मध्यप्रदेश: खाटला और तड़वी बैठक से मिली आदिवासी और जनजातीय जिलों में टीकाकरण को गति

विक्रम मजूमदार

भोपाल: मध्यप्रदेश की एक बड़ी आबादी में आदिवासी और जनजातीय समाज की बहुलता है। जिनकी आजीविका जंगलों और जड़ी बूटियों पर आश्रित है। परंपरागत लोकाचार से जुड़े समुदाय के लोगों को वैक्सीन के लिए प्रोत्साहित करना खासा चुनौतीपूर्ण रहा। लेकिन इन ईलाकों में जिला प्रशासन, राज्य और जिला स्तरीय स्वास्थ्य टीम ​के सा​थ मिलकर ने खाटला और तड़वी के माध्यम से टीकाकरण को प्रचारित प्रसारित कर टीकाकरण की आसान बना रहे हैं। खुद जिलाधिकारी इन बैठकों में राज्य टीकाकरण अधिकारी,जिला टीकाकरण अधिकारी और यूनिसेफ व अन्य स्वयंसेवी संस्थाओं के प्रतिनिधियों को साथ लेकर टीकाकरण से जुड़ी भ्रांतियों को दूर करने का हर संभव प्रयास कर रहे हैं और आदिवासी व जनजातीय समाज की बहुलता वाले इन ईलाकों में काफी फायदा मिलता दिख रहा है और टीकाकरण की प्रक्रिया तेज गति से चल रही है।

​देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी विभिन्न जिलों के जिलाधिकारियों से कोरोना टीकाकरण के पर आयोजित बैठक में कहा था कि जिलाधिकारियों पर कोरोना टीकाकरण की बड़ी जिम्मेवारी है और ​इन जिलों में जिलाधिकारी अपनी भूमिका निभाते दिख भी रहे हैं और उनके ​नेतृत्व में कोरोना टीकाकरण को लेकर फैली भ्रांति मिटाने और ज्यादा से ज्यादा वैक्सीनेशन करवाने के लिए जिला प्रशासन हर जतन कर रहा है। खाटला और तड़वी के जरिए इन गांवों, पंचायतों तक पहुंचने की कवायद उसी प्रक्रिया का हिस्सा है। इस संवाद की प्रक्रिया में खुद जिलाधिकारी सहित विशेषज्ञ टीकाकरण से जुड़ी हर छोटी-बड़ी बातों पर चर्चा कर लोगों को हर पहलुओं से अवगत करा रहे हैं। संदेश दे रहे हैं कि टीका लगवाने के बाद बुखार आना, बदन दर्द होना सामान्य सी बात है इसको लेकर किसी तरह की शंका मन में न रखे और बिना किसी संदेह के पूरे परिवार के साथ टीका लगवाएं। टीका किसी को हानि पहुंचाने के लिए नहीं बल्कि कोरोना जैसी घातक बीमारी से बचाने के लिए लगाया जा रहा है। वरीय स्तर पर ग्रामीणों को समझाइश देते हुए ​अधिकारी यह समझाने का प्रयास कर रहे हैं कि आप इस बीमारी को हल्के में ना ले। आप जागरूकता का परिचय देते हुए टीकाकरण अवश्य करवाए।
विशेष टीकाकरण अभियान का हो रहा है जमीनी फायदा
स्थानीय और प्रशासनिक स्तर पर चलाए गए विशेष टीकाकरण अभियान के जरिए मध्यप्रदेश में 17 जून तक एक करोड़ पचास लाख लोगों को कोरोना का वैक्सीन दिया गया। कोरोना वैक्सीन के लिए जनजातीय और आदिवासी समाज में विश्वास दिलाना आसान नहीं था। वैक्सीन के ड्राई रन में यह बात समझ ली गई थी। तकनीकी सहायता से वैक्सीन को लगवाना आसान नहीं होगा। ग्राउंड जीरो पर जाकर लोगों को उनकी ही भाषा में और उनके ही समुदाय के द्वारा वैक्सीन के बारे में बताना होगा।
क्या कहते हैं अधिकारी
मध्यप्रदेश के राज्य टीकाकरण अधिकारी डॉ. संतोष शुक्ला ने बताया मध्यप्रदेश के 89 आदिवासी और जनजातीय  ब्लॉक में कोरोना वैक्सीन के लिए लोगों को राजी करना लगभग असंभव था। यहां बीमारी आदि के लिए लोग जड़ी बूटियों का प्रयोग करते हैं।
आदिवासी और जनजातीय समुदाय में एक अहम धारणा यह है कि बीमार होने पर ही सूई लगती है, इससे पहले पोलियो ड्राप दिया गया लेकिन कोविड में सूई लगवाने के लिएकोई राजी नहीं हुआ, शुरूआती दिनों में स्टॉफ को बिना टीकाकरण के वापस आना पड़ा। इसके बाद जिला स्तरीय योजना बनाई गई, जिसमें स्थानीय लोगों में प्रचलित खाटला और तड़वी बैठके की गईं, इन बैठकों में सभी छोटे बड़े स्वास्थ्य अधिकारियों से हिस्सा लिया। शहडोल की एक पंचायत में शत प्रतिशत टीकाकरण किया जा चुका है।
डॉ. संतोष ने बताया कि जिस समय राज्य में टीकाकरण शुरू हुआ, उस समय संक्रमण दर भी अधिक थी, इससे लोगों में भ्रम बन गया कि वैक्सीनसे संक्रमण हो रहा है। सामुदायिक स्तर पर भ्रांतियों को दूर करने के लिए कम्युनिटी रेडियो वान्या और माइकिंग की सहायता ली गई। पहली बार राज्य में वैक्सीनेशन ऑन व्हील ड्राइव शुरू किया गया, जिसमें कोई भी वैक्सीन ले सकता है।


