पंचायत खबर डेस्क
मैं अक्सर कहता रहता हूं हर दिल में एक गांव बसता है। और वही आपके अंदर बसा हुआ गांव जब हिलोर लेने लगता है] उसकी माटी की खुशबू जब आपको खींचने लगती है। उसके विकास की चिंता जब आपको सताने लगती है तो आप सबकुछ छोड़कर गांव की ओर भागे चले जाते हैं। कुछ ऐसा ही हुआ है आइएएस अधिकारी अरूण कुमार की पत्नी रीतू के साथ।शादी के सत्रह साल बाद ससुराल आई आईएएस की पत्नी गांव की हालत देखकर इतनी व्यथित हुई कि सुख-सुविधाओं से भरा जीवन और दिल्ली जैसे महानगर की सुविधा छोड़कर गांव का रूख किया। और एक बार जब गांव का रूख कर ही लिया, तो गांव उन्हें कहां पीछे छ़ोड़ने वाला था। उन्होंने शहर छोडकर गांव में रहने और उसकी हालत बदलने का फैसला कर लिया। कोशिश शुरू हुई तो आजादी के सत्तर साल बाद पहली बार गांव में बिजली आई। बच्चों को पढ़ाने के लिए टयूशन क्लासेज शुरू हुए तो एक ही साल में गांव की बारह लड़कियों ने मैट्रिक की परीक्षा पास कर ली। ससुराल के गांव की ऐसी चिंता करने वाली इस महिला का नाम है रितू कुमार। इसबार सीतामढी जिले की सिंघवाहिनी ग्राम पंचायत की मुखिया चुनी गई हैं। उनके ससुराल नरकटिया समेत इस पंचायत में छह गांव हैं।
रीतू तीन साल से गांव की स्थिति बदलने के लिए काम कर रही हैं। पहले वे गांव में आती जाती थी, पर अब साल का अधिकतर समय गांव में ही बितता हैं। रीतू कुमार कहती हैं कि पहली बार जब 2013 में गांव आयीं तो गांव की पिछड़ेपन को देखकर उन्हें बहुत दुख हुआ। इसके बाद ही आने जाने का सिलसिला शुरू हुआ। न सडक] न बिजली। बच्चे स्कूल जाते तो केवल मध्यान्ह भोजन के लिए। इस सफर में उनके पति ने भी साथ दिया। वे कहती हैं कि बिजली की समस्या निपटाने में पति के संपर्को से सुविधा मिली और गांव में बिजली आ गयी। बातचीत का नतीजा हुआ कि इस बेहद पिछडे गांव में बिजली आ गई। जब बिजली आ गयी तो वे भी उत्सुकता वश बिजली देखने गांव आयी। दिन का समय था। घर में एक बल्ब जल रहा था। तभी एक महिला आई और दीए की तरह फूंक मारकर बल्ब बुझाने लगी। इसे देखकर बेहद अफसोस हुआ और गांव के लोगों के लिए कुछ अधिक करने का संकल्प भी मन ही मन हो गया। तभी से कभी दिल्ली में अधिक दिन नहीं गुजरता है।
रीतू कुमार बताती हैं कि पति और बच्चों से बात करके उन्हें अपने फैसले से सहमत कराने में अधिक कठिनाई नहीं हुई। बडे बेटे आर्यन को हास्टल भेजना पहले से तय था। वह 11वीं में था। सातवीं में पढने वाली बेटी अवनि को भी उसी साथ हास्टल भेजने का फैसला हो गया। दोनों को बंगलोर से एक आवासीय विद्यालय में भेजकर मैं निश्चिंत होकर नरकटिया गांव वापस आ गई। यहां करीब दो साल पहले गांव के बच्चों की बेहतर पढाई के लिए दो टयूटर लगवाए गए। इस दौरान कई गैर सरकारी संगठनों से संपर्क किया। उनसे गांव की स्थिति बताकर यहां काम करने के लिए प्रेरित किया। गांव में महिलाओं-लडकियों के लिए सिलाई-कढाई आदि का प्रशिक्षण देने की व्यवस्था हुई है। गांव की हालत अब सुधर रही है।
इसी दौरान पंचायत का चुनाव आ गया। गांव वालों कहने पर मुखिया पद के लिए नामांकन दे आई। जातीय समीकरणों के बावजूद चुनाव जीतने में कठिनाई नहीं हुई। सिघवाहिनी पंचायत में छह गांव हैं। नरकटिया गांव की आबादी 2300 के आसपास है। बाकी सभी गांव बड़े है। लेकिन वहां आजतक बिजली नहीं है। बच्चों की पढाई और महिलाओं के प्रशिक्षण के इंतजाम नहीं है। चुनावों पर इसका असर पडा होगा। जाहिर है कि इस जीत के साथ साथ बड़ी जिम्मेवारी आ गई है।
गांव में आये इस बदलाव के बाद..बाकी के गांव के लोगों को भी उम्मीद बंधी है कि शायद उनके गांव में भी बिजली आये] शिक्षा व्यवस्था में सुधार हो। महिलाओं का कौशल विकास हो] रोजगार बढ़े। इसी उम्मीद से जातीय समिकरण और वोट बैंक और अफरात पैसे खर्च करने वाले प्रत्याशियों के बीच से लोगों ने इस बहू को मुखिया बनाया है। उन्हें उम्मीद है कि उनके गांव में वो सारी सुविधाएं होगी जो अन्य गांवो में होती है।
इनपुट दैनिक भाष्कर

