संतोष कुमार सिंह
नयी दिल्ली: भारत की आत्मा गांवो में बसती है। हमारे जड़ों से जुड़ा हुआ है गांव। गांव को लेकर अलग—अलग विचारकों की अलग—अलग धारणाएं है। वर्तमान में हमारे गांवो को विकास की धारा से जोड़ने की कवायद के तौर पर इसे आदर्श से लेकर मॉडल बनाये जाने की बात हो रही है। लेकिन विकास के इस परिकल्पना के बीच हमारे परंपरागत गांव को उसके मूल स्वरूप में रेखांकित करते हुए वर्तमान की विसंगतियों की ओर ध्यान दिलाया रविंद्र शर्मा ने। वे इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, चेयरमैन राम बहादुर राय के बुलावे पर भारत विद्या प्रयोजना सीरीज के अन्तर्गत बुधवार को आयोजित व्याख्यानमाला के पहले भाषण में भारत के गांवो को लेकर अपनी बात रखी। अगर रविंद्र शर्मा की बातों को विंदूवार देखें तो ये बातें निकल कर सामने आयीं।
अंग्रेजों ने नष्ट किया हमारी परंपरागत व्यवस्था को
रविंद्र शर्मा ने कहा कि आज जो देश में व्यस्था चल रही है वो ब्रिटिश प्रेरित व्यवस्था है, जो की भारतीय ग्राम और नगर व्यवस्था के लिए कहीं से भी शुभ नहीं है। मुगल भी जिस भारतीय ग्राम समाज जीवन की संजीवनी शक्ति को नष्ट नहीं कर पाए उसे अंग्रेजों की बनाई व्यवस्था ने पूरे तौर पर नष्ट कर दिया। अंग्रेजों ने भारत केंद्रित व्यवस्था के तंबू की एक एक खूंटी उखाड़ दी, अब तंबू भरभरा कर कुछ खंभों पर आ टिका है।इन खंभों को संभालने से भी क्या होगा क्योंकि तंबू की बुनियादी खूंटियों पर तो किसी का ध्यान ही नहीं जा रहा है। अब भारत की पुनर्रचना होगी तो हमें बीज को सुरक्षित रखने की कोशिश करनी चाहिए। हमें समझना होगा कि आखिर भारत केंद्रित व्यवस्था के खंभे हमें कहां पकड़ने हैं, खूंटी को कहां फिर से जमाना है, हमें समझना होगा कि आखिर अंग्रेजों ने कैसे कहां क्या-क्या अमूल्य नष्ट कर दिया है?
स्वावलंबी थे हमारे गांव
भारत में गांव क्यों बने थे? क्यों हमने गांव बसाए और गांव की कल्पना ही आखिर कहां से आई? क्यों हमने बड़े नगर बसाने में रुचि नहीं दिखाई, क्यों इंद्र का एक नाम हमारे ग्रंथों में पुरंदर यानी शहरों को नष्ट करने वाला भी पढ़ा-सुना गया। आदिलाबाद के आस पास के गांवो की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि भारत की आजादी के बाद ‘क्या नहीं था उस वक्त के हमारे गांव में। लोहे से लेकर तमाम तरह के कागज-दफ्ती सब कुछ तो हम अपने गांव में ही अपने आंगन और घर के पिछवाड़े बनाने की कला में माहिर थे। उन दिनों भी भारत के गांवों में रौनक थी, सदियों की अंग्रेजी लूट के बावजूद गांव का स्वावलंबन मरा नहीं था। लेकिन आज आजादी के इतने साल बाद जब हम उन्हीं गांवों को देखने जाते हैं तो चारों ओर उदासी और निराशा दिखाई देती है, जैसे गांव की रौनक ही गायब हो गई, गांव की सारी कला और सारा उद्योग ही जैसे विलुप्त हो चुका है।’
नई सभ्यता की चुनौतियों को स्वीकारना होगा
