मानसून की बारिश.. व्यवस्था की कमी..गरीबों की शामत

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संतोष कुमार सिंह

बरखा बहार आई, सावन की फुहार लाई. खुशियों की संसार लाई। जश्न की नगरी मुंबई में मुंबईकर बारिश का जश्न मना रहे है। भांति—भांति की खुशनुमा तस्वीरें डाली जा रही हैं। #MumbaiRains का हैशटैग सोशल मीडिया पर ट्रेंड में चल रहा है | अपनी ख़ुशी का इज़हार करने के लिए लोग अपने अपने अंदाज़ में सोशल मीडिया पर मनमोहक फोटो डाल रहे है | बारिश का इंतज़ार किसे नहीं होता? लेकिन ई खुशियों की रूत उनलोगों पर भारी पड़ती है जिनका रहबसर खुली सड़को पर होता है। टाट पलानी में होता है। शुरूआती बारिश तो अच्छी लगती है,लेकिन यह सिलसिला जब रोज चलने लगे, तो जान की आफत। लम्बे अरसे से बारिश का इंतज़ार को, मानसून ने कल शहर में दस्तक देकर खत्म किया | किसानों के लिए तो बारिश एक वरदान है | रोज़ पसीने में भीगकर लोकल ट्रेनों में व बसों में मुंबईकर पसीने में नहा कर सफ़र करता है , ट्रैफिक में फ़स जाने पर तो गर्मी में और ही बुरा हाल होता है, पर बारिश पड़ने पर ज़िन्दगी आसान हो जाती है | पर कभी कभी यह बारिश भयानक भी हो जाती है |

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लेकिन ये बारिश प्रेम किशोर गायकवाड, एक छोटी बच्ची की माँ, जिसकी उम्र 20 के ऊपर होगी, उसके माँ-बाप का निधन हो जाने के बाद फूटपाथ पर 20 सालों से रह रही है | वह पुरे साल गटर साफ़ करके अपना जीवन-यापन करती है, सिर्फ बरसात में वह अपना काम बदलकर कचरा बीनने का काम करती है | गायकवाड कहती है कि “मैंने बारिश से बचने के लिए एक प्लास्टिक की छत बनायीं है, पर बारिश आने पर बुरी तरह से टपकती है | टपकने से बचने के लिए हम पास ही के ब्रिज पर जाकर सो जाते है” | गायकवाड व अन्य 20 से अधिक परिवार सान्ताक्रुज़ हाईवे पर रहते है |

कौन सोच सकता है कि बारिश किसी के लिए अभिशाप भी हो सकता है? महानगरों में ऐसे हजारों—लाखों परिवार हैं। बारिश एक भयानक परीक्षा साबित होती है जब बच्चों व नवजातों की सुरक्षा करना हो, या बीमारों वो बूढों को बचाना हो तो | यह उनकी ज़िन्दगी के लिए जोखिम है | यह जानना ज़रूरी है कि क्या सरकार को उसके सबसे गरीब नागरिकों कि परवाह है या नही? बेघरों के लिए बारिश से सुरक्षा के लिए सरकार ने क्या इंतज़ाम करे है ?

2011 जनगणना के अनुसार मुंबई में 57,416 लोग बेघर बिना किसी छत के रहते है | राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन जो भारत सरकार के आवास और शहरी गरीबी उपशमन मंत्रालय द्वारा चलाया जा रहा है, उसके दिशा-निर्देशों में कहा गया है कि हर एक लाख की जनसँख्या पर एक स्थायी सामुदायिक आश्रय होना चाहिए सारी बुनियादी सुविधाओं के साथ | नवीनतम जनगणना के अनुसार मुंबई की कुल जनसँख्या 12,442,373 है | इस हिसाब से मुंबई में कम से कम 124 स्थायी आश्रय होना चाहिए | पर लगता है की ना महाराष्ट्र सरकार को और ना ही मुंबई महानगर पालिका को उसके बेघर नागरिकों की ज़िन्दगी की कोई परवाह है जो बारिश के दौरान खतरे में पड़ सकती है | हाल ही में मिले सूचना के अधिकार कानून के तहत जवाब में पता चला है कि मुंबई महानगर पालिका ने एक भी स्थायी आश्रय नहीं बनाया है राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन के तहत और सिर्फ 7 आश्रय पुरे शहर में बने है जिनकी क्षमता तय मानकों से भी कम है |

सुप्रीम कोर्ट व अलग-अलग हाई कोर्ट ने बार-बार स्पष्ट किया है कि ‘घर का अधिकार’ जीने के अधिकार का हिस्सा है’ संविधान के आर्टिकल 14 के अनुसार | इसका मतलब किसी को भी छत से वंचित करना उनके ‘जीने के अधिकार’ का उलन्घ्घन है |

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मुंबई, जो देश की आर्थिक राजधानी बोली जाती है, एक अखाड़ा है जहाँ पर जगह और अन्य सुविधाओं पर पहुँच के लिए प्रतियोगिता होती है | हाल में म.न.प. द्वारा जारी किये गए मुंबई का डेवलपमेंट प्लान में इस तथ्य पर बहस का दौर शुरू कर दिया है और कई नागरिक समाज इस पर अपने सुझाव व आपत्तिया भेज रहे है ताकि यह निश्चित हो की संसाधनों व जगह का नियंत्रण ज्यादा से ज्यादा लोगों के हाथ में रहे | इस प्रतियोगिता में गरीब, खासतौर पर बेघर सबसे पीछे रह जाते जाते है क्योंकी ‘घर का अधिकार’ निश्चित करने वाला अभी तक कोई भी कानून नहीं बना | इससे सरकार को आसानी से मौका मिल जाता है अपनी जिम्मेदारियों से पड़ला झाड़ने का | पर सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि सारी राज्य सरकारे अपने प्रदेशों में स्थायी आश्रय बनाए |

सुप्रीम कोर्ट में भारत सरकार के अवर सचीव ने फाइल किये शपथ-पत्र से यह निकल कर आया है कि वर्त्तमान आर्थिक साल में भारत सरकार ने महाराष्ट्र सरकार को रु. 15272.72 लाख स्थायी आश्रय बनाने के लिए आवंटित | यह जानकार आश्रय होगा कि महाराष्ट्र सरकार ने अभी एक इस फण्ड में से एक रूपया में खर्चा नही किया है |

सुप्रीम ने ‘पीपलस यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज’ द्वारा फाइल की गयी एक जन याचिका में कहा है कि “बेघर लोगों को राज्य कम से कम न्यूनतम छत निश्चित करे, ऐसा उसका कर्तव्य है आर्टिकल 14 के तहत” महाराष्ट्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन नहीं करके उसका उलंघन कर रही है और साथ ही में बेघर लोगों को उनके ‘घर के अधिकार’ से वंचित कर रही है | इसके लिए सरकार को जवाबदेह होना पड़ेगा और सही कार्यवाही हो |

 मुंबई महानगर पालिका से व इस मामले को अत्यंत गंभीरता से लें और तत्काल राहत सामग्री से बेघर लोगों की हर मुमकिन मदद करे ताकि बारिश के कारण उनकी ज़िन्दगी खतरे में नहीं पड़े |

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