माही महेश चौहान
बालाघाट: बिहार की तर्ज पर मध्य प्रदेश में भी मखाने की खेती होगी। इसके लिए राज्य सरकार ने प्रयोग शुरू कर दिए हैं। कृषि मंत्री गौरीशंकर बिसेन के गृह जिले में इसे लेकर मत्स्य विभाग ने प्रयोग शुरू किया है। रबी सीजन में जिन खेतों में धान की फसल नजर आती थी, प्रयोग सफल हुआ तो उन खेतों में मखाने की फसल नजर आएगी। इस प्रयोग की राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी सराहना की है। मखाने की खेती को जैविक कृषि की दिशा में बेहतर कदम कहा गया है। ऐसे गहरे खेत जहां धान की फसल नहीं लग पाती है, वहां किसान मखाने की खेती कर सकेंगे। इसके लिए विभाग ने बतौर प्रयोग जिले के दो किसानों के गहरे खेतों में मखाने की फसल लगाई है।
अनुकूल है वातावरण : बालाघाट में ज्यादातर किसान खेतों को तालाब के रूप में बनाए हुए हैं, जिनमें वर्ष भर पानी भी बना रहता है। मखाने की खेती के लिए ऐसे ही खेतों को चुना जा रहा है। यह गर्म जलवायु वाला जिला है जो मखाने की खेती के अनुकूल है।
तीन एकड़ में हुआ प्रयोग : जिले के किसानों को परंपरागत खेती के साथ ही अन्य फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित करने के लिए वैज्ञानिकों ने अनुसंधान केंद्र बिहार से मखाने के बीज लगाकर कासपुर के किसान छगन हनवत के गहरे पानी वाले खेत में दो एकड़ व किसान चैनसिंह बैस के एक एकड़ खेत में प्रयोग के तौर पर फसल लगाई है।
ऐसे होती है मखाने की खेती
-खेत व तालाबों में दो से ढाई फीट पानी होना चाहिए।
-दिसंबर से जनवरी माह के बीच बीज लगाए जाते हैं।
-पानी की निचली सतह पर बीज डाला जाता है। एक से डेढ़ मीटर की दूरी पर इसके बीजों को बोया जाता है।
-एक हेक्टेयर में करीब 80 किलो बीज लगता है। अप्रैल माह में यह फूलने लगता है।
-इसका फूल तीन-चार दिन तक रहता है, इस दौरान इसमें बीज पड़ने लगते हैं।
-जून-जुलाई माह में 24-48 घंटे इसके फल पानी की सतह पर तैरते हैं। इसके बाद वे नीचे जम जाते हैं।
-इसके फल कांटेनुमा कवच से ढके होते हैं, जिनके कांटे गलने में 1-2 माह का समय लगता है।
-सितंबर-अक्टूबर से इसे नीचे की सतह से निकाला जाता है।
-उत्पादन एक एकड़ में ढाई से चार क्विंटल तक होता है।कासपुर गांव में प्रयोग के तौर पर लगाई गई मखाना की फसल।
