राजगोपाल पी.व्ही.
पिछले कुछ दिनों से मैं इस कोशिश में लगा हूँ कि कुछ छोटे-छोटे देशों से और उस देश में चलने वाली गतिविधियों से अपनी समझ बनाऊँ। इसी सिलसिले में मैंने सेंट्रल अमेरिका के निकारागुआ का भ्रमण किया। निकारागुआ में सीखने लायक बहुत कुछ है, लेकिन सबसे अच्छी बात यही है कि देश के भू भाग का 53 प्रतिशत हिस्सा स्वतंत्र संचालन के लिये आदिवासियों के हाथ में छोड़ दिया गया है। इस स्वतंत्र भाग में निकारागुआ सरकार की दखलंदाजी बहुत कम है। ग्राम स्वायत्तता की बात हम लोगों ने सुनी है, लेकिन अगर देखना हो, तो इस क्षेत्र का भ्रमण करना होगा। हर गाँव अपने ढंग से स्वतंत्र है, और जमीन व्यक्तिगत न होकर समाज की है। न्याय व्यवस्था गाँव के हाथ में है, इन सब बिन्दुओं पर विस्तार से लिखा जा सकता है क्योंकि हरेक बिन्दू अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है, और समझने लायक भी है। हम तो भारत में बहुत वर्षों से आदिवासी स्वशासन की बात कह रहे है। छठवीं और पांचवीं अनुसूची का कानून भी बन गया है लेकिन हम सब जानते हैं। इस कार्यक्रम के रहते हुए भी आदिवासियों के साथ क्या बदसलूकी की जा रही है। निकारागुआ सरकार ने जो कदम उठाया है वैसा कदम आदिवासियों के संदर्भ में भारत को भी उठाना चाहिए। जब तक स्वशासन का अधिकार नहीं होगा तब तक आदिवासी की बरबादी को रोका नहीं जा सकता। पिछले दिनों में नियमगिरि इलाके में इसका थोड़ा बहुत दर्शन हुआ है। लेकिन कई अन्य स्थानों पर आदिवासी संघर्ष को विकास के नाम पर कुचल दिया गया है।
कोलम्बिया नामक देश में एक बहुत संदर कानून है, जिसे स्वयं परिचय का अधिकार कहते है। आदिवासी हो या अफ्रीका से वर्षों पूर्व आये हुए समाज के व्यक्ति हो वे स्वयं तय कर सकते हैं कि उन्हें अपना नाम जिस समाज के तहत लिखवाना है, और जो वे स्वयं तय करेंगे वहीं अंतिम निर्णय होगा। उसी के तहत उन्हें जो भी सुविधा मिलना हो मिल सकती है। जबकि हम भारत में रोज देखते है कि लोग जाति प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए कितनी मेहनत करते हैं, और किन-किन के पैर छूते हैं और पैसा खर्च करते हैं। जिस देश में व्यक्ति अपनी जाति तय नहीं कर सकते। गरीब होने का प्रमाण पत्र प्राप्त नहीं कर सकते, उस देश की न्याय व्यवस्था के बारे में पुर्नविचार करने की जरूरत है।
भूटान एशिया भू भाग का छोटा सा देश है। उन्होंने इस बात को तय किया है कि विकास सिर्फ एक आर्थिक मापदण्ड नहीं है। बल्कि विकास नैतिकता, आध्यात्मिक, पर्यावरण और ऐसे कई मुद्दों से जुड़ा हुआ है। दुनिया के कई देशों के विद्वान इस बात को समझने के लिये भूटान आ रहे हैं। मैंने कुछ दिन पहले भूटान के पूर्व प्रधानमंत्री डा. तिनली के साथ विस्तार से चर्चा की। आम खुशहाली को विकास के मापदण्ड बनाने के पीछे उनकी जो समझ है वो देखकर मुझे प्रसन्नता हुई। डा. तिनली की शिक्षा दिक्षा भारत में हुई है, मैं आश्चर्य कर रहा था कि डाॅ. तिनली के अंदर जो समझ बनी वो पढ़े लिखे भारतीय के अंदर क्यों नहीं बन रही है।
बेल्जियम यूरोप का एक छोटा सा देश है। वहां के एक विश्वविद्यालय के कुछ साथी लोग इस प्रयास में लगे हुए हैं कि विश्वविद्यालय के हर विभाग और कक्षा में और हर कोर्स में अहिंसा सिद्धांत को कैसे लाया जाये। इस प्रयास में उन्हें मदद करने के लिये मैं कभी-कभी वहां जाया करता हूँ। मुझे आश्चर्य होता है कि महात्मा गांधी और अहिंसा को लेकर बेल्जियम के विश्वविद्यालय आगे बढ़ रहे है, जबकि भारत के किसी विश्वविद्यालय को इस विषय में कोई खास रूचि नहीं हैं हर विश्वविद्यालय में गांधी अध्ययन केन्द्र बनना इसका जवाब नहीं है। हर क्लास में गांधी और अहिंसा को पहुंचाना। हर विषय को अहिंसा के आइने में तौलना अलग ही कहानी है।
