कृष्ण जन्मोत्सव के रंग में रंगा देश.. ऐसे करें जन्माष्टमी की पूजा

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अक्षत सरोत्री

नई दिल्ली: सनातन धर्म में कृष्ण जन्माष्टमी के त्योहार का विशेष महत्व है। क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु ने आठवें अवतार के रूप में भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ था। कहा जाता है भगवान श्री कृष्ण ने धरती को कंस के अत्याचारों से मुक्ति दिलाई थी। इसलिए ही कृष्ण जन्मोत्सव बेहद ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

हिंदू पंचांग के अनुसार इस साल श्री कृष्ण भगवान का 5251वां जन्मोत्सव मनाया जा रहा है। मान्यताओं के अनुसार भगवान कृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में रात 12 बजे हुआ था। इसलिए ही हर साल इस दिन पर कृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाती है। जिसे कृष्णाष्टमी, अष्टमी रोहिणी, गोकुलाष्टमी, श्रीकृष्ण जयन्ती और श्री जयन्ती के नाम से जाना जाता है। ऐसी मान्यता है कि जन्माष्टमी के दिन भगवान कृष्ण की पूजा करने से घर में सुख, शांति और समृद्धि आती है। जीवन में आने वाले कष्टों से छुटकारा मिलता है।

मात्र 44 मिनट का होगा शुभ मुहुर्त

लेकिन इस साल जन्माष्टमी के पर्व पर भगवान कृष्ण की पूजा और जन्मोत्सव के लिए श्रद्धालुओं के पास मात्र सिर्फ 44 मिनट का समय होगा। ऐसी मान्यता है कि शुभ मुहुर्त में पूजा करने से ही लोगों को पुण्यफल की प्राप्ति होती है। घर परिवार के सभी लोगों पर भगवान कृष्ण का आशीर्वाद बना रहता है।

जन्माष्टमी की पूजा सामग्री

धूप बत्ती और अगरबत्ती, यज्ञोपवीत 5, अक्षत, पान के पत्ते, सुपारी, पुष्पमाला, केसर, कपूर, आभूषण, रुई, तुलसीमाला, कमलगट्टा, सप्तधान, गंगाजल, शहद, अबीर, गुलाल, पंच मेवा, शक्कर, गाय का घी, गाय का दही, गाय का दूध, ऋतुफल, छोटी इलायची, सिंहासन, झूला, तुलसी दल, कुश व दूर्वा, हल्दी, कुमकुम, आसन, मिष्ठान्न, बाल स्वरूप कृष्ण की प्रतिमा, रोली, सिंदूर, चंदन, भगवान के वस्त्र, नारियल, फूल, फल, मोर पंख, गाय बछड़े सहित, केले के पत्ते, औषधि, पंचामृत, दीपक, मुरली, माखन, खीरा।

इस विधि विधान से करें जन्माष्टमी की पूजा

जन्माष्टमी व्रत सूर्योदय से शुरू होकर अगले दिन सूर्योदय तक रखा जाता है। जो कोई भी इस व्रत को करता है उसे व्रत से एक दिन पहले यानि की सप्तमी तिथि को हल्का और सात्विक भोजन ही करना चाहिए। इसके बाद जन्माष्टमी के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करने के बाद व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इस व्रत में अन्न ग्रहण नहीं किया जाता। लेकिन फलाहार ले सकते हैं। पूरे दिन व्रती व्रत रहने के बाद रात में 12 बजे विधि विधान भगवान कृष्ण की पूजा करते हैं। इसके बाद व्रत का पारण करते हैं। वहीं कई लोग जन्माष्टमी व्रत का पारण अगले दिन सूर्योदय के बाद करते हैं।

जन्माष्टमी के 56 भोग की सूची

भात, सूप, चटनी, कढ़ी, दही, बटक, मठरी, चोला, जलेबी, मेसू, रसगुल्ला, शाक की कढ़ी, सिखरन, शरबत, बालका, इक्षु, पगी हुई महारायता, फेनी, पूड़ी, खजला, घेवर, मालपुआ, थूली, परिखा, सौंफ युक्त बिलसारू, लड्डू, साग, लौंगपुरी, खुरमा, दलिया, अधौना अचार, पापड़, गाय का घी, सीरा, लस्सी, सुवत, मोहन, सुपारी, इलायची, फल, मोठ, खीर, दही, मोहन भोग, लवण, कषाय, मधुर, तिक्त, कटु, मक्खन, मलाई, रबड़ी, तांबूल और अम्ल।

जन्माष्टमी के प्रसाद की सूची
धनिया पंजीरी
माखन मिश्री
तुलसी के पत्ते
मखाना पाग
चरणामृत
मेवा खीर

इन मंत्रों का करें जाप

1.ॐ कृष्णाय नमः

2.हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे …

3.ॐ श्री कृष्णः शरणं ममः

4.ॐ देव्किनन्दनाय विधमहे वासुदेवाय धीमहि तन्नो कृष्ण:प्रचोदयात

5.ॐ नमो भगवते तस्मै कृष्णाया कुण्ठमेधसे। …

क्यों काटा जाता है खीरा

कृष्ण जन्माष्टमी की पूजा के समय खीरा काटा जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि जन्माष्टमी पर खीरे के तने को बच्चे की नाल समझकर श्री कृष्‍ण जी जन्‍म के वक्त काटा जाता है। दरअसल इस दिन खीरे को भगवान कृष्ण के माता देवकी से अलग होने के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। कई जगह इस दिन खीरा काटने की प्रक्रिया को नल छेदन भी कहा जाता है।

जाहिर है प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी जन्माष्टमी के मौके पर भगवान कृष्ण के सभी मंदिरों को सजाया जाता है। भगवान कृष्ण के जन्मदिन के उपलक्ष्य में विभिन्न प्रकार की झाकियां सजाई गई हैं। श्रीकृष्ण का भव्य श्रृंगार की तैयारी है और लड्डू गोपाल के लिए झूला भी सजाया गया है। ऐसी मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण की विधि विधान से पूजा करने से लोगों की हर मनोकामना पूरी होती है और आने वाले कष्टों से मुक्ति मिलती है।

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