मीनाक्षी पाल
अलवर: राजस्थान में अलवर के रहने वाले युवा ओमप्रकाश गालव ने अपने हुनर से राजस्थान की पारंपरिक मिट्टी से बर्तन बनाने की कला को यूरोप में भी नई पहचान दिला दी है। मिट्टी के कागजी बर्तन बनाने में पारंगत ओमप्रकाश अबतक 5 हज़ार से ज्यादा लोगों को ये कला सिखा चुके हैं। इस कला से सैकड़ों लोगों को रोजगार मिला है। भले ही भारत में इस प्राचीन कला को बहुत ज्यादा महत्व न मिला हो लेकिन ओमप्रकाश के प्रयासों से भारत की इस प्राचीन कलाकारी को विदेशी बाजारों में काफी सम्मान मिल। रहा है।
परंपरागत कला संस्कृति के लिए विख्यात है राजस्थान
राजस्थान हमेशा से ही अपनी कला-संस्कृति के लिए विख्यात रहा है। हालांकि बदलते समय के साथ देश में अब बहुत कम लोग मिट्टी के बर्तनों का इस्तेमाल करते हैं। यही कारणा है कि मिट्टी के बर्तनों का निर्माण भी कम हो रहा है और यह परंपरागत कला मृतप्राय होती जा रही है। बावजूद इसके राजस्थान के ओमप्रकाश अपनी मिट्टी से बर्तन बनाने की कला के लिए देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी प्रसिद्ध है।
कागजी बर्तन बना ब्रांड,बढ़ी रोजगार की संभावना
ओमप्रकाश के बर्तन इतने हल्के होते है कि उन्हें कागजी बर्तन कहा जाता है। राजस्थान की राजधानी जयपुर से 172 किलोमीटर दूर अलवर का रामगढ़ अपनी इस कला के लिए ब्रांड बन गया है। यहां के निवासी 40 साल के ओमप्रकाश गालव विगत ढाई दशकों से मिट्टी के बर्तन बना रहे है। देश के अलग-अलग हिस्सों के करीब पांच हजार लोग उनसे यह हुनर सीखकर अपना परिवार चला रहे है।
काम को मिली पहचान..कई पुरस्कारों से हुए सम्मानित
ओमप्रकाश को उनके इस कमाल के लिए राज्य दक्षता पुरस्कार, राष्ट्रीय हस्तशिल्प पुरस्कार और विश्व कला परिषद की ओर से 4 अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं। इनका नाम मिट्टी की सबसे छोटी और बड़ी कलाकृतियों के लिए यूनिक बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज़ है। गालव अपनी इस कला का प्रदर्शन नीदरलैंड, इंग्लैंड, स्वीडन, नेपाल और पेरिस में भी कर चुके हैं।
क्या कहते हैं ओमप्रकाश
ओमप्रकाश कहते हैं, “बर्तन बनाने के लिए मिट्टी में हम किसी भी तरह का कैमिकल इस्तेमाल नहीं करते हैं, हमारे बर्तन काफी हल्के होते हैं इसीलिए इन्हें कागजी बर्तन कहा जाता है। बर्तन में मिट्टी की परत बहुत पतली होती है, जिसे कुशलता से तैयार करना होता है। फिनिसिंग और डिजाइनिंग पर खास ध्यान देना होता है।”
कई पीढ़ियों से परिवार कर रहा है यह काम
कई पीढियों से इनके यहां यह काम हो रहा है। इनके परदादा पहलवान लल्लूराम, दादा सोहनलाल और पिता फतेहराम भी मिट्टी के कलात्मक सामान बनाते थे और उन्हें भी उनकी कला के लिए सम्मानित किया गया था। ओमप्रकाश की मां हीरादेवी भी बर्तनों को डिज़ाइन करने में सहायता करती है। उन्हें जिलास्तरीय सम्मान मिल चुका है।
शिक्षा पर भारी पड़ा हुनर
