स्वामिनाथन अंक्लेसरिया अय्यर
( टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित उनके कॉलम स्वामिनॉमिक्स का पुष्यमित्र द्वारा हिंदी अनुवाद)
भारतीय गरीबों के कल्याण के लिए सरकार द्वारा धूमधाम से लागू किये गये महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून(मनरेगा) को 10 साल बीत चुके हैं। भारत लगातार दो वर्षों से सुखाड़ का कहर झेल रहा है, ऐसे में गांव के लोगों को परेशानी से निजात दिलाने के लिए ग्रामीण कार्य काफी महत्वपूर्ण साबित होते हैं।लेकिन मुझे अपने उस दावे को पेश करने दें, जिसे दिसंबर, 2009 में मैंने अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज के सामने रखा था। मैंने कहा था मजदूरी आधारित ग्रामीण कार्यों का अपना महत्व है और वे अकाल के समय में गांवों की दुश्वारियों को कम करते हैं, मगर मिट्टी की सड़क और तटबंध बनाने या तालाबों से गाद निकालने का लंबे समय तक प्रभाव काफी सीमित होता है। इसलिए पूंजी आधारित ग्रामीण निवेश ही एक मात्र दीर्घ कालीन समाधान है। 1970 के दशक में अफ्रीका का सेहल और महाराष्ट्र दोनों जगह कई अकाल पड़े. अमर्त्य सेन और ज्यां द्रेज ने बताया कि महाराष्ट्र में प्रति व्यक्ति भोजन की उपलब्धता सेहल के मुकाबले आधी थी। फिर भी ग्रामीण रोजगार की वजह से महाराष्ट्र में भुखमरी नहीं हुई, जबकि सेहल में ग्लोबल फूड एड द्वारा फ्री किचेन चलाने के बावजूद बड़े पैमाने पर लोग भुखमरी का शिकार हुए। अकाल वस्तुतः पैसों की कमी की वजह से आता है, भोजन की कमी की वजह से नहीं और अगर ग्रामीण रोजगार से कम पैसे मिल रहे हैं तो बाजार खाद्य पदार्थों को वहां ले जायेगा जहां पैसे हैं। सेन और द्रेज ने मुझे महाराष्ट्र के रोजगार गारंटी योजनाओं का बड़ा समर्थक बना दिया, जो उन तमाम लोगों के लिए रोजगार की गारंटी था, जो इसकी मांग करते थे। मगर 1996 में मैं तब भ्रम में पड़ गया जब मैंने देश के विभिन्न राज्यों में गरीबी के घटने की दर की तुलना करने लगा, महाराष्ट्र की गरीबी घटने की दर राष्ट्रीय औसत से तेज नहीं थी। इस रोजगार गारंटी स्कीम की तारीफ बेहतरीन क्रियान्वयन के लिए दुनिया भर के विशेषज्ञों ने की थी, यहां भ्रष्टाचार और लीकेज का कोई मामला नहीं था जो आज विभिन्न राज्यों में लागू मनरेगा के साथ हो रहा है।
1994 में नरसिंहा राव की रोजगार सुरक्षा योजना ने 200 पिछड़े जिलों में सौ दिन प्रति परिवार की दर से रोजगार उपलब्ध कराना शुरु किया। यह ठीक वहीं है जो 2005 में लागू हुआ कानून मनरेगा कर रहा है। ग्रामीण रोजगार 1990-91 के 87.5 करोड़ व्यक्ति-दिवस से बढ़ कर 1995-96 में 123.2 करोड़ व्यक्ति-दिवस तक पहुंच गया। इसके बावजूद 1996 में कांग्रेस चुनाव में बुरी तरह पराजित हुई। स्पष्ट है, 2008 के बाद ग्रामीण मजदूरी दोगुनी हो गयी।पहली तो इस वजह से कि भारत समेत दुनिया भर में खाद्य पदार्थों की कीमत में बढ़ोतरी हुई, जिसकी वजह से जगह-जगह मजदूरी बढ़ाने की मांग की जाने लगी। दूसरी वजह यह थी कि भारत में जीडीपी ग्रोथ में उछाल की वजह से लोगों की जीवन शैली बेहतर हुई, लोग लो-इनकम से मिडिल इनकम क्लास में पहुंच गये और उन्होंने महिलाओं को शारीरिक श्रम के कामों से हटा लिया, स्टेटस सिंबल के तौर पर। 