‘वर्तमान तेलंगाना के आदिलाबाद में हम पले-बढ़े, वहीं अपने निवास के 20 किलोमीटर के दायरे की दुनिया देखी। कुछ भी देखने निकलते थे तो हमें बहुत कुछ दिखने लगा. आजादी के बाद आज से 30-40 साल पहले की ये बात है, उस दौर में जब हम अपने दायरे को समझने निकले तभी ये बात भी समझ में आ गई कि पुराणों में वर्णित प्रलय का दौर जैसे आ गया है। नई सभ्यता जैसे भारत का सर्वस्व निगल जाएगी तो बीज को बचाना जरुरी है, हमने अपने गांव-देहात-कस्बों के ज्ञान को, पुरानी विद्याओं को, लोक-हुनर को संरक्षित करना शुरु किया क्योंकि पाश्चात्य प्रलय की आंधी में इसे बचाकर रखना ही सबसे बड़ी चुनौती हमारे सामने थी।’
चार चीजों पर टिकी थी गांव की बुनियाद
गांव की बुनियाद में जो चार चीजें सबसे अहम थीं उनमें विज्ञान, आध्यात्मिकता, कला और सामाजिक अर्थशास्त्र शामिल था। गांव की बुनियाद से जुड़े यही वो स्तंभ थे जिस पर समृद्धि की मंजिलें गांव ने तय की. जैसे प्रकृति परिपूर्ण वैसे ही परिपूर्ण बने हमारा जीवन। किसी के पास ज्यादा है तो दिखे नहीं, कम है तो कमी महसूस ना हो और भौतिक चीजों को लेकर मानसिक तनाव तो पैदा ही ना हो, यही है गांव व्यवस्था का मूल मंत्र।’ जीवन जीने की दुनिया के इस फासले में गांव पैदा हुए लेकिन सीखने की ललक में शिक्षा के लिए सारी धरती में कहीं भी आने-जाने का फैसला पुरखों ने किया। सीखेंगे भले ही परदेश में लेकिन सीखी हुई चीज का जीवन में इस्तेमाल और प्रयोग तो अपने गांव और लोकमंगल के लिए ही करेंगे। इस तरह से गांव ही हमारी दुनिया थी जहां दुनिया भर में जो भी चीजें बन सकती हैं, उसे बनाने का केंद्र हमने खड़ा किया।
‘चींटी, पशु-पक्षी अपना भोजन लेने आखिर कितनी दूर जाते हैं? परमात्मा ने सभी जीवों के आहार की व्यवस्था उनके निकट आखिर क्यों की है? इसी कुदरती-प्राकृतिक सत्य में भी ग्राम को बसाने की प्रेरणा छिपी है।प्राचीन समय में लोगों ने अपने अनुभवों से सीखा और तय किया कि सुबह से चलकर शाम को लौट आएं, बस वहीं तक हमारी दुनिया. दूसरी जगह जीवन जीने के लिए जाने का मतलब या तो किसी की गुलामी करना या फिर कब्जा और कलह को आमंत्रण देना। प्राचीन भारतीय समाज ने दूसरों की चीज पर कब्जे की प्रवृत्ति और किसी की गुलामी करने की बात को सिरे से खारिज कर गांव को लोकमंगलकारी वरदान दिया।
जाति का मतलब ज्ञाति
आज की जाति व्यवस्था की अवधारणा से अलग रविद्र शर्मा ग्राम व्यवस्था के अंतर्गत जाति को परिभाषित किया। जाति व्यवस्था पर भी नए सिरे से रोशनी डाली. उन्होंने संस्कृत ग्रंथों में वर्णित जाति पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि भारतीय चिंतन जाति की कल्पना आज के अर्थों में नहीं करता था। हमारे लिए जाति का उद्भोधन विशिष्ट अर्थों में मानव जाति, राक्षस जाति के साथ वनस्पति समूह और पशुओं तक फैला हुआ था। उन्होंने बताया कि आदिलाबाद के आस-पास के गांवों में 18 कलाओं से जुड़े कारीगर होते थे, हर कारीगर से जुड़ी 12 उपजातियां उन्होंने एक गांव में 360 तक जातियों-उपजातियों का ब्यौरा हमने एकत्रित किया. लेकिन ये जाति आज सियासी तौर पर चर्चित जाति नहीं