बिहार में धान की सरकारी खरीद में गड़बड़झाला…खरीद हुई देर से शुरु, जल्दी बंद.. फिर भी डेढ़ गुना से अधिक खरीद

अमरनाथ झा
पटना: बिहार में धान की सरकारी खरीद में अजीब-सा गड़बड़झाला नजर आता है, लेकिन ठीक से समझ में नहीं आता। इस वर्ष रिकार्ड 35 लाख टन धान की सरकारी खरीद हुई जबकि खरीद कम दिनों तक हुई और धान की उपज कम होने के आंकड़े आए हैं। आमतौर पर बीते पांच-सात वर्षों से हर वर्ष 20 लाख टन धान की सरकारी खरीद होती रही है। तो इसबार क्या हुआ कि डेढ़ गुना से अधिक खरीद हो गई जबकि खरीद देर से शुरु हुई और जल्दी बंद कर दी गई। इस गोरखधंधे को समझना आसान नहीं है। पर जितना समझ आता है, उससे कई स्तरों तक पसरे भ्रष्ट तंत्र का खुलासा होता है।
इस बार धान की सरकारी खरीद देर से शुरु हुई। खरीद की रफ्तार कम रही। इस बीच खरीद का लक्ष्य 30 लाख टन से बढ़ाकर 45 लाख टन कर दिया गया और तारीख घटाकर 31 जनवरी तय कर दिया गया। इसके बाद खरीद की रफ्तार कुछ बढ़ी। आखिरी तारीख निकट आने पर आखिरी तारीख को कुछ बढ़ाया गया, फिरभी अन्य वर्षों की तुलना में इस वर्ष कम दिनों में खरीद को निपटा दिया गया। फिर खरीद पिछले वर्षों से अधिक कैसे हो गई, यह समझ में नहीं आता।
बाद में मुख्यमंत्री ने कहा कि सभी इच्छुक किसानों का धान की सरकारी खरीद होगी। धान बेचने के इच्छुक किसानों की सूची बनाई गई। मुख्यमंत्री के खास निर्देश पर कृषि विभाग के अधिकारियों ने घर-घर जाकर आंकडे एकत्र किया। हालांकि बाद में पता चला कि इस सूची में अनेक ऐसे किसानों का नाम भी शामिल हो गया जिनके पास बेचने के लिए धान है ही नहीं। सरकार ने इस बार खरीद बढ़ाने के लिए किसानों से एलपीसी मांगने और निबंधन कराने की शर्त में ढील दे दी। एक किसान से अधिकतम खरीद की मात्रा भी 150 क्वींटल से बढ़ाकर 2 सौ क्वींटल कर दिया गया। सरकार ने धान खरीदने से मना करने वाले पैक्सों पर कार्रवाई करने की घोषणा भी की।

