सिर्फ संचार क्रांति से नहीं, संवेदनशीलता और भाईचारे से बचेगा गांव

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पंचायत खबर टोली

नयी दिल्ली: स्मार्ट सिटी से मॉडल विलेज तक देश में विकास की चर्चा जोरों पर है। लेकिन बावजूद इसके गांव में विषमता बढ़ी है। पलायन जोरों पर है। समरसता कम हो रही है। भाईचारा टूट रहा है। गांवो में बेहतर सोच विकसित करने से ज्यादा शौचालय पर ध्यान है। यह भी जरूरी है,क्योंकि नारे गढ़े जा रहे है,शौचालय से बदलेगी सोच। मंदिर बनाम मोबाईल का बहस भी चल रहा है। आज के गांव संचार क्रांति से तो जुड़ गये हैं लेकिन संवेदनशीलता और भाईचारा वहां से खत्म हो रही है, जो उनकी विशिष्ट पहचान थी। ऐसा नहीं है कि सरकारी स्तर पर गांव के विकास के प्रयास नहीं हो रहे है। कई योजनाएं चल रही है। लेकिन यहां ठहरकर पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का  प्रसिद्ध वक्तव्य भी ध्यान रखना होगा,”केद्र से एक रूपया जाता है तो गांवो तक मात्र 15 पैसे पहुंचता है।’ अब गावों तक कितने पैसे पहुंच पा रहे हैं इसको लेकर अलग-अलग विचार हो सकते हैं। हो सकता है कि आंकड़े बेहतर हों लेकिन भ्रष्टाचार गांव के विकास को लील रहा है इसे लेकर कोई संदेह आज भी नहीं है। पंचायत स्तर पर होने वाले चुनाव में प्रत्याशियों द्वारा खर्च की जा रही करोड़ों की रकम और पूर्व केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश की टिप्पणी की सभी मुखिया अब बोलेरो पर आ गये हैं, से बढ़ते भ्रष्टाचार के संकेत अवश्य मिलते हैं।

achuta-ji_nइन्हीं सब सवालो के इर्द—गिर्द वर्तमान में गांव विषय पर विगत रविवार को राजधानी के कंस्टीट्यूशन क्लब में एक परिचर्चा का आयोजन किया गया। परिचर्चा का आयोजन जिंदगी फांडडेशन द्वारा दिवंगत साहित्यकार व पत्रकार सुरेंद्र तिवारी की याद में आयोजित किया गया। इस दौरान गांव को करीब से जानने समझने वाले वक्ताओं ने गांव में हो रहे परिवर्तन और उनकी चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की। एक आम राय बनाने की कोशिश हुई,वो सूत्र तलाशने का प्रयास हुआ कि हमारी वर्तमान गांव की व्यवस्था कैसी होनी चाहिए और इसके लिए सभी को मिलकर क्या करना चाहिए।

परिचर्चा में अपनी बात रखते हुए वरिष्ट पत्रकार अच्युतानंद मिश्र ने कहा कि महात्मा गांधी १९०९ में हिन्द स्वराज लिखने से लेकर १९३६ तक लगातार हरिजन समेत अपनी पत्रिकाओं में लिखते रहे कि गांव और उसकी संस्कृति को बचाना बहुत जरूरी है। भारत को बचाना है तो गांव को बचाना होगा। लेकिन अफसोस कि आजादी पाने के बाद बने देश के संविधान से गांधी और उनके सपने दोनों गायब थे। पश्चिमी सभ्यता जिसे वे शैतानी सभ्यता कहते थे, ने देश को बुरी तरह अपने शिकंजे में ले‌ लिया है और विकास के नाम पर शहरों की कुरीतियां और बुराइयां गांवों तक पहुंच गई हैं। अच्युतानंद मिश्र ने कहा कि गांधी जी के मार्गों पर चलकर ही गांव का विकास संभव है। इस कारण से गांधी आज भी प्रासंगिक हैं।

