अपनाने के बाद मिट्टी को उसके वास्तविक रुप में वापस लौटाया जा सकता है। इस दौरान समय से आर्गेनिक खेती करने से पर मिट्टी और भी क्षमतायुक्त हो जाती है।

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