शिल्पकाल में 10वीं कक्षा तक पढ़े ओमप्रकाश गालव ज्यादातर घरेलू, साज-सज्जा और कलात्मक बर्तन बनाते हैं। इनमें खाना पकाने के बर्तन,पॉट्स, लैम्प, मूर्तियाँ, मिनिएचर, मिट्टी के गहने शामिल हैं। अगर किसी ने अपनी पसंद या डिज़ाइन से कुछ बनाने की माँग की तो वो भी बना देते हैं। ओमप्रकाश पहले इन्हें अपने घर से बेचते थे। परंतु अब वे उद्योग विभाग की सहायता से प्रदेश या प्रदेश के बाहर लगाई जाने वाली प्रदशर्नियों में भी स्टॉल लगाकर अपने सामानों की बिक्री करते हैं। ‘रामगढ़ क्ले पॉटरी’ के नाम से अमेजॉन पर तो इनके बर्तन हैं, इसी नाम से अपनी वेबसाइट के ज़रिए भी बर्तन और सजावटी सामान बेच रहे है।
कैसे बनाते हैं मिट्टी के बर्तन
ओमप्रकाश बर्तन बनाने की विधि बताते हुए कहते हैं, “पहले मिट्टी को सुखाते हैं फिर उसे मोगरी से कूटकर बारीक होते ही छान कर अलग कर लेते हैं जिसे चूनी कहते हैं। अतिरिक्त मिट्टी को हारे (जमीन में बनाया गड़्ढ़ा) में डालकर पानी में भिगो दिया जाता है। भीगने पर उसे चलनी में छाना जाता है ताकि भीगने पर उसे चलनी में छाना जाता है ताकि कंकड़ अलग किए जा सकें। छना हुआ घोल गाढ़ा होने पर उसमें चुनी मिलाकर लौदा बनाया जाता है, जिसे दो दिन तक प्लास्टिक से ढक कर रखा जाता है, इससे मिट्टी के सूखे कण मिट्टी में मिल जाते हैं। अब इस मिट्टी को काम में लेने से पहले पैरों से लोच लगाया जाता है। इसके पश्चात् हथेली से पतली हत्थी लगाई जाती है।”
इसके पश्चात् 8 से 10 दिन इन बर्तनों को छाया में सुखाया जाता है। सूखने पर इन्हें बानी (मुर्रम, पहाड़ की लाल मिट्टी) के घोल में डुबकर निकाल लिया जाता है। इससे बर्तन का रंग लाल हो जाता है। सूखने के पश्चात् हल्के गीले, कपड़े से उसकी घिसाई जाती है। इससे बर्तन की सतह चिकनी और चमकदार हो जाती है। कुछ देर सुखाकर इन्हें भट्टी में पकाया जाता है।
क्या कहती है मां
मां हीरा देवी का कहना है कि,“इतने दिनों की मेहनत के बाद अब काफी अच्छा लगता है, हमारा सामान दूसरे देशों में बिक रहा हैं।
कईयों को दिया रोजगार
ओमप्रकाश करीब 10 लोगों को अपने यहां रोज़गार दे रहे है। उनसे काम सीखने वाले आंधवारी गांव के रामप्रसाद बताते है कि, “पहले हम सिर्फ देहाती बर्तन बनाते थे, लेकिन ओमप्रकाश से ट्रेनिंग लेने के बाद सुन्दर डिज़ाइन वाले बर्तन बनाने लगा हूँ और कई शहरों में प्रदर्शनियों में हिस्सा भी लिया है।”
इसी प्रकार हकरजी सागवाड़ा के राजेश प्रजापत ओमप्रकाश से काम सीखने के बाद अपना काम कर रहे है। वे कहते हैं, “अब मैं खुद का काम कर रहा हूँ और अच्छा खासा कमा लेता हूं। मेरे यहां भी अब दूर-दूर से लोग बर्तन खरीदने आ रहे हैं। शिल्पकार ओमप्रकाश गालव के यहां काम कर रहे चेतन और ईश्वर ने बताया कि इस काम को सीखने के बाद उनका जीवन अब आसान हो गया है। उनके परिवार की आर्थिक सहायता में इस हुनर का बहुत बड़ा योगदान रहा है।
सरकार से मिलती है आर्थिक सहायता
उद्योग विभाग की ओर से ओमप्रकाश जैसे कलाकारों को समय-समय पर प्रोत्साहित किया जाता रहा है। उद्योग विभाग के महाप्रबंधक एम आर मीणा बताते हैं, कलात्मक काम करने वालों को बढ़ावा देने के लिए मुख्यमंत्री लघु प्रोत्साहन योजना के तहत 3 लाख रुपये का कर्ज़ प्रदान किया जाता है। जिसका ब्याज समय-समय पर सरकार देती है। इसके अलावा प्रदेश से बाहर लगने वाले मेले या प्रदशर्नियों में शामिल होने वालों को आवागमन का ख़र्च और स्टॉल का 50 फ़ीसदी किराया भी दिया जाता है।
