स्वामी अग्निवेश
नया वर्ष नये वादों और उम्मीदों के साथ प्रारम्भ हो चुका है। विश्व के अन्य देशों के साथ-साथ सम्पूर्ण भारतवर्ष नये वर्ष के उत्सव में डूबा हुआ है। भारत में अनेक तरह के त्योहार मनाए जाते हैं। इनमें से कुछ परम्परा आधारित तो कुछ व्यवस्था आधारित होते हैं। पंचायत का चुनाव व्यवस्था आधारित त्योहार है, जो प्रत्येक पांच वर्ष में बड़ी धूमधाम से पंचवर्षीय उम्मीदों, वादों और कसमों के साथ मनाया जाता है।
हरियाणा प्रदेश के सन्दर्भ में कहें तो यह नववर्ष के साथ-साथ पंचायती नववर्ष की शुरुआत का समय भी है। इसकी तैयारी भी बड़े जोरो-शोरो से चल रही है। पिछले दिनों हरियाणा के अभयपुर गांव में कड़ाके की ठंड में पंचायत चुनाव की तपिश महसूस की। थोड़ी देर के लिए उस उत्सव भरे माहौल में आनंदित हो जाने के बाद अगले पल ही चिन्ता होने लगी। चिन्ता के कारणों की बात की जाये तो बड़े-बड़े होर्डिंग्स, पोस्टरों, बैनरों में धन की बर्बादी, लाउड स्पीकर की कानफोड़ू व फूहड़ गीत-संगीत की आवाजों से विद्यार्थियों की पढ़ाई में हो रहे व्यवधान, बीमारों, राहगीरों की परेशानियों और सबसे बढ़कर प्रदूषण को बढ़ाने में उनके योगदान से है। कमोबेश यह सब पिछले दो महीने से चल रहा है। भले ही सरकार के पंचायत चुनाव संबंधी संशोधनों से उपजे विवाद के कारण चुनाव स्थगित हो गया था पर प्रचार-प्रसार बदस्तूर जारी रहा।
इस सन्दर्भ में एक उम्मीदवार का सीधा-सा जवाब था-के फरक पड़े सै स्वामी जी, चुनाव तो होणा ही है, होण दो प्रचार, मन्ने चुनाव खातिर एक करोड़ रुपया काड रखै सैं, खर्च भी होण चाहिए। उसके जवाब को सुनकर अवाक रह गया और सोचने लगा कि आपसी समझ व सहमति से चुने जाने वाले ग्राम प्रमुख के लिए इतने पैसों की क्या आवश्यकता? दूसरी बात, जो व्यक्ति इतने पैसे खर्च कर रहा है तो वह वसूलेगा भी उसी अनुपात में। ग्राम प्रमुख का चयन तो गांव वाले रोजमर्रा के अनुभव के आधार पर, उम्मीदवार की योग्यता व कार्य करने की क्षमता आदि कसौटियों के आधार पर करते हैं। विडंबना यह है कि जिस तरह हमारी राष्ट्रीय राजनीति में क्षरण देखने को मिलता है, उसका असर गांव की पंचायत पर भी हुआ है। अब लोग समाज सेवा-ग्राम सेवा से अधिक स्वयं की सेवा पर ध्यान देने लगे हैं। शायद तभी तो पूंजीवादी हथकंडे अपनाए जाने लगे हैं, मतदाताओं को लुभाने के लिए अथवा खरीदने के लिए कहूं तो गलत न होगा, और इन पूंजीवादी हथकंडों में सबसे खतरनाक व घिनौना तरीका है शराब का प्रयोग। शराब व्यक्तिगत तौर पर उम्मीदवारों को ग्राम प्रमुख तो बनाने में योगदान करती है, किन्तु सम्पूर्ण ग्राम के विनाश का जो दुष्चक्र प्रारम्भ होता है, उसकी कोई भरपाई नहीं। यह व्यक्तिगत तौर से शरीर विनाश से प्रारम्भ हो परिवार, नातेदारी व समाज, सभी को तोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। विशेषतौर पर शराब बहन-बेटियों व महिलाओं के लिए तो विष के समान है।
उदाहरण के रूप में देखें तो छेड़खानी व बलात्कार की बढ़ती घटनाओं के लिए शराब व नशे की अन्य वस्तुएं ही अधिक जिम्मेदार हैं। ग्रामीण परिवारों में नशे में धुत पति द्वारा पत्नी से मारपीट, विवाहिताओं की हत्या और अन्य अपराधों का जन्म होता है। नशे के कारण परिवार की क्षति तो भारत के अखबारों, टीवी चैनलों में रोजमर्रा की खबरें हैं और हम सब इतने सहज हो गये हैं कि इन खबरों पर ध्यान देना समय बर्बाद करना समझते हैं।
हरियाणा की स्त्रियों, बहन-बेटियों तथा समझदार नागरिकों के लिए पंचायत का चुनाव नववर्ष पर मिला सबसे अच्छा अवसर है, इस बुराई को जड़ से समाप्त करने के लिए। यही वो समय है जब सम्पूर्ण ग्रामवासी विशेषकर महिलाएं अपने मत का अधिकतम सदुपयोग कर इस बुराई को जड़ से मिटाकर सुनहरे भविष्य की नीव रख सकते हैं, साथ ही धनवानों को नकार कर राजनीति को व्यवसाय बनने से रोक सकते हैं। पिछले दिनों बिहार की महिलाओं ने नीतीश कुमार के नशाबंदी के लिखित आश्वासन के बाद ही उन्हें भारी मतों से विजयी बनाया जिसकी राजनीतिक पंडितों को उम्मीद ही नहीं थी। मुख्यमंत्री नीतीश बधाई के पात्र हैं जो उन्होंने महिलाओं, बहन-बेटियों से किया हुआ अपना वादा निभाया। समय आ गया है एक नयी क्रांति की शुरुआत का, उस प्रदेश से जहां भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के माध्यम से कर्म का उपदेश दिया। पानीपत के मैदान से जहां इतिहास के कई अध्याय लिखे गये।
उम्मीद है हरियाणा भूमि से, यहां के निवासियों से कि वे नशामुक्त पंचायत बनाने का संकल्प लें और उसी उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करें जो नशामुक्त गांव बनाने का लिखित आश्वासन दे। साथ ही साथ प्रतिनिधि मनरेगा से भ्रष्टाचार समाप्त करने, मज़दूरों के हितों की रक्षा का वादा करे। सामाजिक सद्भाव तथा समानता व सह-अस्तित्व में विश्वास करने वाला हो। पंचायत चुनाव के माध्यम से नशामुक्त पंचायत बनाने की यह छोटी सी शुरुआत सम्पूर्ण देश को नशामुक्त-भयमुक्त बनाने में मील का पत्थर साबित होगी। यह अगले पांच वर्षों के लिए गांव की स्त्रियों, बहन-बेटियों के लिए नववर्ष का अनमोल उपहार भी होगा। (साभार:दैनिक ट्रिब्यून)
