कर्ज के बोझ से दबा गांव ..बजट से राहत की उम्मीद

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फोटो: अजय कुमार

कमलेश कुमार सिंह
साल का वह समय फिर से आ गया है जब भारतीय समाज के हर तबके कि नजरें देश के वित्त मंत्री पर होती हैं- चाहे वह आम आदमी हो, उद्योगपति हो या ग्रामीण किसान सभी सांता क्लॉज की तरह उनसे उपहारों की बारिश करने की उम्मीद करते हैं. आज देश का हर तीसरा व्यक्ति जो गांव में रहता है वह कर्ज में डूबा हुआ है. इस मामले में एक रिपोर्ट के अनुसार सामने आई जानकारी से यह पता चला है कि कर्ज के मामले में आंध्र प्रदेश के ग्रामीण सबसे आगे है. जबकि साथ ही कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, उत्तर प्रदेश, बिहार आदि राज्य भी कर्ज की मार से जूझ रहे है. ऐसे में यह कहा जा रहा है कि सभी ग्रामीण अरुण जेटली और बजट से काफी उम्मीदें लगे बैठे है.

फोटो: अजय कुमार

गाँवों में लोगों को यह समस्या है कि सरकार ने ग्रामीणों के के लिए पैसा तो खातों में डाल दिया लेकिन लोगों को ये मालूम ही नहीं है कि वो पैसा उन्हें कैसे मिल सकता है. कई खाते हैं जो बंद पड़े हैं. लोगों को आर्थिक रुप से भी साक्षर किए जाने की बड़ी जरूरत है, ताकि वो ये जान सकें कि योजनाओं का लाभ कैसे मिल पाएगा.  80 फीसदी ग्रामीण जनसंख्या 30 रुपये प्रतिदिन से ज्यादा नहीं कमाती. ऐसे में ये लोग क्या शिक्षा पर ध्यान देंगे और क्या स्वास्थ्य पर. देश में 3 लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं, कई और किसान आत्महत्या की करने की लाइन में हैं. किसी और पेशे में इतनी आत्महत्या नहीं होती. बजट में ग्रामीणों के लिए शामिल 15-16 हजार करोड़ रुपये में से 90 फीसदी सरकारी विभागों के वेतन में खर्च हो जाते हैं, 5 फीसदी  रखरखाव आदि पर खर्च दिए जाते हैं. आम जनता के लिए बाकी बचता ही क्या है.
पिछले बजट यानी केंद्र सरकार की बजट में गांव, खेत, किसान और गरीब केंद्रित बताया गया था. गांव के लिए बजट में सवा दो गुणे की भारी वृद्धि की गयी थी. मसलन, जेटली ने ग्राम पंचायतों और नगर पालिकाओं को अनुदान के रूप में 2.87 लाख करोड़ रुपये आवंटित करने की घोषणा की. 01 मई, 2018 तक शत-प्रतिशत गांवों में विद्युतीकरण की भी घोषणा की गई. पंचायती राज संस्थानों की मदद के लिए उन्होंने नई योजना राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान का भी प्रस्ताव किया था.

बजट से जुडी खबरों के मुताबिक, वर्ष 2017-18 के बजट में ग्रामीण विकास मंत्रालय को 1.06 लाख करोड़ रुपये का भारी भरकम आवंटन हो सकता है. पिछली बार यह राशि 86,000 करोड़ रुपये थी. माना जा रहा है कि ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी उन्मूलन के लिए एक नई योजना की घोषणा की जा सकती है. नोटबंदी के कारण खासकर ग्रामीण इलाकों में लोगों को हो रही परेशानी के मद्देनजर इसे मोदी सरकार की ओर से राहत के तौर पर देखा जा रहा है. इसके अलावा बजट में मिशन अंत्योदय नाम से एक नई योजना भी शुरू की जा सकती है. ग्रामीण विकास मंत्रालय ने इस योजना का प्रस्ताव रखा है और इसका मकसद ग्रामीण इलाकों के एक करोड़ परिवारों को गरीबी से बाहर निकालना है. अधिकारियों का कहना है कि मंत्रालय की प्रमुख योजना मनरेगा में वर्ष 2017-18 में पिछली बार 38,500 करोड़ रुपये की तुलना में इस बार अतिरिक्त 1,500 से 3,500 करोड़ रुपये आवंटित किए जा सकते हैं. बशर्ते कि पिछली बार की तरह बकाया न चुकाना पड़े. वर्ष 2016-17 में मनरेगा को बजटीय आवंटन और पूरक अनुदान मांगों के जरिये अब तक का सबसे ज्यादा आवंटन मिला था लेकिन इसमें से 12,000 करोड़ रुपये तो पिछले साल के बकाये के भुगतान में ही लग गए. राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका अभियान के आवंटन के 3,500 करोड़ रुपये का इजाफा हो सकता है जबकि पिछली बार इसके लिए 3,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे. इस मिशन के तहत बैंकों के जरिये 43,000 करोड़ रुपये का ऋण भी दिया गया जो कि बजटीय आवंटन से बाहर है. प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) का बजट 20,000 करोड़ रुपये के पार पहुंच सकता है. पिछली बार यह राशि 15,000 करोड़ रुपये थी. इस योजना के तहत सरकार ने अगले दो वर्ष के दौरान ग्रामीण इलाकों में एक करोड़ आवास बनाने का लक्ष्य रखा है. ग्रामीण सड़क योजना को 19,000 करोड़ रुपये का सालाना आवंटन जारी रहने की उम्मीद है. राज्यों का हिस्सा मिलाकर इस योजना का सालाना बजट 27,000 करोड़ रुपये है. सरकार पहले ही सभी आबाद गांवों को सड़कों से जोडने के लिए अगले तीन साल के दौरान 81,000 करोड़ रुपये के आवंटन का वादा कर चुकी है. कई जानकारों का मानना है कि बजट में ग्रामीण इलाकों पर जोर देकर मोदी सरकार नोटबंदी से परेशान लोगों को अच्छे दिन का अहसास कराना चाहती है. कुछ अधिकारी कहते हैं कि काले धन पर प्रहार से आने वाली अतिरिक्त कर प्राप्तियों से सरकार आवंटन में बढ़ोतरी और लोकलुभावन बजट पेश करने की स्थिति में होगी.
इसमें कोई शक नहीं कि ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति बेहद खराब है। वे बुरे दौर से गुजर रही हैं. सूखे और बाढ़ के लगातार हमलों से ग्रामीण उबर नहीं पा रहे हैं. किसानों को उनके उपज की उचित कीमत नहीं मिल पा रही है. इसकी एक वजह वैश्विक आर्थिक मंदी भी है. अच्छे दिन की आस में ग्रामीणों ने 2014 में एनडीए को जमकर वोट दिया था. यह आस अब धीरे धीरे टूटता दिख रहा है.हालांकि सरकार ऐसी बातों को एक सिरे से खारिज कर रही है. देखना होगा कि वित्त मंत्री अपने बजट से ग्रामिणों को खुशी की सौगात देते हैं या उनकी मुश्किलो को और बढाते हैं।

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