क्या कहते हैं जिलाधिकारी
राज्य के शहडोल जिले के जिलाधिकारी डॉ. सत्येन्द्र सिंह ने बताया कि जिला स्तर पर टीकाकरण को गति देने के लिए कुछ अधिकार दिए गए, हमने इस क्रम में पिंक कार्ड की शुरुआत की, जिन लोगों ने कोविड की पहली डोज लगवाईउन्हें पिंक कार्ड दिया गया। जिसका प्रयोग लोगों ने आवाजाही के लिए करना शुरू किया, अब सबको लगने लगा कि पिंक कार्ड बिना घर से बाहर नहीं निकल पाएगें, इसके बाद धीरे धीरे बड़ी संख्या में लोग वैक्सीन के लिए आने लगे।कंट्रोल रूम के जरिए टीकाकरण से जुड़ी समस्याओं को सुना गया।

खाट बैठकों का हुआ है फायदा
झाबुआ के जिला टीकाकरण अधिकारी डॉ. राहुल गनावा ने बताया जिला स्तरपर “किल कोरोना” की टीम बनाई गई, पंचायत स्तर पर किए गए प्रयास का सफल परिणाम मिला, झाबुआ और शहडोल जिले में खाटला और तड़वी सालों से प्रचलित है। समाज के किसी अहम फैसले को लेने के लिए समाज में तड़वी प्रतिनिधि की बात सभी सुनते है। यह खाप पंचायत जैसे प्रक्रिया होती है। इसके साथ ही खाटला यानि खाट बैठके आयोजित की जाती है, जिसमें पंचों की सहमति से फैसले को समुदाय के लोग स्वीकार करते हैं। अकेले झाबुआ जिले में तीस प्रतिशत टीकाकरण हो चुका है, आठ आबादी वाले जिले में 1,10,266 को कोविड वैक्सीन लगाया जा चुकाहै।

नसबंदी में आगे जिले भी टीकाकरण को हुए राजी

मध्यप्रदेश के दो जिले, मंडला और डिंडोरी में नसबंदी सबसे अधिक प्रचलित है। इन जिलों में कोविड वैक्सीन लगाने से पहले लोगों में भ्रम था कि वैक्सीन के जरिए नसबंदी तो नहीं की जा रही, यहां के एक बड़े समुदाय में धारणा थी कि उनके शरीर पर गुदवाए गए परंपरागत टैटू के बाद उन्हें वैक्सीन की जरूरत नहीं है। इस जिलों में बताया कि गया नसबंदी के लिए ऑपरेशन करना पड़ता है, जबकि कोरोना की वैक्सीन आपको बीमारी से बचाएगी, बड़े स्तर पर चले जागरूकता अभियान के बाद लोगों ने वैक्सीन को लगाना स्वीकार किया।

राज्य में टीकाकरण का प्रतिशत

18 से 44 साल तक- 59.9 लाख

45 से 59 तक – 49.4 लाख

साठ साल से ऊपर- 32 लाख

उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश में कुल एक करोड़ पचास लाख लोगों को कोविड का वैक्सीन लग चुका है, 20.4 लाख को कोविड वैक्सीन की दोनों डोज दी जा चुकी हैं।                                                 ………आदिवासी और जनजातीय

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