इसी संदर्भ में हम कुछ मित्रों ने नेपाल का भ्रमण किया। हिमालय की चोटी में स्थित ये छोटा सा देश और देश में काम करने वाले सामाजिक संगठनों ने कुछ अच्छे नमूने प्रस्तुत किये है। जिससे हम सीख सकते हैं। माओ के नाम पर बंदूक उठाने वाले लोगों ने बंदूक छोड़ दी है। अब वो सरकार और विपक्ष में बैठकर कोशिश कर रहे है कि समस्याओं को कैसे हल कर सकते है। राजशाही से प्रजातंत्र की ओर जाना आसान नहीं है, लेकिन प्रयास जारी है। हमने देखा कि जनसंगठन और सरकार आपसी संवाद से समस्याओं को हल करने की कोशिश कर रहे हैं और सामाजिक संगठनों को अपने ढंग से काम करने का पूरा-पूरा अवसर है। भारत में पिछले दिनों में सामाजिक संगठनों के साथ सरकार ने जो कुछ किया उससे सामाजिक संगठनों का मनोबल टूटा है। कई संगठनों को अंतर्राष्ट्रीय सहयोग प्राप्त करने से रोका और सामाजिक आंदोलनों को दबाने का प्रयास किया। और आदिवासी क्षेत्र में काम करने वाले व्यक्तियों और संगठनों को नक्सली करार कर दिया। कुल मिलाकर सरकार ने सामाजिक संगठनों पर हमला बोल दिया। जनता के बीच में ईमानदारी से काम करने वाले लोगों को रोककर सरकार ने स्वयं अपने आपको मजबूत महसूस किया।
नेपाल की यात्रा में हमने जनसंगठनों की कार्यशैली पर भी नजर डाली। अगर राष्ट्रीय भू अधिकार मंच का उदाहरण ले तो ये संगठन भले ही संस्थाओं की मदद से काम कर रहे है लेकिन अपना स्वयं का अस्तित्व गांव से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक बनाकर रखा है। ग्राम इकाई से जिला इकाई और राष्ट्रीय इकाई जैसे सशक्त संगठन बनाकर अपनी बात को सरकार से मनवाने का प्रयास कर रहे हैं। सबको पता है कि इस प्रक्रिया में इन्हें कई अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की मदद है, लेकिन नेपाल सरकार इन्हें रोकने या इनकी आवाज कुचलने की कोशिश नहीं कर रही है। बल्कि उनसे संवाद कर रही है। संगठन की कार्यशैली ने भी हमें प्रभावित किया। संगठन ने हर जिले में अपना स्वतंत्र कार्यालय रखा है। जिसे वे भूमि शिक्षण केन्द्र कहते है। हर गांव में जहां भूमि उपलब्ध है, या गरीबों को भूमि मिली है, उसका सही रिकार्ड रखते हैं। जातिगत आधार पर संगठित करने के बदले सबको एक साथ संगठित कर जाति भेद मिटाने का प्रयास करते है। महिलाओं के नाम भूमि आंदोलन का मुख्य भाग है। इसलिये महिलायें इस आंदोलन से दिल से जुड़ती हैं। ग्राम कोष और काॅपरेटिव के माध्यम से संगठन के साथियों की आर्थिक स्थिति को बेहतर करते हैं और संगठन में कानूनी प्रशिक्षण के लिये विशेष व्यवस्था की गई है ताकि कानून को समझते हुए संघर्ष कर सकें। इतना ही नहीं संगठन के मुख्य लोग अन्य देशों में भूमि सुधार की जो प्रक्रिया है, उसे समझने के लिये अन्य देशों का भ्रमण करते हैं जो संस्था इन्हें मदद करती है वो पीछे रहकर इस प्रक्रिया को प्रोत्साहित करती हैं।
मैं मानता हूँ, भारत में जनसंगठन की प्रक्रिया में लगे हुए लोग इस पद्धति से सीखें और भारत सरकार नेपाल सरकार के व्यवहार से ये समझने का प्रयास करें कि अहिंसात्मक आंदोलन के साथ मिलकर काम करने से ज्यादा लाभ होगा। ना कि उनसे टक्कर लेने से। भारत में हथियार उठाकर आंदोलन करने वाले लोग ये सीखें कि प्रजातांत्रिक तरीके से आम लोगों के जीवन में बदलाव लाने के लिये काम करना अधिक बहादुरी का काम है न कि बंदूक के दबाव से। सीखना हो तो हर स्तर पर सीखा जा सकता है लेकिन वही सीख सकता है जिसका दिल और दिमाग सीखने के लिये खुला हो। महात्मा गांधी कहते हैं कि वे निरंतर सीखते हैं और निरंतर अपनी समझ को ताजा करते हुए आगे बढ़ते थे। तो हम क्यों नहीं सीख सकते। निरंतर बड़े राष्ट्रों की ओर ताकने के बदले अब समय आ गया है कि हम छोटे-छोटे राष्ट्रों की ओर देखें और उनसे सीखने का प्रयास करें।
(लेखक- एकता-परिषद जनसंगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं)।


