
पोषण पर चर्चा को हम आगे बढ़ाते हुए आज यह देखेंगे कि हमारी परंपरागत आदते ,तरीके और मान्यताएं किस तरह हमें पोषण के प्रति जागरूक करती हैं। पहले तो जान लें कि पोषण हेतु हम केवल अन्न की ही चर्चा नहीं करेंगे वरन अन्न के अलावे और क्या क्या है जो हमारे पोषण को समृद्ध करते हैं?
हमारी संस्कृति और परंपरा में सही पोषण हेतु यह मान्यता है कि हम चिंतामुक्त हो यानी प्रफुल्लित मन से भोजन ग्रहण करें। भोजन भी शुद्ध हो चाहे वह वेज हो या नॉन वेज। साफ सफाई से निर्मित हो। परोसा गया नयनाभिराम हो। सुरुचिपूर्ण प्रस्तुतिकरण हो। उसमें भी महत्वपूर्ण है कि हमारा भोजन विषैले तत्वों से मुक्त हो। आधुनिकता और विकास का कुरूप पक्ष यह है कि हमारा अधिकांश भोजन विषैले रसायनों से प्रदूषित मिल रहे हैं। रासायनिक उर्वरकों और कीट प्रबंधन के कारण हमारे भोजन में अवांछित रसायनों की उपस्थिति बढ़ी है जो हमारे लिए रोगकारक है। यह हमें पोषण नहीं दे रहा है। यही कारण है कि ऑर्गेनिक खेती की लोगों का रुझान बढ़ा है । लोग स्वस्थ जीवन और पोषण हेतु जैविक खेती की ओर प्रेरित हुए हैं।

हम अन्न , प्रफुल्लित मन के अलावे भोजन हेतु प्रयुक्त बर्तनों की जरूर चर्चा करें जब हम पोषण की बात करें। आज हमारे बर्तनों में प्लास्टिक , स्टील ,एल्युमिनियम आदि का व्यवहार बढ़ गया है जो हमारे पोषण हेतु उपयुक्त नहीं है। हम घरों में लोहे की कड़ाही की जगह एल्युमिनियम की कड़ाही का व्यवहार कर रहे हैं जो हमारे पोषण तत्वों की कमी के कारण बने हैं। लोहे की कड़ाही से हमारे भोजन में लौह तत्व की कमी नहीं होती थी जिसकी शिकायत अभी आम है। ज्यादातर स्त्रियां रक्ताल्पता की शिकार हैं। लोहे की कड़ाही इस समस्या का सहज निदान है।
पहले भोजभात में केले के पत्तों या कमल के पत्तों का हम व्यवहार करते थे। सखुआ के पत्तों का भी। मिट्टी के गिलास भी व्यवहार करते थे। पर वक्त बदला और हम थर्मोकोल के प्लेट और प्लास्टिक के कप प्लेट व्यवहार करने लगे जो हमारे स्वास्थ्य केलिय घातक साबित हुए। अतः सही पोषण हेतु जरूरी है कि हम प्रकृतिसौम्य पदार्थो का अपने भोजन में समावेश करें। साथ ही मोटे अनाजों का भी भरपूर प्रयोग करें। हमें अपने परंपरागत भोजन को स्वीकार करना होगा। आधुनिक चलन में आये जंक फूड को त्यागना होगा। अभी विशेषरूप से बच्चों में पिज्जा ,बर्गर आदि का क्रेज बढ़ा है। ऐसे भोजन या फ़ास्ट फ़ूड अभी बहुत ही लोकप्रिय हुए हैं। पर उसके दुष्प्रभाव भी नजर आ रहे हैं। मोटापा की शिकायत आम हो गयी है। थायराइड से पीड़ितों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है। यह मानव पोषण के लिये एक गम्भीर खतरा साबित हो रहा है। अगर इसे नहीं संभाला गया तो अगले कुछ वर्षों में मोटापाजनित बहुत सारी बीमारियां आम हो जाएंगी । दमा, हार्ट डिजीज, बी पी , डिप्रेशन आदि बीमारियां बढ़ेंगी। स्किन , आंख , किडनी ,लीवर आदि के रोग भी बढ़ेंगे। तो जब हम पोषण की बात करें जंक फूड को कभी नहीं भूलें क्योंकि ये हमारे स्वास्थ्य केलिय बड़े ही घातक सिद्ध हो रहे हैं।
हमारी कुछ आदते भी पोषण को बढ़ाते हैं। हम जानते हैं कि मेवे हमारे स्वास्थ्य हेतु बहुत ही लाभदायक हैं। मेवों को खाने के हमारे तरीके भी बहुत ही पोषणयुक्त हैं। किशमिश, बादाम, अंजीर आदि को हम जब पानी में भिंगो कर या फुला कर खाते हैं तो उससे पोषक तत्वों में वृद्धि होती है। हम उनके छिलकों को उतार देते हैं। पर जब हम दालों का सेवन करते हैं तो किसी किसी मामले में उनके छिलकों को भी यूज करते हैं। तूर के दालों के छिलके विटामिन्स से भरपूर होते हैं। इसी तरह मूंग, उड़द आदि के भी दाल हम छिलका रहित और छिलका युक्त भी यूज करते हैं। हम इन दालों में मूंग ,मटर, चना आदि को पानी में फुला कर या अंकुरित कर भी खाने में प्रयोग करते हैं जो हमारे पोषण हेतु बहुत ही लाभदायक होते हैं।
हम दालों के प्रयोग में घी का भी प्रयोग करते हैं । जो स्वाद को बढ़ाता तो है साथ ही पोषण तत्वों को भी समृद्ध करता है। हम अपने भोजन में घी के अलावा दूध ,दही , छाछ , मक्खन का भी भरपूर प्रयोग करते हैं। यह हमारी पोषण परंपरा का विशिष्ट अंग है।
आज विटामिन 12 की कमी की आम शिकायत देखने को मिलती है। विटामिन 12 आमतौर पर नॉन वेज फूड में प्रचुर मात्रा में मिलता है। अंडों , मछली , मीट , चिकेन आदि में यह प्रयाप्त पाया जाता है। हमारे सही पोषण हेतु यह बहुत ही जरूरी है। यह पालक , केले आदि में भी पाया जाता है और ड्राई फ्रूट्स में भी। तो इनका भी भरपूर उपयोग विटामिन 12 की कमी को रोकता है। इसी तरह विटामिन ए ,बी ,सी ,डी आदि के लिए हम क्या करें कि हमें इनकी कमी से रोग व्याधि न हो तो उस हेतु भी हमारी भोजन परंपरा में बहुत से प्रावधान हैं। आंवला ,निम्बू ,गाजर ,पालक , गोभी , मूली, सलजम, सहजन आदि का प्रयोग हमारे पोषण को एन्हांस करते हैं।
हम तो भोजन पश्चात भी पोषण को नहीं भूलते । लौंग , इलायची, सौंफ , सुपारी जैसे पदार्थो का भोजन पश्चात सेवन कर अपने आहार को पचने में हम सहयोग करते हैं। कहीं कहीं गुड़ , अदरख , अजवाइन आदि का भी लोग सेवन करते हैं। आइये ,अभी चलते हैं नुक्कड़ पर राम खेलावन चौरसिया की दुकान से मीठा पान खाया जाए। पोषण पर चर्चा तो चलती ही रहेगी। दूसरी कड़ी….
(जाने माने मीडिया प्रशिक्षक, प्रगतिशील किसान डॉ शंभू कुमार सिंह प्रकृति मित्र अभियान के संयोजक हैं।)