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स्वाधीन भारत में अंग्रेजों के समय से भी ज्यादा उपेक्षा झेल रहे गांव आज भी पलायन, गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा आदि से बुरी तरह ग्रस्त हैं। भाईचारा, संवेदनशीलता, चौपालचर्चा आदि की संस्कृति आदि को बचाया न गया तो हर गांव को दिल्ली भले ही बना दें लेकिन वह गांव नहीं रह जाएगा। क्षेत्रीय अखबारों के महत्व की चर्चा करते हुए उन्होंने बाबूराव विष्‍णु पराड़कर के उस प्रसिद्घ संपादकीय नएकपाईनएकभाई की याद दिलाई जिसको पढ़कर लोगों ने उन अंग्रेजी एजेंटों को मारकर भगा दिया था जो द्वितीय विश्वयुद्घ के दौरान हर परिवार को सेना के लिए एक व्यक्ति और एक पैसा वसूल रहे थे।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि मुख्य अतिथि मारिशस के राजदूत जगदीश्वर गोवर्धन ने मॉरीशस के गांवों की चर्चा करते हुए कहा कि वहां गांवों में आज शिक्षा स्वास्थ्य के साथ-साथ 40 तरह की सुविधाएं उपलब्ध हैं। जब भारत से मजदूर बनकर गए लोगों ने वहां के गांवों को इतना विकसित किया कर सकते हैं, तो उनके पूर्वजों के गांवों का विकास क्यों नहीं किया जा सकता है। आज जरुरत है मजबूत इच्छाशक्ति और निश्चयी नेतृत्व की। संयोग से आज भारत में यह उपलब्ध हैं। उन्होने कहा कि डेढ़ सौ साल पहले यहां गांवों से जो गये वही आज मारिशस पर राज कर रहे हैं। क्योंकि उन्होंने गांव की भरोसे, भाईचारा और श्रम की संस्कृति नहीं छोड़ी। इसलिए गांव को न छोड़ें उससे ही सबकुछ है।

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कार्यक्रम के विशिष्ठ अतिथि व पूर्व राजनयिक व चिंतक अनूप मुद्गल ने अपने संबोधन में कहा कि आज समय की मांग है कि दुनिया के अन्य देशों में जिस तरह से गांवों का विकास हुआ है। उनकी अच्छी चीजों को लेकर यहां के गांवों को भी बेहतर और सुंदर गांव बनाया जा सकता है।  भारत के गांव इसलिए पीछे हैं वे पैदा करते हैं उसका सही दाम नहीं मिलता।

जिंदगी फाउनडेशन के समन्वयक जय प्रकाश मिश्र ने कहा कि राष्टपिता महात्मा गांधी का हमेशा कहना था कि किसी देश की आत्मा गांवों में ही बसती है। गांव को केन्द्र में रखकर सामाजिक, राजनैतिक और वैचारिक तीनों स्तर पर आवाजें उठती रहीं। इसी तरह सुरेंद्र तिवारी की कृतियों के केन्द्र में गांव और उसका बिम्ब मौजूद है। उनके चिंतन और उनकी रचनाओं में भी गांव और ग्रामीण परिवेश का सुन्दर चित्रण देखने को मिलता है। कार्यक्रम का संचालन वरिष्ट पत्रकार ओंकारेश्वर पांडे ने किया।

उडान के लेखक राजेश सक्षम को सुरेंद्र तिवारी सम्मान

युवा रचनाकार, नाटककार और वर्तमान में अपनी लेखनी से गांवों को केन्द्र में रखते हुए टेलीविजन धारावाहिकों के लेखक राजेश सक्षम को उनकी कृतियों के लिए सुरेंद्र तिवारी स्मृति सम्मान दिया गया। सक्षम कलर्स चैनल पर उड़ान, सोनी टीवी पर चक्रवर्तीन अशोक, वीर शिवाजी, झांसी की रानी, कहानी घर-घर की, महाराणा प्रताप, युग जैसे धारावाहिक के लेखक हैं। पुरस्कार चयन मंडल ने सक्षम का चयन लेखन के क्षेत्र में बेहतर एवं सतत् योगदान के लिए किया है। गांव को केंद्र में रखकर वह अपनी रचनाओं को बुनते हैं। सम्मान में स्मृति चिन्ह, सम्मान पत्र, शॉल और नगद राशि से नवाजा गया।

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