वोट मांगे मुखिया..मंगरूआ मांगे महकौआ…

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संतोष कुमार सिंह

 

ए कोला,ओ कोला,ई फ्रूट जूस, उ तरकुल जूस लेकिन महकौवा बिना सब सूना। मुखिया जी महकौआ और गमकौआ के महत्व को बखूबी समझते हैं मुखिया जी के भाई बंद चुनाव के ​दो तीन दिन पहले से ही इस जुगार में लगे हुए है कि चुनाव के प​हली रात शराबबंदी से कैसे पार पाया जाए। हालांकि उ इंतजाम किए हैं ऐप्सी कोला,पेप्सी कोला का लेकिन दिन रात मटठा सुंघ के रहने वाला मंगरूआ भी कल राते से महकौआ के लिए जिद पर अड़ गया। वोट चाहे जो ले..मंगरूआ को गला तर चाहिए. ।. मुखिया जी लाख समझाने की कोशिश किये कि मंगरू अपने भी जेल जाओगे और लगे हांथो हमको भी तरीपार कराओगे। लेकिन मंगरू को पता है आज वोट चाहिए मुखिया जी इसलिए आज वो कुछ भी मांग सकता है। माने सौ खून माफ।

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जी हां पंचायत चुनाव में मंगरू के जिद के आगे मुखिया जी कि एक न चली। जिन ईलाकों में बोर्डर पार से शराब लाया जा सकता था, वहां पुलिस से महकमे से बचते—बचाते पहले ही शराब का इंतजाम कर लिया गया था। मंगरू ने आज जी भर के गला तर किया और पूरे परिवार के लिए गांधी भी वसूला। कहीं कहीं तो एक गांधी,दूई गांधी,कई कई गांधी चले। जिसकी जैसेी अवकात माने बारगेनिंग पावर उसकी वैसी सेवा।

बोर्डर पर जो पंचायत हैं वहां तो गला तर हुआ ही,लेकिन परेशानी बोर्डर से दूर गांवों की थी। मंगरू तो महकौआ मांगेगा ही..इस आशंका से चिंता में मुखिया जी और उनके लोग पहिलेहीं फौजी भाईयों के दरवाजे पर डेरा डाल दिये थे, ताकि दारूबंदी के इस दौर में गला तर करने वास्ते कैंटीन की दारू काम आ सके। अचानक गांव और पंचायत के कार्यरत फौजिओं, और सेवानिवृत फौजियों की पूछ बढ़ गयी है। प्रत्याशियों द्वारा संबंधों की दुहाई देते हुए और उनके द्वारा किए देश सेवा और उसके एवज में मिलने वाले दारू के कोटे को मुखिया जी भले ही चुनाव बाद मान न दें लेकिन फिल वक्त तो दारू के बोतल में मुखिया प्रत्याशियों को वोट का रास्ता दिख रहा है। मंगरूआ की जिद और लोकतंत्र के प्रति उसकी बेसुधी की सोच को ई दारू आसान करने में कामयाब रहा है। हरेक गांव में बड़ी संख्या में फौजियों को मिलने वाली दारू ने इस चुनाव में काफी काम किया। मंगरूआ भी खुश है कि पह​ली बार पकियवा महकौआ मिला।

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वैसे भी सरकार भले ही दारू के दुकान का लाईसेंस रद्द कर दे, और पकड़े जाने पर कारावास और फाईन लगाये लेकिन ऐन चुनाव वक्त फौजी भाईयों के दारू ने मुखिया जी की लाज रख ली। न तो इस दारू में मिलावट का खतरा,और न मिलावटी शराब से मरने का भय। हां ये बात और है कि फौजी दारू की कीमत बोतल पर दिए गये कीमत से कई गुणा चुकानी पड़ी, क्योकि इस दारू पर विरोधियों की भी नजर थी, वो भला हो फौजी भाई का कि हमारे रिश्तेदार निकले। आखिर अपना ही बुरे वक्त में अपनों के काम आता है।

हो भी क्यों न मंगरूआ पहले ही चौपाल पर ई चर्चा सुन लिया था कि और चर्चा क्या अब इसमें छुपा क्या है तभी तो पत्रकार निराला पंचायत पर लिखे गये अपने रिपोर्ट में कहि चुके हैं — इस बार यह हल्ला मच गया है कि केंद्र की सरकार अब सीधे पंचायतों को पैसा देगी, बीच में राज्य सरकार नहीं होगी. यह हवा फैल जाने से जो चुनाव लड़ रहे हैं, वे जान रहे हैं कि इस बार जो मुखिया बनेगा वह करोड़ों का खेल करेगा और यह बात जनता तक भी फैल गई है, इसलिए जनता भी जान रही है कि मुखिया बन जाने के बाद तो प्रत्याशी पकड़ में आएंगे नहीं इसलिए जो वसूल किया जा सकता है उसे अभी से ही वसूलने की कोशिश कर रहे हैं.’ वे बताते हैं, ‘मैंने पहली बार देखा कि होली में मुखिया पद के प्रत्याशियों द्वारा अंग्रेजी शराब और पांच-पांच सौ रुपये का नोट घर-घर भिजवाया गया.’

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