जिनके हाथ पतवार..वही डूबा रहे हैं नाव..विकास में गतिरोध बने निदेशक प्रसार, 2014-15 में 1.90 लाख का भुगतान बिल रोका
पंचायत खबर टोली
मऊ : पिलखी का सपना टूटता जा रहा है। किसानों की उम्मीद छूटती जा रही है। पिलखी यानी जिले का कृषि विज्ञान केंद्र। न तो संचालकों में किसी तरह का समन्वय दिख रहा है और न ही दूरदृष्टि। आपसी समन्वय के अभाव, अनियोजित कार्यक्रम और दाव पेंच के कारन यह केवीके बुरे हाल में है। संचालन का दायित्व निभाने वाले निदेशक प्रसार ही इसके विकास में बाधा बन गए हैं। नीतिगत लकड़पेंच और अापसी वर्चस्व की लड़ाई में गत वित्तीय वर्ष के कार्यों के भुगतान का 1.90 लाख उन्होंने रोक दिया है। इसके साथ ही इस सीजन में प्रक्षेत्र व कृषक प्रयोग के लिए धन का आवंटन नहीं किए जाने से खरीफ के सभी प्रयोगों पर ग्रहण लग गया है।
कल्पनाथ का सपना था पिलखी
जिले के प्रणेता पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वर्गीय कल्पनाथ राय के अथक प्रयास से 52 एकड़ क्षेत्रफल में कृषि विज्ञान केंद्र की स्थापना केंद्रीय कृषि मंत्री भजन लाल द्वारा 17 जून 1989 में रतनपुरा ब्लाक के पिलखी गांव में की गई। यहां बिजली-पानी और संसाधनों की कमी से लगभग सभी इकाईयां मृतप्राय हो गई हैं। इसकी न कोई सुधि लेने वाला है न ही किसी को चिंता है। भूकंपीय प्रभाव से भी संस्थान को क्षति पहुंची है। नीतिगत अपंगुता व राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में देश का सबसे बड़ा कृषि विज्ञान केंद्र दरकने लगा है।
फट रही दीवारें मशीनों में जंग, कब्जे में है प्रक्षेत्र
कृषि विज्ञान केंद्र के 52 एकड़ प्रक्षेत्र में आठ एकड़ में परिसर है। इसमें गृह विभाग भवन, किसान भवन, 17 कर्मियों के आवास, एक गेस्ट हाऊस के साथ कार्यालय स्थित है। केंद्र पर प्रभारी व छह मुख्य वैज्ञानिकों के साथ 14 लोगों का स्टाफ है। गृह विज्ञान वैज्ञानिक के साथ कंप्यूटर प्रोग्रामर का पद स्वीकृत, पर कर्मी नहीं हैं। गत दिनों आए भूकंप से मुख्य कार्यालय की दीवारों में दरार आ गई है। किसी कर्मचारी के न रहने के कारण आवासीय भवन बेकार और जर्जर होने की हालत में हैं। चारों तरफ घास व जंगली पौधों का अंबार लगा हुआ है। दीवारों को फाड़ कर उगते पीपल व पाकड़ के पेड लगभग सभी आवासों पर देखे जा सकते हैं। 32 एकड़ प्रक्षेत्र में वन, मछली, तालाब सहित फसल प्रयोग के प्रक्षेत्र हैं, शेष 12 एकड़ पर स्थानीय लोगों ने कब्जा कर रखा है। केंद्र पर उपलब्ध संसाधनों में ट्रैक्टर अपना अंतिम दिन गिन रहा है। ट्राली सड़ चुकी है। जीरो-टिल मशीन व थ्रेशर में जंग लग गए है। लकड़ी पट्टे पर स्टार्ट व मोटर बांधकर चलने वाला परिसर का एकमात्र ट्यूबवेल दो वर्ष से खराब पड़ा है। केंद्र द्वारा विश्वविद्यालय स्तर पर कई बार पत्राचार करने के बाद भी यह अबतक नहीं बन पाया है। प्रक्षेत्र के सिचाईं की बात तो दूर यहां पीने का पानी भी बाहर से लाना पड़ता है।
जिले को दिया जीरोटिल तकनीकी का वरदान
इतनी परेशानियों के बाद भी कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा जिले को जीरोटिल तकनीकी के रुप में वरदान दिया गया है। सूखा व बाढग्रस्त क्षेत्रों में मशीन से धान की सीधी बोआई के रुप में कृषि विज्ञान केंद्र ने किसानों को नई तकनीकी से परिचित कराया। कम लागत में धान की नर्सरी डालने व रोपाई से मुक्ति देने वाली इस तकनीकी का प्रयोग दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। सिमीट परियोजना से मिली 10 जीरोटिल मशीनों में से नौ ब्लाकों में तथा एक केंद्र पर माडल के रुप में रखा गया। गत खरीफ में 740 हेक्टेयर प्रक्षेत्र पर धान की बोआई जीरोटिल मशीन से की गई थी। इस वर्ष यह आंकड़ा और भी अधिक होने की प्रबल संभावना है। जिले में बीज अनुसंधान निदेशालय व राष्ट्रीय उपयोगी कृषि सूक्ष्मजीव ब्यूरो होने के बाद भी जीरोटिल प्रणाली के विकास का श्रेय कृषि विज्ञान केंद्र को ही जाता है।

