संतोष कुमार सिंह
नयी दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसद में दिया गया वो भाषण आपको याद होगा जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘‘मनरेगा यूपीए सरकार के विफलताओं का स्मारक है।मनरेगा जारी रहेगी। मेरी राजनीतिक समझ कहती है कि मनरेगा को बंद मत करो। मैं कभी यह गलती नहीं करूंगा।’’ लेकिन साल बीतते ही सरकार की भाषा बदली। मनरेगा के 10 वर्ष पूरा होने पर सरकारी जश्न मना। दावा किया जाने लगा कि मनरेगा से गांव की तस्वीर बदली है। इसके लिए पैसे की कमी आरे नहीं आएगी।
लेकिन नारों और दावों की बीच की हकिकत यह है कि मोदी सरकार के कार्यकाल में मनरेगा वित्त की कमी से गुजर रहा है। गांव, गरीब और बेहतरी के नारों के बावजूद योजना को सुचारू रूप से जारी रखने के लिए ग्रामीण विकास मंत्रालय ने वित्त मंत्रालय से बजटीय आवंटन के अतिरिक्त 10 हजार करोड़ रूपये की मांग रखी है। तभी मनरेगा के जरिए गांव के गरीबों को उनकी जरूरत के हिसाब से रोजगार मुहैया कराया जा सकेगा।
कितना है बजटीय आवंटन
वित्तीय वर्ष 2014-15 में मनरेगा योजना में 36,035 करोड़ का खर्च हुआ था। 2015-16 में खर्च करीब 40 हजार करोड़ तक को छू गया यानी करीब दस फीसदी का इजाफा हुआ। वहीं चालू वित्तिय वर्ष में मनरेगा के लिए 43,499 करोड़ रूपए का आवंटन किया गया,। सूत्रों की माने तो इसमें से 36,134 करोड़ रूपए राज्यों को जारी कर दिये गए हैं। इसके अतिरिक्त 12,581 करोड़ रूपए पिछले वर्ष के बकाया के रूप में जारी किये गये। ग्रामीण विकास मंत्रालय ने इसके अतिरिक्त 10,000 हजार करोड़ रूपये की मांग रखी है।

राज्यों की तरफ से बढ़ी मांग
झारखंड सरकार ने मनरेगा योजना के लिए केंद्र से ज्यादा राशि विमुक्त करने की मांग की थी। पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालिन केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री चौधरी वीरेंद्र सिंह को पत्र लिखकर सूखा प्रभावित झारखंड सूबे में मनरेगा योजना में अधिक से अधिक केंद्रीय सहायता दी जानी चाहिए ताकि गांव-गांव में गरीबों को रोजगार के ज्यादा अवसर मिल सकें। इसके साथ ही अन्य राज्यों में भी सूखे के प्रभाव से मनरेगा योजना के तहत काम की मांग बढ़ी है। जिन राज्यों में सूखा का प्रभाव रहा है वहां तालाब,कुंए, झील आदि के पुर्ननिर्माण,उड़ाही,खुदाई आदि का काम जोरों पर चल रहा है। इन सूखे प्रभावित ईलाकों मेें सूखे की मार से निपटने और अधिक से अधिक लोगों को रोजगार देने के लिए 100 की बजाय कार्य दिवस 150 दिन कर दिए गए हैं। ऐसे में स्वभाविक तौर पर अधिक से अधिक लोगों को रोजगार दिए जा सकेंगे और इसके लिए अतिरिक्त रकम की जरूरत होगी। इसमें कोई दो राय नहीं कि मनरेगा में कई कमियां और खामियां हैं लेकिन ये भी सच है कि जैसे-जैसे समय बीत रहा है, मनरेगा योजना रफ्तार भी पकड़ती जा रही है। ऐसे में यदि सूखे की हालत में मनरेगा के जरिए रोजगार पैदा हो रहे हैं तो निश्चित रूप से ग्रामीण बेरोजगारी पर इसका असर होगा। गांवो से पलायन कम करने में यह योजना काफी मददगार साबित होगी। उन्हें अतिरिक्त आय मिलेगी। हालांकि आरोप यह लगाया गया था कि इस योजना के तहत केवल गड्ढे ही खोदे जा रहे हैं। हालांकि ज्यां द्रेज ने इस पर आपत्ति जताते हुए अपने एक लेख में लिखा है कि उऩ्होंने मनरेगा के तहत सैकड़ों काम देखे हैं लेकिन एक भी ऐसा मामला याद नहीं आ रहा है जो गड्ढे खोदने और उन्हें भरने से मिलता-जुलता हो। हालांकि ज्यां द्रेज ये जरूर मानते हैं कि मनरेगा में कुछ बेवजह काम भी उन्होंने देखे हैं लेकिन इसे एकदम फिजूल कार्यक्रम कहना ठीक नहीं होगा। मनरेगा में स्थाई कार्य जैसे जल संरक्षण, भूमि सुधार के साथ ही प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण जैसे बांध, नहर, तालाब आदि की खुदाई हो रही है।
नकद भुगतान से बदल रही तस्वीर
मनरेगा के 10 साल पूरा होने के मौके पर केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री चौधरी वीरेंद्र सिंह ने दावा किया था मजदूरी का भुगतान अब 24 घंटे के भीतर करने की तैयारी है। 1 अप्रैल 2016 से मनरेगा में मजदूरों को भुगतान डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) के जरिए सीधे बैंक खातों में होगा। डीबीटी के जरिए भुगतान के लिए इलेक्ट्रॉनिक फंड मैनेजमेंट सिस्टर का प्रारूप भी तैयार किया गया है। इसके तहत मजदूरों को उनकी मजदूरी का भुगतान 24 घंटे के अंदर मिल जाया करेगा। फिलहाल 94 फीसदी मजदूरों का मेहनताना बैंक या डाकघर के खातों में जमा होता है, 6 फीसदी लोगों को अभी भी नकद भुगतान होता है। इस दिशा में तेजी से कदम बढ़ाने की वजह से एक तरफ भ्रष्टाचार में कमी आएगी, वहीं लोगों को मेहनताना समय से मिलने से योजना के प्रति उनकी रूची में बढ़ोतरी होगी।

