मीनाक्षी पाल
लेखक व पत्रकार है
भारतीय हरित क्रांति के जनक एम एस स्वामीनाथन ने आज इस दुनिया को अलविदा कह दिया। 98 साल की आयु में उन्होंने अंतिम सास ली। कृषि क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें दुनिया के सबसे मशहूर पुरस्कार वर्ल्ड फूड प्राइज से नवाजा गया था। भारतीय हरित क्रांति के जनक एम एस स्वामीनाथन ने आज इस दुनिया को अलविदा कह दिया। सुबह 11:20 बजे चेन्नई में उन्होंने 98 साल की आयु में अंतिम सास ली। एम एस स्वामीनाथन को कृषि क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए हमेशा दिया किया जाएगा। भारत में गेहूं और चालव की उच्च उपज वाले उन्नत किस्मों के बीजों को विकसित करने का श्रेय उन्हें ही जाता है। उनके इस योगदान के लिए उन्हें दुनिया के सबसे मशहूर पुरस्कार वर्ल्ड फूड प्राइज से नवाजा गया है। 1960 के दशक में देश भारी खाद्यान संकट का सामना कर था। देश को खाद्यान संकट से उभारने के लिए स्वामीनाथन ने गेहूं और चावल की उच्च उत्पादन क्षमता वाली किस्मों को तैयार किया। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ मिलकर काम किया और देश को अकाल से मुक्त कराने के लिए कई नीतियां बनाने में सहयोग किया । उनकी इस पहल के बाद ही देश में हरित क्रांति का रास्ता साफ हुआ और अनाज का उत्पादन बढ़ा। हरित क्रांति का ही परिणाम है कि आज भारत दुनिया भर में अनाज का निर्यात करता है और इसमें उच्च स्थान रखता है।
कृषि क्षेत्र में दिया महत्वपूर्ण योगदान
हरित क्रांति पर काम करते हुए स्वामीनाथन ने दुनिया के कई प्रतिष्ठित सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व भी किया था। 1947 में उन्होंने रोम में आयोजित यूनाइटेड नेशन्स वर्ल्ड फूड कांग्रेस में चेयरमैन की जिम्मेदारी संभाली थी। आज देश में जितने भी कृषि विश्वविद्यालय मौजूद है उन्हें बनाने के पीछे एम एस स्वामीनाथन का महत्वपूर्ण योगदान है। इसके अलावा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् के कामकाज में भी उनका योगदान बहुत बड़ा योगदान है। वह केवल गेहूं और चावल की पैदावार में ही क्रांति नहीं लाई, बल्कि फलों और सब्जियों के क्षेत्र में भी उनका बहुत बड़ा रोल था। विदेशी कृषि क्षेत्रों में भी उन्होंने अहम योगदान दिया। इन देशों में फिलिपिंस और चीन का नाम शामिल हैं।
1947 में एम एस स्वामीनाथन ने आलू, गेंहू, चावल और जूट के अनुवांशिकी पर शोध करके अपने करियर की शुरूआत की। भारत जब अकाल का सामना कर रहा था और खाद्यान के संकट से जूझ रहा था, तब उन्होंने ने नॉर्मन बोरलॉग और अन्य वैज्ञानिकों के साथ मिलकर गेहूं की उच्च उपज वाली किस्म के बीज विकसित किए। इससे देश में लगातार गेहूं का उत्पादन बढ़ता गया और आज देश गेहूं का निर्यात करता है।
देश को अकाल से दिलाई राहत
संयुक्त राष्ट्र पार्यावरण कार्यक्रम में स्वामीनाथन को “आर्थिक पारिस्थितिकी के जनक” के रूप में जाना जाता है। 1960 और 70 के दशक में हरित क्रांति की सफलता के लिए उन्होंने सी सुब्रमण्यम और जगजवीन राम सहित कृषि मंत्रियों के साथ काम किया। इसके बाद देश में गेहूं और चावल की अधिक उपज वाली वैरायटी पर काम हुआ और उत्पादन तेजी से बढ़ने लगा।
कई राष्ट्रीय-अतंराष्ट्रीय पुरस्कार हुए सम्मानीत
एमएस स्वामीनाथन को भारत में हरित क्रांति का अगुआ माना जाता है। वे पहले ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्होंने सबसे पहले गेहूं की एक बेहतरीन किस्म को पहचाना। इसके कारण भारत में गेहूं उत्पादन में भारी वृद्धि हुई। स्वामीनाथन को कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। उनको पद्मश्री (1967), पद्मभूषण (1972), पद्मविभूषण (1989), मैग्सेसे पुरस्कार (1971) और विश्व खाद्य पुरस्कार (1987) महत्वपूर्ण सम्मान मिल चुके हैं

