भावना त्रिपाठी
उज्जैन में 12 साल की मासूम के साथ जो दरिंदगी की गई उसे पूरा देश स्तब्ध है , इंसानियत शर्मसार है। बलात्कार जैसी घिनौनी वारदात को अंजाम देने वालों को तो वो सजा मिलनी चाहिए की कोई भी दोबारा ऐसे अपराध करने की हिम्मत ना करें लेकिन अभी तक कोर्ट में पॉक्सो मामलों के 1 लाख 75 हजार केस लटके हुए है।इन आंकड़ो ने देश की चिंता बढ़ा दी है।
क्या है पॉक्सो एक्ट?
बच्चों और नाबालिगों के साथ यौन-शोषण पर रोक लगाने के लिए इस कानून को बनाया गया था।जिसमें बच्चों को यौन-शोषण से बचाने के लिए के कड़े प्रावधान बनाए गए थे। महिला और बाल विकास मंत्रालय ने 2012 में इस अधिनियम को बनाया था।
क्यों है इस एक्ट की जरूरत
बच्चें मासूम होते है उन्हें इस बात की समझ नही होती की उनके साथ जो घटना हो रही है वो सही है या गलत,कुछ हैवान बच्चों की इसी मासूमियत का फायदा उठाकर उनका शोषण करते है। मासूम बच्चों के मन पर ऐसी घटनाओं का गलत प्रभाव पड़ता है,जो लंबे अरसे तक उनकी जिंदगी को प्रभावित करता है। ऐसें मामलों में सख्ती और तेजी से कार्यवाही हो इसीलिए इस कानून को बनाया गया था,लेकिन अभी तक बड़ी संख्या में ऐसे मामले लंबित है ।
हैरान करने वाले आंकड़े
हो सकता है कि न्याय में इसी देरी के चलते अपराधियों के इरादे मजबूत हो रहे हो ।केवल दिल्ली में ही पाक्सो के 4400 से ज्यादा मामले लंबित है । पिछले चार साल में जून 2023 तक पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज 1 लाख 66 हजार मामलों को निपटाया गया है ।
यौन उत्पीड़न के शिकार मासूमों पर पड़ता है गहरा प्रभाव
भारत में बच्चों को भगवान का रूप कहा जाता है,लेकिन वहीं बच्चें दरिंदगी का शिकार होते है।मासूमों के मन पर घाव देने वाले ऐसे हैवानों के खिलाफ कानून, सरकार और पुलिस प्रशासन को सख्ती से कार्यवाही करनी चाहिए। कोमल तन-मन के साथ ऐसी बर्बरता मानवता पर बड़े सवाल खड़े करता है। कड़े कानून बनाने के बावजूद भी न्याय में देरी जनता के मन में संशय पैदा करती है और अपराधियों के मन को बेखौफ बनाती है।
