प्रोफेसर बद्री नारायण
जवाहरलाल नेहरू विशवविद्यालय
रुझान तकरीबन सभी जगह एक जैसे हैं। पिछले दिनों मध्यप्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश ,हिमाचल प्रदेश वगैरह में पंचायत चुनाव हुए हैं। तीन स्तरीय पंचायत और स्थानीय निकायों के चुनावों में तकरीबन सभी जगह इन चुनावों के नतीजों दो प्रवृत्तियां उभरती दिख रही हैं। एक तो गांवों-कस्बों के चुनावों में भी अब विधानसभा चुनावों के तर्ज पर ही पैसे और ताकत काखेल चलने लगा है, कम से कम पहले के मुकाबले यह खेल अब बडे़ पैमाने पर होने लगा है। इन्हीं का नतीजा है कि हिंसा भी बढ़ी है जो चुनाव की प्रक्रिया में भी दिखती है और परिणाम आने के बाद भी। दूसरा, महिलाओं की भागीदारी बढी है और यह सिर्फ वोट डालने व आरक्षित सीटों पर चुनाव लड़ने तक सीमित नहीं है। वे बडी संख्या में चुनी जा रही हैं, उन सीटों पर भी जो उनके लिए आरक्षित नहीं है। उपर से देखें तो इन प्रवृत्तियों में एक अंतर्विरोध दिखाई देता है। लेकिन भारत का लोकतंत्र में ऐसे अंतर्विरोध दिखाई देता है। जहां एक तरफ शक्तिवान सबल हो रहे हैं, तो धीरे धीरे ही सही, निर्बलों में राजनीतिक चेतना जग रही है।
अभी हाल में उत्तर प्रदेष में ग्राम पंचायत चुनाव के नतीजे आए हैं। इस पंचायत चुनाव में बड़े पैमाने पर शक्तिवान और सत्ता से जुड़े लोगों की जीत हुई है। विजयी लोगों में ज्यादातर मंत्रियों, विधायकों के रिश्तेदार और रसूखदार लोग हैं। उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी सरकार के कैबिनेट मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति के भतीजे, मंत्री महबूब अली की भाभी, सीतापुर के विधायक झीन बाबू की भाभी, आजमगढ़ के रहने वाले सपा सरकार के शक्तिशाली कैबिनेट मंत्री बलराम यादव के भाई, डीजीपी जगमोहन यादव की भाभी, बसपा के प्रदेश अध्यक्ष राम अचल राजभर के पुत्र, संजय राजभर की पत्नी जैसे उम्मीदवारों की इसमें जीत हुई है। जब पंचायती राज एक्ट बना था तो इसकी मूल आत्मा इस उम्मीद पर केन्द्रीत थीकि इस एक्ट से एक तो सत्ता का विस्तार कमजोर और निर्बल तबकों तक होगा,और दूसरा इसके जरिए लोकतंत्र में निर्बल लोगों की सहभागिता बढ़ेगी। लेकिन अभी जो दिखाई दे रहा है, उसमें लगता है कि ग्रामीण क्षेत्र के शक्तिमान और आभिजात्य लोगों ने सत्ता विस्तार की इस प्रक्रिया को भीअपने कब्जे में कर लिया है। मंत्रियों, सरकारी अधिकारियों और शक्तिवानों का जो तबका सत्ता-संस्थानों में उच्च स्तर पर बैठा है, वहीं आधार तल पर सत्ता के प्रसार की प्रक्रिया व उनके संसाधनों को भी अपने कब्जे में लेने की कोशिश में जुट गया है। बेशक इससे ‘ग्राम स्वशासन या स्थानीय स्वराज की मूल भावनाओं पर प्रष्नचिन्ह लग गया है, पर हकीकत यही है। यह देखने में आ रहा है कि भारतीय समाज में लोकतंत्र के प्रसार के साथ हिंसा और भ्रष्टाचार की प्रवृत्तियों का भी प्रसार हो रहा है। सत्ता का विकेन्द्रीकरण तो हो रहा है,मगर इसके साथ भ्रष्टाचार का भी विकेन्द्रीकरण और फैलाव हो रहा है। ग्राम पंचायतों को पंचायती राज ऐक्ट ने महत्वपूर्ण वित्तीय शक्तियां दी हैं। सरकार अपने संसाधनों के एक महत्वपूर्ण भाग का वितरण आधार तल पर पंचायत प्रधानों के माध्यम से करती है। छोटी से छोटी ग्राम सभा में भी कम से कम 20 लाख रुपया खर्च करने के लिए आता है। बड़ी ग्राम सभाओं में यह राषि 50 लाख रुपए तक हो