आर विक्रम सिंह
पिछड़ते जा रहे गांवों को आत्मनिर्भर बनाने और उन्हे उनकी ताकत का अहसास कराने की जरूरत
आपातकाल के दौर में दुष्यंत कुमार ने कहा था, ‘यहां दरख्तों के साये में धूप लगती है, चलो यहां से चलें और उम्र भर के लिए’। यहां बात हमारे गांवों की है। अगर हमारी प्रशासनिक मशीनरी ग्रामीण भारत के प्रति चिंतित सजग रही होती तो क्या हमारे गांवों का यह हाल हुआ होता? हमारे ग्रामवासियों में स्वत: विकास की सोच ही नहीं है। जो भी विकास की बातें हैं वे सब सरकारी योजनाओं पर आधारित हैं। विकास के सपनों को पंख न मिल सकने का एक बड़ा कारण रहा है अन्याय। यह बुनियादी तथ्य हमारे ग्रामीण समाज की मूल समस्या को चिन्हित करता है। क्या न्याय संभव हुआ है? अन्याय सामाजिक हो या दबंग का अन्याय या प्रशासनिक-हमें बड़ा स्वाभाविक लगने लगा है। यह बात समझनी जरूरी है कि न्याय का अभाव सामाजिक, आर्थिक उत्पीड़न के साथ विकास के रास्ते भी बंद करता है। एक पूरा का पूरा समाज न्याय की आशा छोड़ चुका है। दबंग या उनके समर्थक अन्याय के पेशेवर खिलाड़ी बने हुए है। कार्यकर्ताओं में एक जुमला बड़ा लोकप्रिय है ‘हमारे समर्थकों के काम’। यह स्थानीय राजनीति का मूलमंत्र है। इसी पर अधिकारियों को धमकियां वगैरह भी दी जाती हैं। स्थानीय दबंग के अस्तित्व का आधार अन्याय है। परिवार, जाति, संप्रदाय अन्याय के बहुत से चेहरे हैं।
एक प्रशासनिक अन्याय भी है जो दबाव या भ्रष्टाचार का परिणाम है। ग्रामीण समाज की आत्मा मृतप्राय है। अत: अन्याय का प्रतिरोध नहीं है। ग्राम पंचायत ग्रामीणों की संस्था न होकर एक ऐसी एजेंसी हो जाती है जो अपने समर्थकों के काम कराने के लिए है। ग्रामस्तरीय कर्मचारी की भी उसी गैंग में शामिल होने की मजबूरी होती है। कोई न्याय के पक्ष के साथ खड़ा नहीं होता। 1अन्याय के प्रतिकार का माध्यम है प्रशासन व पुलिस, लेकिन आज 70 वर्षो बाद भी हम ऐसा प्रशासनिक संवर्ग नहीं विकसित कर सके जो अन्याय की धुंध को हटाकर न्याय का सवेरा दिखा सके। न्यायिक, प्रशासनिक, पुलिस, पंचायती राज, विकास अधिकारियों का इतना जमघट ग्रामीण समाज को यह आस्था नहीं दिला सका कि देश में न्याय का शासन है। मुकदमे कभी खत्म नहीं होते। विवाद अपराधों में तब्दील हो जाते हैं। ग्रामीण समस्याओं के मूल में 75 प्रतिशत भूमि संबंधी विवादों के मामले हैं। तहसीलदार से लेकर बोर्ड आफ रेवेन्यू तक भूमि विवादों के समाधान में लगे हैं, लेकिन न्याय का अहसास तक नहीं होता। ग्रामों ने अपने विवादों को स्वयं सुलझाने की क्षमताएं खो दी हैं। थाना दिवस, तहसील दिवस, सूचना का अधिकार आदि व्यवस्थाएं हैं, लेकिन ये प्राय: खानापूरी में तब्दील हो जा रही हैं। अन्याय व्यवस्था से भरोसा उठा देता है। घास से घोड़े की यारी लंबी निभ नहीं पाती। जिलाधिकारियों को ग्रामीण विवादों के समाधान में प्रशासन के नेतृत्व का अवसर मिलता है।