थीं। जाति यानी एक गांव में बहुत से विषयों के ज्ञाता। जो ज्ञाता है तो उसकी जानकारी को ज्ञाति कहा, जिसे बाद में जाति शब्द मिला। यानी जाति उसी की जिसे कुछ ज्ञात है, जिसे कुछ आता है, जो काबिल और स्वावलंबी है, उसे ज्ञाति कहा गया। उन्होंने कहा कि भारत में हर जाति की अपनी वर्ण व्यवस्था थी। वर्ण व्यवस्था के अन्तर्गत जातियां नहीं पली-बढ़ीं। जातियों मतलब ज्ञातियों के अन्तर्गत वर्ण व्यवस्था को जगह मिली। हर जाति का अपना ब्राह्मण था, हर जाति के अपने ज्योतिषी, क्षत्रिय और वैश्य थे। हर जाति के अपने कामागार शूद्र थे। हर वर्ण और हर जाति के व्यक्ति को राजा बनने का अधिकार था। राजा प्रसेनजीत चर्मकार जाति के थे तो नंद साम्राज्य नाई वंश से जुड़ा था। सातवाहन शासक कुम्हार थे, राजा सुहेलदेव, लाखन, सातन पासी और राजभर जातियों की वंशावली से जुड़े थे। पालवंश का शासन भारत के बड़े हिस्से पर रहा तो आदिवासी गोंड, मुंडा, निषाद जाति के लोग भी भारत के बड़े भूभाग पर शासन करते रहे. ऐसे उदाहरण अनगिनत हैं। राजा बनने के लिए जातिगत स्पर्धा नहीं थी क्योंकि कोई भी राजा हो, व्यक्ति-परिवार-ज्ञाति की आजीविका सुरक्षित थी। दक्षिण भारत में अनेक स्थानों पर ऐसे लोग भी राजा बनाए गए जिनके गले में हाथी ने माला डाल दी। कलाकार-विद्वान का सिंहासन राजा के सिंहासन से हमेशा ऊपर रखा जाता था ताकि समाज का मानस और बौद्धिक स्तर ऊंचा रहे और समाज में सियासत का स्थान नीचे रहे। तब समाज में आहार की यानी रोजी-रोटी की हर ज्ञाति के युवक को सुरक्षा हासिल थी. तब आहार के लिए पढ़ने का रिवाज नहीं था। अपनी ज्ञाति और समाज के हित के लिए आवश्यकता और इच्छा होने पर गहन-गंभीर अध्ययन के लिए लोग निकलते थे, इससे समाज को मजबूती मिलती थी लेकिन जब आहार के लिए पढ़ाई की जाने लगी तो फिर समाज में विघटन की प्रक्रिया शुरु हो गई।
महिला केंद्रीत रहा है भारतीय ग्रामीण व्यवस्था
रविंद्र शर्मा के मुताबिक, भारतीय ग्रामीण व्यवस्था में धान्य और घर में रखी जाने वाली उपज पर महिलाओं का नियत्रण ही रहता था, इसलिए आर्थिक व्यवस्था की कुंजी उनके हाथ में रहने के कारण भारतीय ग्राम व्यवस्था में किसी भी व्यक्ति के भूखे सोने का उदाहरण नहीं मिलता। यहां तक कि हर ज्ञाति की महिला को पढ़ने-लिखने का भी पूरा अधिकार था। वडाली नामक चांडाल कुल की महिला के बारे में 3000 साल पहले ज्योतिष विद्या में निष्णात होने और ग्रंथ लिखने का ब्यौरा पुराणों में सामने आता है। रविंद्र शर्मा के अनुसार, जब नोट का प्रचलन आया और धन नोट के तौर पर पुरुषों के नियंत्रण में आया तो महिलाओं के अधिकारों का भी हनन शुरु हुआ, देश में गरीबी, भूखमरी, बेकारी और गहराते आर्थिक असंतुलन के पीछे इस नोट से संचालित आर्थिक व्यवस्था ने सबसे बुरा असर डाला।
कलाकारों को मिलता था सम्मान
