बिहार के केड़िया गांव के किसानों का अनूठा प्रयोग.. दिखायेंगे देश को राह

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पर्यावरण दिवस के मौके पर ग्रीनपीस ने किया ‘अन्न से जीवन’ अभियान की शुरुआत

बिहार के केड़िया गांव का ‘जीवित माटी’ प्रयोग बनी सफल कहानी

संतोष कुमार सिंह

नई दिल्ली: किसान दबाव में है। पर्यावरणीय प्रभाव में है। कभी मौसम की मार तो कभी बीज का संकट। यदि बीज मिल भी गया तो अधिक से अधिक फसल उत्पादन का दबाव। और इस दबाव ने हमारे पूरी खेती को तबाह कर दिया है। मिट्टी की उर्वरता कम हो रही है, और जब मिट्टी ही उर्वर न होगी तो फिर फसल का प्रभावित होना स्वाभाविक है। यदि फसल हुआ भी तो इस बात की चिंता कि स्वास्थय को प्रभावित न करे। आखिर वो कौन सी चीज है, जिसको लेकर इतनी चिंता है..वो है रासायनिक खादों का धड़ल्ले से उपयोग।

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लेकिन ऐसी परिस्थिति में भी बिहार के केड़िया गांव के किसानों ने नयी राह दिखायी है। केड़िया बिहार राज्य के एक पिछ़डे जिले जमुई के बरहट प्रखंड/तहसील में स्थित एक छोटा सा गांव है, जहां बिना किसी रासायनिक खाद व कीटनाशकों के जैविक कृषि के तहत ‘जीवित माटी’ का प्रयोग सफल हुआ है। कुदरती खेती का केड़िया मॉडल देश की बदतर होती कृषि प्रणाली की कई विभिन्न समस्याओं को एक व्यापक व वैकल्पिक नजरिये से हल करने की कोशिश करता है। केड़िया के एक किसान राजकुमार यादव का कहना है कि, ‘हम अपनी खेती के लिए खाद और कीट नियंत्रक दवाइयां अपने पास मौजूद जैविक संसाधनों से ही बना रहे हैं – इस से हमारी लागत भी घटी है और हम रसायनों के दुस्प्रभाव से भी बच रहे हैं।’

केड़िया के किसानों को इस तरह के पहल को संबल दिया है..ग्रीनपीस इंडिया ने।

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भारतीय कृषि की बदहाली का जमीनी स्तर पर समाधान पेश करने और खाद्य प्रणाली को बेहतर बनाये रखने के लिये आज ग्रीनपीस ने विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर एक नया अभियान ‘अन्न से जीवन’ (फूड फॉर लाइफ) शुरू किया है। इस अभियान में ‘इकोलॉजिकल एग्रीकल्चर रिवोल्युशन’ (पारिस्थिकीय कृषि क्रांति) पर ज़ोर दिया गया है, जो कमज़ोर हो चुकी हमारी खाद्य प्रणाली को दुरुस्त करने में मददगार साबित होगा। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित एक कार्यक्रम में एक नुक्कड़ नाटक का प्रदर्शन किया गया, जिसमें कुदरती खेती के फायदे के बारे में बात की गयी। इस अभियान से जुड़ने के लिए आम लोगों को भी कई अनूठे कार्यक्रमों के जरिये भी प्रेरित किया गया। इसके अलावा एक पैनल डिस्कशन का आयोजन किया गया, जिसमें केड़िया की सफलगाथा को जमीन पर उतारने में साझेदार रहे ग्रीनपीस के कैंपेनर इश्तेयाक के अनुभवों से भी लोग रूबरू हुए।

ग्रीनपीस इंडिया ने बिहार के जमुई जिले में स्थित, केड़िया गांव के किसानों के द्वारा जारी ‘खाद्य क्रांति’ की प्रेरणास्पद कहानी को आज एक फिल्म स्क्रीनिंग के ज़रिए तीन शहरों में लोगों के साथ साझा किया। केड़िया में पर्यावरण और पारिस्थितिकी की सेहत के अनुरूप खेती-किसानी के भारतीय पारंपरिक ज्ञान, आधुनिक विज्ञान व कृषि संबंधी अभिनव प्रयोगों के साथ समुचित जैवविविधता की रक्षा की जा रही है।javik

ग्रीनपीस के कैंपेनर इश्तियाक अहमद ने कहा, ‘आज हमारी खेती-किसानी संकट में है, क्योंकि वर्तमान समय में खेती पद्धति कुदरत के साथ मिल कर नहीं, बल्कि उसके शोषण पर आधारित है। हम केड़िया में कुदरत, किसान और सरकारी मशीनरी के बीच समायोजन और सम्मान का रिश्ता बनाने की कोशिश कर रहे हैं। वर्ष 2014 में शुरू इस अभियान से किसानों के बीच कृषि जैवविविधता और जैवईंधन को लेकर चेतना बढ़ी है और कुदरती ढंग से खेती करने के तरीके पर भरोसा भी बढ़ा है।’

इश्तियाक ने आगे कहा, “दरअसल इस मॉडल में किसानों व उपभोक्ताओं के बीच की दूरी को पाटा जा रहा है। ऐसे में गांव में सहकारित विकास को भी बढ़ावा दिया गया है। इसका मकसद खेती की प्रक्रिया में मध्यस्थों को निकाल बाहर करना है और सततशील आजीविका की ओर प्रयास करते किसानों के लिए मुनाफे के अवसर पैदा करना है”।

विविधरा और बीज बचाओ आंदोलन से जुड़े वरिष्ठ कार्यकर्ता अजय महाजन ने लोगों को संबोधित करतें हुए कहा , ‘क़ुदरती खेती की बुनियादी ज़रूरत है कि भोजन व्यवस्था पर किसान और उपभोक्ता का सही नियंत्रण हो। फ़िलहाल किसानों और उपभोक्ताओं के बीच कोई तालमेल नहीं है जिसका सीधा और प्रतिकूल असर खाद्य सुरक्षा सुरक्षित भोजन प्रणाली पर पड़ रहा है. इस खाई को पाटना हम सब की एक बड़ी ज़िम्मेदारी है।’

 

 

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