2004 से 2011 के बीच 4 करोड़ महिलाओं ने ग्रामीण कार्य से नाता तोड़ लिया, जिससे मजदूरों की कमी हो गयी और मजदूरी में उछाल आ गया। इन हालात ने मनरेगा पर क्या असर डाला? विश्व बैंक के मेहताबुल आजम ने इसका आकलन करने के लिए इस प्राकृतिक प्रयोग का फायदा उठाया। 2006 में, मनरेगा सिर्फ 200 जिलों में लागू कराया गया था। मनरेगा वाले जिलों की दूसरे जिलों से तुलना करते हुए आजम ने पाया कि पुरुषों की मजदूरी में महज 1 फीसदी और महिलाओं की मजदूरी में 8 फीसदी बढ़ोतरी हुई है। दोनों तरह के जिलों में महिला मजदूरों की भागीदारी में गिरावट दर्ज की गयी है, हालांकि मनरेगा जिलों में यह गिरावट कम थी. इसका मतलब यह था कि मनरेगा ने मजदूरी की दर में बहुत कम फर्क पैदा किया है, हां पुरुष-महिला मजदूरी की दर का अंतर पाटनें में बढ़ी भूमिका अदा की है। नतीजा- मनरेगा का असली फायदा लिंग आधारित मजदूरी के फर्क को खत्म करना था, भारत में 2008 के बाद जो मजदूरी बढ़ी है उसकी वजह खाद्यान्नों की कीमत में उछाल, तीव्र जीडीपी विकास और महिला श्रमिकों की कमी है,
योजना आयोग के पूर्व सदस्य एनसी सक्सेना ने मनरेगा की तुलना प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना से की है, जो गांवों को महंगी कोलतार वाली सड़कों से जोड़ती है, मनरेगा वाली मिट्टी की सड़क से नहीं। उत्तर प्रदेश में 4.8 करोड़ गरीब हैं और बिहार में 3.2 करोड़, मगर इन दोनों राज्यों ने मनरेगा पर प्रति गरीब व्यक्ति सिर्फ 411 और 165 रुपये क्रमशः व्यय किये हैं. जबकि केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों ने 9,655 और 5,237 रुपये प्रति गरीब व्यक्ति खर्च किये हैं। जबकि इन राज्यों में क्रमशः 15 लाख और 59 लाख ग्रामीण गरीब ही हैं। निश्चित तौर पर, समृद्ध और बेहतर प्रशासित दक्षिणी राज्य बेहतर काम कर रहे हैं और ज्यादा खर्च कर रहे हैं। सक्सेना चाहते हैं कि इसे बदला जाना चाहिये। इसकी तुलना में पीएमजीएसवाई द्वारा वित्त पोषित ग्रामीण सड़क योजना की बात करते हैं। 2012-13 में बिहार ने इसमें 1992 करोड़ रुपये व्यय किये जबकि तमिलनाडु ने सिर्फ 21 करोड़ और 2014-15 में इस मद में मनरेगा की तुलना में दोगुना व्यय किया (2,259 करोड़) मनरेगा का बजट 1,073 करोड़ था. क्या इस प्राथमिकताओं ने बिहार में गरीबी उन्मूलन में मदद की? हां, 2004 में यहां ग्रामीण गरीबी 55.7 फीसदी थी जो 2011 में घट कर 34.1 फीसदी रह गयी। लालू राज में बिहार का योजना व्यय आकार जो महज 2000 करोड़ था वह 2014-15 30 हजार करोड़ तक पहुंच गया। यह पूंजी केंद्रित गरीबी उन्मूलन था, न कि श्रम केंद्रित। नीतीश कुमार ने अपने पहले टर्म में गैंगस्टरों को जेल भेजने में और बड़े पैमाने पर सड़क निर्माण करने में केंद्रित किया। अपने दूसरे टर्म में उन्होंने सड़क निर्माण तो जारी ही रखा बल्कि बिजली उत्पादन को बढ़ा कर तीन गुना कर दिया और 3,300 मेगावाट तक पहुंचा दिया, इस अवधि में टेलिकॉम पेनिटरेशन भी बढ़ा. इसने बिहार को दो अंकों वाली जीडीपी तो दी ही गरीबी उन्मूलन में भी कारगर साबित हुआ। इस कॉलम के जरिये मैं अपने उस पुराने डिबेट को याद कर रहा हूं जब मैंने तर्क दिया था कि मनरेगा एक प्राथमिक उपचार है, गरीबी उन्मूलन को कारगर बनाने के लिए पूंजी केंद्रित ग्रामीण निवेश की जरूरत है। आज, मैं अपनी जीत का दावा कर रहा हूं।