भारतीय ग्राम जीवन शैली इस मंद गति की नदी और मंद हवा की तरह सुहावनी व्यवस्था का मूल थी जहां सृजन और कलाओँ की समृद्धि थी, लोगों के पास चिंतन-सृजन और सोचने का भरपूर अवकाश था।इसके उलट जैसे जैसे जीवन शैली तेज रफ्तार पकड़ती गई, इसका रूप नदी की बाढ़ विभीषका की तरह विकराल होता चला गया। जैसे तेज हवाएं-अंधड़ में विनाश लीला पैदा होती है, ठीक उसी तरह तेज रफ्तार जीवन शैली ने भारतीय जीवन से जुड़ी कलाओं-सृजन को जड़-मूल से ध्वस्त करने की प्रक्रिया भी तेज कर दी। भाषा-भोजन-भेष-भवन के डिजायन के हिसाब से ही भारत में 108 मॉडल मौजूद थे। देश में कही भी चले जाइए, हर निश्चित दूरी के बाद खान-पान, परिधान, मकानों के नक्शे और वास्तु में बदलाव साफ नजर आता था। इसके जरिए मनुष्य की पहचान आसान थी। कौन व्यक्ति समूह किस इलाके और प्रांत का रहने वाला है, इसे लोग आसानी से पहचान जाते थे। इसी में से भारतीय कला विकसित और समृद्ध हुई. हर ज्ञाति का अपना वाद्य था, अपना संगीत था, और अपनी नृत्य शैली थी. रविंद्र शर्मा के अनुसार, हर गांव में फसल का एक हिस्सा हर परिवार गांवसभा या महाजन के पास सुरक्षित रखता था। ये हिस्सा विकलांगों, विद्वानों, जरुरतमंदों, कलाकारों के पालन-पोषण और उनके योगक्षेम के लिए रखा जाता था। ग्रामीण भारत में समय के तीन हिस्से थे. 8 घंटे सोना, 8 घंटे पेशागत कार्य, 8 घंटे निजी-पारिवारिक-आध्यात्मिक-सामाजिक जीवन के लिए। गांव में बेचने के लिए चीजें नहीं बनती थीं। कारीगर-कलाकार देने के लिए चीजें बनाते थे, वस्तु-विनिमय से समाज अन्योन्याश्रित था। पूरे ग्राम-समाज-जीवन का उद्देश्य ही सामाजिक और पारिवारिक जीवन को सुखी रखना और स्थिरता प्रदान करना था कुछ इस तरह से जैसे नदी मंद मंद बहती है तो उसके किनारों पर पशु-पक्षी-वन-फसलें और सृजन सबसे सुंदर होता है, हवा मंद-मंद बहती है तो वह लोगों को सुख देती है, सृजन और सुहाने मौसम का कारण मंद हवा बनती है।
भारत में कला-संस्कृति और सभ्यता की इसी बुनियाद पर गांव का विकास हुआ। मनुष्य तो मनुष्य भारतीय चिंतकों ने पशु-पक्षियों के लिए मधुर संगीत और नाद-यंत्रों की रचना की क्योंकि नाद-सुर-आवाज और गंध का शरीर-मन-मष्तिष्क पर असर होता है। इसी को देखकर बैलों, गाय-भैंसों, बकरी तक के लिए अलग अलग घंटे और घुंघरू बनाए जाते थे। बैलों के गले में अलग अलग समय पर अलग अलग घंटे और घुंघरू बंधते थे। घोड़े और गधे तक के जीवन में भारतीय समाज ने संगीत का असर समझा था और तद्नुरूप व्यवस्थाएं की थीं दर्जी-कारीगर-जुलाहे 360 तरह की साड़ी और कपड़ों की डिजायन गांव में ही बनाते थे। और रंगरेज उसे उतने ही शानदार तरीकों से रंगता था। स्वर्णकार भी सैकड़ों प्रकार से गहने बनाते थे, सिर्फ मंगलसूत्र की ही बात करें तो 360 तरह के मंगलसूत्र बनाने की कलाएं स्वर्णकारों के पास थीं। हर व्यक्ति की जरुरत, रुचि, संदर्भ, जरुरत और समय के लिए कलाकार डिजायन बनाते थे और कारीगर उसमें खूबसूरती से अपनी कला उतार देते थे। अपने भाषण से रविद्र शर्मा ने यू समा बांधा कि भाषण खत्म होने पर लोगों को पता भी नहीं चला कि व्याख्यान खत्म हो गया है, और संचालक को ताली बजाने के लिए लोगों को ध्यान दिलाना पड़ा।