समाधान ग्राम्य सशक्तीकरण में है, उन्हें निर्भर और असहाय बनाने में नहीं। एक छोटी सी बात, यदि प्रत्येक ग्राम के दो पढ़े-लिखे बेरोजगार युवकों को जमीनों की पैमाइश, खसरा खतौनी आदि का आधारभूत प्रशिक्षण दे दिया जाए तो ग्रामों के स्तर पर यह क्षमता पैदा होगी कि वे स्वयं विवादों का समाधान कर सकें। कौशल विकास योजनाओं में एक ऐसा कोर्स मिल भी गया जिसे थोड़े सुधार के साथ एक उपयोगी प्रशिक्षण में परिवर्तित किया जा सकता था। अखबार में प्रकाशन हुआ। करीब दो हजार युवकों ने आवेदन भी दे दिया। ट्रेनिंग के लिए सेवानिवृत्त लेखपाल, कानूनगो का चयन भी प्रारंभ हुआ। सोचा गया कि ग्राम सभाएं इस व्यय को वहन करेंगी। प्रशिक्षण कोर्स में बदलाव के लिए विभाग को लिखा गया। चर्चा भी हुई, लेकिन बात कहीं अटक गई। बहरहाल भूमि विवाद समाधान के इस प्रस्ताव का प्रारूप शासन और प्रत्येक जिले को भी भेजा गया। बड़ी संभावनाएं हैं कृषि आधारित रोजगार की, लेकिन वे निगाह में नहीं आतीं। कोई आइटीआइ कृषि विद्यालय यह नहीं पढ़ाता कि ग्रामीण उद्यमशीलता के क्या रास्ते हैं। पशुपालन, बीज, कृषि रसायन, खाद्य, मृदा परीक्षण, बागवानी आदि में ही रोजगार के बहुत से रास्ते बन सकते हैं, लेकिन ऐसी सोच विकसित नहीं हुई। नाबार्ड के अंतर्गत ग्रामीण युवकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था है, इसे कम लोग जानते हैं। जिले के लीड बैंक मैनेजर के साथ प्रत्येक डिग्री कालेज में अंतिम वर्ष के छात्रों के लिए एक सप्ताह का उद्यमिता कोर्स चलाने की योजना पर विचार किया गया। अब बजट की समस्या आड़े आ गई। विचार, विचार ही रह जाते हैं। इसी तरह ग्रामों में छोटे तात्कालिक ऋणों की समस्या है। अब नया धनाढ्य दबंग 120 प्रतिशत सालाना ब्याज पर कर्ज दे रहा है। माइक्रो फाइनेंस ठेंगे पर है। हमारा दुर्भाग्य कि कोई ऐसा फोरम नहीं जहां इन समस्याओं, समाधानों पर चर्चा हो, रास्ते निकाले जा सकें।
गांधीजी ने भारत के ग्रामों के स्वनिर्भर होने की कल्पना की थी। अच्छा होता अगर हमारे गांव आत्मनिर्भरता के साथ विकास की सीढ़ियां चढ़ते रहते। बदलते सामाजिक, लोकतांत्रिक व प्रशासनिक समीकरणों में हमने अपने ग्रामों के अंतर्निहित विरोधाभासों के समाधान के रास्ते नहीं खोजे। आजादी के तुरंत बाद का वक्त ग्रामीण सशक्तीकरण का सही समय था। दीनता के शिकार हमारे ग्राम अपनी शक्ति का अहसास नहीं कर सके। आज ग्रामों को आत्मनिर्भरता की शिक्षा जरूरी है। वे अपने निर्णय ले सकें, विवादों का समाधान कर सकें। गलत को गलत कह सकें। उनमें अपने संसाधनों की समझ हो, उद्यमिता की पहल विकसित हो। अब तक हमने उन्हें सरकार के आसरे रहना सिखाया है। प्रत्येक ग्राम किसी न किसी स्किल या विशेषज्ञता के लिए जाना जाए। जहां भी अवसर था मैंने ये बातें कहने की कोशिश की है। आजादी के बाद बीतते जा रहे इन वर्षो में यह प्रश्न गहन होता जा रहा है कि हमारे ग्रामों में आत्मविश्वास, उद्यमिता, आत्मनिर्भरता की क्षमता किस प्रकार विकसित हो। न्याय का अभाव हमें इन लक्ष्यों तक पहुंचने नहीं देगा। जरूरी है कि हम इस पहली जंग में कामयाब हों जो अन्याय के ठेकेदारों के विरुद्ध है।(लेखक भारतीय प्रशासनिक सेवा के सदस्य हैं…दैनिक जागरण से साभार)