जाती है। यह पैसा प्रधान के खाते में सीधे आता है। इसके कारण लोकतंत्र की संभावना के साथ भ्रष्टाचार की नई आशंका भी खुली है। इसीलिए ग्राम पंचायतों के चुनाव में न सिर्फ गलाकाट स्पर्धा दिखने लगी है, बल्कि यह लगातार बढ़ भी रही है। कहा जाता है कि इस बार उत्तरप्रदेश के पंचायत चुनाव में प्रधान पद के बहुत से उम्मीदवारों ने पांच लाख रुपए या उससे ज्यादा की रकम बहाई है। कुछ जगह से तो हर एक वोट के लिए 500-1500 रुपए खर्च करने की खबरें तक आई हैं। किसी जगह चांदी के सिक्के बांटे गए तो कहीं मीट की दुकान से मीट का फ्री वितरण हुआ। शराब बाटने की खबरें तो अब पुरानी हो चुकी हैं।
लेकिन इसी बीच एक अच्छी बात यह हुई है कि इस चुनाव में महिलाएं बड़ी संख्या में प्रधान पद के लिए चुनी गई हैं। अभी तक प्रधानी के चुनाव में पुरुर्षो का आधिपत्य रहा है। इस बार उत्तर प्रदेश में प्रधानी का पर्चा भरने वाली महिलाओं का प्रतिशत 44.79 था, जिसमें 43.86 प्रतिशत ने चुनाव जीता। यानी 33 प्रतिशत महिला सुरक्षित क्षेत्र के अलावा अतिरिक्त महिलाओं में 10 प्रतिशत पुरुष या सामान्य क्षेत्र में भी जीत हासिल की है। इतना ही नहीं, मुस्लिम बहुल जिलों में भी मुस्लिम महिलाओं ने पंचायत चुनाव में शिरकत कर विजय हासिल की है। ऐसे जिलों में से संभल में 54.5 प्रतिशत, रामपुर में 54.4 प्रतिशत, मुरादाबाद में 51 प्रतिशत और बदायूं में 50.5 प्रतिशत महिलाएं विजयी हुई हैं। ये आंकडे निचले स्तर के भारतीय लोकतंत्र की एक अलग कहानी कह रहे हैं। बावजूद इसके कि इन विजयी महिलाओं में ज्यादातर पूर्व प्रधान की पत्नी, विधायक की भाभी, मंत्रियों की पत्नी, जिला पंचायत सदस्य की चाची, अधिकारियों की बुआ आदि ही हैं। अब देखने वाली बात यह है कि पुरुष सत्ता वाले परिवार और समाज में ये महिलाएं कैसे अपने पतियों को प्रधान-पति बनने से रोक पाती हैं, कैसे परिवार के पिता, भाई, पति से सम्यक संवाद रखते हुए भी वे अपने निर्णय से विकास को निर्बलों व गरीबों तक पहुंचा पाती हैं? प्रधान बनने वाली इन महिलाओं में ज्यादातर थोड़ी पढ़ी –लिखी, अर्द्ध शिक्षित या अशिक्षित भी हैं।
यानी स्थिति लगभग वही है, जो पुरुष उम्मीदवारों की है। इसलिए पुरुष प्रतिनिधियों की तरह ही इनके मामले में भी डर यही है कि अर्द्धशिक्षित और अशिक्षित महिलाएं अपनी प्रशासकीय लोकतांत्रिक शक्ति खो सकती है। इस प्रक्रिया में कुछ शोषण का शिकार भी हो सकती हैं। दिलचस्प बात है कि इनमें से ही कुछ महिलाएं न सिर्फ शिक्षित हैं, बल्कि कुछ के पास तो एमबीए और पीएचडी जैसी डिग्रियां भी मौजूद हैं। कुछ ऐसी भी हैं जिनमें स्वाभाविक नेतृत्व क्षमता है। इससे भी बड़ी बात यह है कि महिलाओं का सार्वजनिक जीवन में इस तरह सक्रिय होना बाकी महिलाओं को नए रोल माॅडल तो देगा ही।
बहरहाल, भारतीय लोकतंत्र के प्रसार का रास्ता काफी उलझन भरा और जटिल है।एक तरफ लोकतांत्रिक नैतिकता है तो दूसरी तरफ व्यावहारिक राजनीतिक दबाव। एक ओर निर्बल तक पहुंचने का लक्ष्य है तो दूसरी तरफ शक्तिवानों का लगातार लोकतांत्रिक स्पेस में सबल होते जाना। एक ओर जनतंत्र के साथ राजनीतिक चेतना का प्रसार है, तो दूसरी ओर हिंसा और भ्रष्टाचार का आधार तल की जनतांत्रिक प्रक्रियाओं में फैलते जाना। इन्हीं अंतर्विरोधों के बीच से भारतीय लोकतंत्र को आगे बढाना और जड़े जमाने का रास्ता बनाना है। (सभार: दैनिक हिन्दुस्तान )

