पहले भी नीतीश कर चुके हैं सवर्ण आयोग के गठन की कवायद, रिपोर्ट जारी करने का नहीं दिखाया साहस

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शश्वत सिंह

 

 

पटना: बिहार में इस वर्ष अक्टूबर-नवंबर में विधानसभा चुनाव होने वाले है ऐसे में तमाम पार्टियों ने चुनाव जीतने के लिए पूरी जान झोक दी हैं। भारत सरकार हो या राज्य सरकार चुनावी वर्ष में बिहार को दर्जनों परियोजना का उपहार दिया जा रहा है। सभी जातियों के गुणा-गणित देखते हुए बिहार सरकार सवर्णों के लिए सवर्ण आयोग का गठन किया है।

 

 

सवर्ण आयोग के चयनित सदस्य और अध्यक्ष
सवर्ण आयोग का अध्यक्ष बीजेपी नेता महाचंद्र प्रसाद सिंह को बनाया गया है, जबकि उपाध्यक्ष जनता दल यूनाइटेड के मुख्य प्रवक्ता राजीव रंजन को इस आयोग का उपाध्यक्ष बनाया गया है। दयानंद राय, जय कृष्ण झा, राजकुमार सिंह को सदस्य नियुक्त किया गया हैं।

 

 

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सवर्णों की अनदेखी का लग रहा था आरोप
बिहार में विगत 35 वर्षों से पिछड़े वर्ग के मुख्यमंत्री होने के कारण सवर्णों की अनदेखी का आरोप लगातार सामने आ रहा था। लेकिन इस सच्चाई से भी कोई इंकार नहीं कर सकता कि इन सरकारों के गठन में भी सवर्ण वोट का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। सवर्णों की अनदेखी और दिनोदिन कमजोर होती आर्थिक स्थिती के मद्देनजर एनडीए सरकार द्वारा सवर्ण आयोग का गठन कर सवर्ण समुदाय को यह संदेश देने की कोशिश की है कि उनकी दुरावस्था को लेकर भी सरकार सजग है। हालाकि राजनीतिक विश्लेषक सवर्ण आयोग के गठन को एनडीए के चुनावी पैतरे और सवर्ण वोटों को अपने साथ जोड़े रखने के कवायद के रूप में ही देख रहे हैं। साथ ही सरकार के मंशा पर भी सवाल उठ रहा है कि ऐन चुनाव के मौके पर ऐसा करके सरकार क्या हासिल करना चाहती है?

 

 

पहले भी हो चुकी है कवायद, रिपोर्ट जारी करने का नहीं दिखाया साहस
सवर्ण आयोग साल 2011 में भी गठित हुआ था, लेकिन बाद में उसे निष्क्रिय कर दिया गया। इस बार के सवर्ण आयोग के कार्यकाल को लेकर नोटिफिकेशन में कहा गया है कि यह आयोग स्वर्ण जातियों की स्थिति और दशा पर काम करेगा। ज्ञात हो बिहार विधानसभा चुनाव में अब कुछ महीने ही बाकी है ऐसे में सवर्ण आयोग का गठन करके नितीश सरकार ने एक बड़ा दांव चल दिया है हालांकि इस आयोग का असर कितना होगा, यह तो चुनाव के नतीजों पर निर्भर करेगा।

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