अमरनाथ
पटना: नदी जोड परियोजना को नदियों को बेचने की चाल ठहराते हुए मेधा पाटकर ने कहा कि बिहार को इस मामले में कठोर रुख अख्तियार करना चाहिए। उसे नदी जोडने की दिशा में नहीं जाकर वैकल्पिक जल नीति बनाने के बारे में सोचना चाहिए। बिहार बाढ़ और सूखा दोनों से प्रभावित होता है। लेकिन बाढ़ केवल उत्तर बिहार में नहीं है और सूखा केवल दक्षिण बिहार में नहीं है। दोनों इलाके के लोग कमोबेश दोनों आपदाएं झेलते हैं। यहां नदियों के प्रबंधन का मामला अधिक मुखर होकर सामने आता है। फरक्का बराज को हटाने की बात करके बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भागलपुर से लेकर फरक्का के निकट के गांव पंचाननपुर तक के लोगों की दुखती रग पर हाथ रख दी है। उन्हें समस्या की जड़ तक जाना और वैकल्पिक समाधान की बात समझनी चाहिए।
नर्मदा बचाओ आंदोलन की सुप्रसिद्ध कार्यकर्ता पाटकर ने कहा कि बांध,बराज और तटबंध किसी समस्या के समाधान नहीं हैं। वे समस्या को केवल टाल देते हैं और नए किस्म की समस्याएं पैदा करते हैं। इस बात को अब दुनिया के कई मुल्कों में समझ लिया गया है। संयुक्त राज्य अमेरीका में 1994 से ही बांघ बनाने पर रोक लगी है। कई नदियों के बांध और तटबंधों को तोड़ा भी गया है। अपने यहां नदी जोड़ के नाम पर नया कारोबार आरंभ हुआ है। यह नहरों के जरिए नदियों का पानी कारपोरेट घरानों को देने की चाल है। इसके उदाहरण नर्मदा घाटी में दिखने लगे हैं।
जनादोलनों के राष्ट्रीय सम्मेलन के ग्यारहवें द्विवार्षिक सम्मेलन में हिस्सा लेने पटना में आई मेधा पाटकर ने खास बातचीत में बताया कि नदी जोड़ परियोजना का खाका इसके सबसे बडे पैरोकार पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम के मन में भी स्पष्ट नहीं था। हम उनसे मिलने गए थे। पानी की अधिकता और अभाव के बारे में उनकी अपनी सोच थी। परियोजना से जुडी कठिनाइयों के बारे में उन्हें पता नहीं था। नदी घाटी की स्वायत्त संरचना के बारे में बताने पर पूछने लगे कि नदी घाटी क्या होती है।
दरअसल नदियों का प्रबंधन अकेले—अकेले हो ही नहीं सकता। उसके साथ तटवर्ती जंगलों और खेतों-गांवों के बारे में भी सोचना होगा। तटबंध बाढ़ को नहीं रोकते, केवल गाद को रोकते हैं। तटबंधों के कारण नदी के गर्भ में एकत्र गाद का नतीजा एक ओर फरक्का बराज के दुष्प्रभावों के रूप में दिखता है, दूसरी ओर कुसहा-त्रासदी होती है।
इस राष्ट्रीय सम्मेलन के उदघाटन सत्र की मुख्य वक्ताओं में शामिल मेधा ने जल,जंगल और जमीन के साथ साथ संविधान में दिए गए विभिन्न जन अधिकारों का मामला उठाया। उन्होंने कहा कि वर्तमान सरकार विभिन्न कानूनों को बदलने की कोशिश में है। हालांकि जनबल के दबाव में उसे भू-अधिग्रहण कानून वापस लेना पड़ा। पर सरकार विभिन्न उपायों से आमलोगों की जमीन लेकर उसे कारपोरेट घरानों को देने के फिराक में है। अभी झारखंड में सरकारी दमन चल रहा है। कोशिश उस कानून को बदलने की है जिसके अंतर्गत आदिवासियों की जमीन की खरीद बिक्री पर अंग्रेजों के समय से ही प्रतिबंध लगी हुई है। कश्मीर में हजारों लोगों को जेलों में भर दिया गया है। पैलेट गनों की फायरिंग में हजारों नौजवानों की आंखे फूट गई हैं। लोगों ने चार महीने से पूरे राज्य में बंद रखा है। अब प्रश्न है कि कश्मीर अगर भारत का हिस्सा है तो वहां के लोगों के साथ सरकार संवाद क्यों नहीं कायम करती? सवाल सरकार के रवैए से ही उठता है।
जनता के संसाधनों को खींचकर कारपोरेट घरानों को देने की साजिश का आरोप लगाते हुए मेधा ने कहा कि दिल्ली से मुबई के बीच औद्योगिक कारीडोर बनाने की बात चल रही है। इस परियोजना में करीब तीन लाख 90 हजार हेक्टेयर उपजाउ जमीन किसानों से लेकर औद्योगिक घरानों को दिया जाना है। इस बीच के खेत, जंगल, गांव सब उजड़ जाऐगे। विकास के इस ढंग को संसाधनों की लूट की संज्ञा देते हुए उन्होंने कहा कि इसके खिलाफ देशभर में जगह जगह आंदोलन चल रहे हैं। इन आंदोलनों के बीच आपसी समन्वय कायम करना जरूरी है। मेधा पाटकर ने कहा कि हम विकास के वर्तमान मॉडल का विरोध करते हैं क्योंकि यह आम लोगों के मानवीय अधिकारों का हनन करती है। इसकी जगह पर वैकल्पिक विकास का मॉडल सामने रखने की जरूरत है।
