परंपरागत असरदार,हरित क्रांति की बौनी किस्म पर न करें भरोसा,

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  • भारत व इंडोनेशिया के पारंपरिक धान में जीनों की हुई पहचान
  • सूखा प्रतिरोधक क्षमता में देशी प्रजातियों की क्षमता है अधिक
    पुरुषार्थ सिंह
    मऊ : गांव—देहात में यह कहावत है नया नौ दिन पुराना सौ दिन। कुछ यही घटित होने जा रहा है चावल अनुसंधान के क्षेत्र में। एक तरफ केंद्र सरकार हरित क्रांति के दूसरे चरण को तेजी से आगे बढ़ाने की दिशा में कदम बढ़ा रही है,वहीं दूसरी ओर हरित क्रांति की चमक फीकी परने की भी खबर है। हरितक्रांति के दौरान विकसित धान की उपजाऊ बौनी किस्मों में सूखा प्रतिरोधकता वाले जीनों की कमी आई है, जबकि हमारे पारंपरिक किस्मों में ऐसे जीन मौजूद हैं। यह बात विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक पत्रिका नेचर साइंटिफिक रिपोर्ट के 13 अक्टूबर 2015 के अंक में इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट (इर्री) फिलीपींस व राष्टीय पादप जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान केंद्र (आईसीएआर) नई दिल्ली के एक संयुक्त अनुसंधान को विस्तार से प्रकाशित किया गया है। इस दौरान वैज्ञानिकों ने भारत व इंडोनेशिया के धान की पारंपरिक किस्मों में सूखा प्रतिरोधक क्षमता वाले कई जीनों की पहचान कर लिया है।
  • क्या कहते हैं विशेषज्ञ: राष्टीय पादप जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान केंद्र के राष्ट्रीय प्रोफेसर डा. नागेंद्र सिंह ने बताया कि बहु संस्थान वाली इस परियोजना द्वारा जीनोमिक्स की मदद से प्रजनन करके जलवायु के अनुरूप अधिक उपज देने वाली धान की नई किस्मों में इन गुणों को वापस लाया जा रहा है। हरित क्रांति के दौरान विकसित धान की बौनी किस्में जैसे आईआर-64, जया, स्वर्णा, सांबा मंसूरी आदि उच्च उपजाऊ तो हैं लेकिन आम तौर पर सूखे के प्रति संवेदनशील हैं। नए शोध में इसका एक कारण पौधों की उंचाई और सूखा सहिष्णुता वाले जीनों के बीच घनिष्ठ निकटता बताया गया है। इस संबंध को सूखा प्रतिरोधकता वाले जीन डीटीवाई-1.1 तथा बौनेपन वाले जीन एसडी-1 के पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक साथ जाने के लिए जिम्मेदार एक गुणसूत्र के विस्तृत वर्णन द्वारा साफ दिखाया गया है। सूखे की स्थिति में चावल की उपज के लिए जिम्मदार तीन अन्य डीटीवाई जीनों में भी इस तरह का संबंध दिखाया गया है। इस तरह के कुल 11 डीटीवाई जीनों की अनुवांशिक विविधता का विश्लेषण पारंपरिक सूखा प्रतिरोधी धान की किस्मों और हरित क्रांति के बाद विकसित किस्मों को अलग-अलग समूहों में विभाजित करता है। अब जीनोम विज्ञान की सहायता से इस अवांछनीय संबंध को तोड़कर सकारात्मक डीटीवाई जीन के साथ उच्च उपज वाली सूखा प्रतिरोधी बौनी किस्मों का विकास किया जा रहा है।
    डा. सिंह बताते हैं कि भारत में धान उत्पादन का 50 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र वर्षा पर आधारित है। जहां किसान हल्के से लेकर गंभीर सूखे की मार लगभग हर साल झेलता है। वर्षा सिंचित धान उत्पादन के बड़े क्षेत्र में सूखा के प्रभाव और घटते भूजल स्तर को देखते हुए धान के किस्मों की सूखा प्रतिरोधिकता में सुधार लाना व स्थाई चावल उत्पादन हासिल करने में सहायक होगा। }

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