उन्नत बीज का करें प्रयोग..लहलहायेगी दलहन की फसल

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 देश में अलग-अलग जगहों पर स्थित कृषि विज्ञान केंद्र से जुड़े कृषि वैज्ञानिक हमारे किसान भाईयों को दलहन की खेती की ओर उन्मुख करने,इसकी पैदावार बढ़ाने को प्रेरित कर रहे हैं,ताकि दलहनी फसलों की कमी दूर हो। गाजीपुर स्थित कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ट वैज्ञानिक डॉ धर्मेंद कुमार सिंह से दलहनी फसलों के उत्पादन से जुड़े विभिन्न पहलूओं पर बातचीत की पंचायत खबर के रोविंग एडिटर अमितेश सिंह (अवैतनिक) ने। पेश है बातचीत के प्रमुख अंश…
1. किसान भाई रबी फसलों की बुआई की तैयारी में हैं। स्वाभाविक है वे दलहन की फसल भी लगाएंगे ऐसे में वे किस तरह से खेत की तैयारी करें, कौन सा बीज बेहतर होगा..इसकी चिंता होगी। इस संदर्भ में आपका क्या सुझाव होगा?
निश्चित तौर पर दलहन की फसल रबी मौसम में लगाए जाने वाली फसलों में महत्वपूर्ण है। वैसे तो पीढ़ियों से देश में दलहन की खेती होती है। किसान भाई परिचित हैं कि उनकी जरूरते क्या है, फिर भी एक विशेषज्ञ के नाते कृषि विज्ञान केंद्र के तरफ से हमारा सुझाव है कि किसान भाई ये बखूबी समझ लें कि जैसा खेत होगा वैसी फसल होगी। जैसी मिट्टी होगी उसके अनुरूप फसल लगाने से पैदावार अच्छी होती है। जहां तक दलहनी फसलों का सवाल है तो दलहनी फसलों की खेती के लिए हल्की दोमट तथा दोमट भूमि अधिक उपयुक्त होती है।दलहनी फसलों की खेती के लिए प्रथम जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा दो तीन जुताईयां देशी हल या कल्टीवेटर से करनी चाहिए। आमतौर पर दलहनी फसलों की बुवाई  के उपयुक्त समय की बात करें तो यह अक्टूबर के मध्य व नवंबर के मध्य तक की जा सकती है।

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2.अक्सर देखा गया है किसान खेत की तैयारी के बाद बीज को लेकर उहापोह की स्थिति में होता है? उसकी चिंता होती है कि कौन सा बीज लगाया जाये, कितनी मात्रा हो?
जी हां, इस दिशा में काफी शोध किया गया है। उन्नत बीज विकसित करने का काम कृषि विद्यालयों द्वारा निरंतर किये जाते रहे हैं। जहां तक दलहन का प्रश्न है तो मालवीय 15 (एचयूभी—15) सबसे अधिक उत्पादन देने वाली प्रजाती है, जो काशी हिंदू विश्वविद्यालय से विकसित प्रजाति है। 80—100 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर लम्बे पौधे की प्रजातियों हेतु तथा सभी बौनी प्रजातियों के लिए 125 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज की मात्रा उपयुक्त होती है।

3. किसान की फसल रोग से बची रहे इसके लिए क्या सुझाव देंगे। क्या वह खेत में बीज डालने के समय ही इस दिशा में सावधानी बरते। यदि हां, तो उसे क्या सावधानी रखनी चाहिए?
दलहनी फसलों में बीज जनित रोग से बचाव के लिए थीरम 2 ग्राम या मैकोजेब 3 ग्राम या 5 ग्राम ट्राईकोडरमा अथवा थीरम 2 ग्राम प्लस एक ग्राम कैवेन्डाजिम प्रति केजी बीज की दर से बीज को बोने से पूर्व शोधित करना चाहिए। हमारा सुझाव है कि दलहनी फसलों के बीजों का उपचार राइजोवियम नामक कल्चर से अवश्य करना चाहिए। इसके लिए राइजोवियम का 200 ग्राम का एक पैकेट 10 केजी बीज के लिए पर्याप्त होता है। साथ ही दलहनी फसलों में फास्फोरस तत्व की उपलब्धता बढ़ाने हेतु फास्फोरस जीवाणु घोलक का प्रयोग अवश्य करना चाहिए।

pppppk_o4. सरकार मृदा परीक्षण के कार्यक्रम काफी प्रचारित कर रही है। क्या दलहनी फसलों के लिए भी मृदा परीक्षण कराया जाना चाहिए या इसकी खेती किसी भी भूमि में की जा सकती है?
देखिए, मृदा परीक्षण का कार्यक्रम ही इसिलिए चलाया जा रहा है कि किसानों को पता हो कि कौन सी भूमि किस फसल के लिए ज्यादा उपयुक्त है। इससे किसानों को काफी फायदा मिल रहा है। केवल बीज की बात नहीं परीक्षण के पश्चात हमारे किसान भाई यह भी जान पाते हैं कि जमीन की क्या स्थिति है,और बेहतर फसल पाने के लिए उन्हें कितना उर्वरक इस्तेमाल करना चाहिए। इस तरह से देखें तो स्वाभाविक तौर पर दलहनी फसलों में उर्वरक का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर करना चाहिए। दलहनी फसलों में 15—20 किलोग्राम नाईट्रोजन,40—60 किलोग्राम फॉस्फोरस एवं 30—40 किलोग्राम पोटैशियम एवं 20 किलोग्राम सल्फर प्रति हेक्टेयर अवश्य करना चाहिए। साथ ही दलहनी फसलों में फास्फोरस तत्व का प्रयोग डाई अमोनियम फास्फेट की जगह पर सिंगल सुपर फास्फेट का प्रयोग करना चाहिए।  फास्फोरस एवं पोटाश का प्रयोग दलहनी फसलों में बुवाई के समय ही प्रयोग करना चाहिए, क्योंकि ये दोनों तत्व मृदा के अंदर अगतिशील होते हैं।

arhar-crop5. आमतौर पर देखा गया है किसान दलहन की फसल तो लगाता है लेकिन उसके फूल आने पर मौसमी प्रभाव के कारण ज्यादातर फूल झर जाते हैं? ऐसे में आपका क्या सुझाव होगा?
हम प्रकृति से प्राप्त करते हैं। प्रकृति के नियमों से संचालित होते हैं। खेती किसानी भी इससे अलग नहीं है। फिर भी किसान अपने स्तर पर प्रयास करता है खेती को मौसम के प्रभाव से बचाते हुए बेहतर उत्पादन का। इस दिशा में हमारा सुझाव होगा कि किसान भाई जाड़े में वर्षा न हो तो फूल आने के समय एक सिचाई अवश्य किया जाना चाहिए। दाना भरते समय दूसरी सिचाई लाभप्रद होती है। साथ ही खरपतवार नियंत्रण भी जरूरी है। किसान भाईयों को दलहनी फसलों में खर पतवार नियंत्रण हेतु पेंडीमिथलीन 3.3 लीटर प्रति हेक्टेयर बुवाई के बाद छिड़काव करें। इसके भंडारण के दौरान कीटों से रक्षा हेतु अल्यूमिनियम फास्फाइड 3 गोली प्रति मिट्रिक टन का प्रयोग करें।

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