बिहार में धान की सरकारी खरीद की निगरानी मुख्यमंत्री स्तर से होने की घोषणाओं के बीच भ्रम का माहौल बना। एकबार 31 मार्च तक 30 लाख टन धान की सरकारी खरीद होने का लक्ष्य निर्धारित किया गया, लेकिन एकाएक लक्ष्य बढ़ाकर 45 लाख टन कर दिया गया और तारीख घटाकर 31 जनवरी निर्धारित कर दिया गया। इस फैसले का कोई तुक नजर नहीं आता क्योंकि बिहार में धान की खरीद असल में जनवरी के बाद ही गति पकड़ पाती है क्योंकि एक तो उसके पहले धान तैयार नहीं हुआ रहता है और तैयार होता भी है तो उसमें नमी की मात्रा काफी अधिक रहती है।
नमी की मात्रा में सरकार 17 प्रतिशत तक छूट भी देती है, पिछले साल राज्य सरकार के अनुरोध पर दो प्रतिशत अतिरिक्त छूट देने के घोषणा केन्द्र की थी। इस वर्ष ऐसा नहीं हुआ है। केवल 17 प्रतिशत नमी की रियायत मिल सकती है। वैसे भी किसानों को धान बेचने के लिए पहले पंजीकरण कराना होता है। फिर भूमि-स्वामित्व प्रमाणपत्र देना होता है। इस वर्ष भूमि-प्रमाणपत्र की बाध्यता से छूट दी गई है। पर समयसीमा को लेकर कठिनाई बरकरार है। धान की सरकारी खरीद आमतौर पर पैक्स (प्राथमिक सहकारी साख समिति) और व्यापार मंडलों के माध्यम से होती है। इसके लिए पैक्सों को साख की सीमा निर्धारित की जाती है। पैक्स निर्धारित सीमा में सहकारी बैंकों से कर्ज ले सकते हैं जिसका भुगतान धान की आपूर्ति खाद्य निगम को करने और वहां से भुगतान मिल जाने पर करना होता है। बीते साल राज्य के ढेर सारे पैक्सों की बड़ी रकम खाद्य निगम पर रह गई थी। इस साल सरकार ने इस एवज में भुगतान करने के लिए बड़ी रकम जारी की। उसके बाद नई खरीद की कवायद शुरु हो सकी। हालांकि अनेक पैक्स ऐसे हैं जहां चुनाव होना है और कई पैक्सों पर सरकारी रकम बकाया है। इसलिए धान की सरकारी खरीद ठीक से शुरु भी नहीं हो गई कि लक्ष्य बढ़ जाने से कठिनाई आ गई है। धान खरीद का लक्ष्य बढ़ने का फैसला केन्द्र सरकार ने राज्य सरकार के अनुरोध पर किया है। लेकिन उसने नमी की मात्रा में कोई रियायत नहीं दी है।
धान की सरकारी खरीद के गड़बड़झाले में आम किसान अपनी उपज बिचौलियों के हाथों बेचने के लिए मजबूर हैं। सरकारी न्यूनम मूल्य इस साल 1868 रुपए प्रति क्वीटल निर्धारित है। पर किसान इसे 11 सौ या 12 सौ प्रति क्वींटल बेचने के लिए मजबूर हैं। यह स्थिति पूरे राज्य की है। इस काम में पैक्सों को सक्रिय करने के लिए सरकार ने उनका भुगतान होने में देर होने पर दो महीने के सूद का भुगतान करने की घोषणा की है। पहले सरकार एक महीने का ही सूद देती थी जबकि खाद्य निगम भुगतान करने में महीनों लगा देते थे। इस नुकसान की भरपाई करने के लिए सरकार ने एक महीने का सूद अतिरिक्त देने का फैसला किया है।

धान की सरकारी खरीद के पहले महीने अर्थात दिसंबर में राज्य में दो लाख टन से अधिक धान की खरीद हुई है। हाल के पांच वर्षों का आकलन करें तो यह रिकार्ड है। धान बेचने में शाहाबाद प्रमंडल के चारों जिलों की स्थिति सबसे बेहतर है। कारण है कि उस इलाके में धान की फसल जल्दी तैयार हो जाती है और नमी भी तेजी से सूखती है। वैसे अभी राज्य के किसी इलाके में धान में नमी 20 प्रतिशत से कम नहीं होगी। अगर पैक्स इस स्थिति में धान खरीदते हैं तो वे प्रति क्वींटल तीन-चार किलोग्राम अधिक धान लेंगे ताकि नमी सूखने पर वजन में होने वाली कमी की भरपाई कर सकें।
सरकार ने धान की सरकारी खरीद में तेजी लाने के लिए जिला के अधिकारियों को हर सप्ताह तीन दिन क्षेत्र का दौरा करने का निर्देश दिया। धान बेचने में एक कठिनाई बोरा को लेकर है। धान रखने के लिए बोरा की जबरदस्त किल्लत है। एक तो बोरा मिल नहीं रहा और जब मिल रहा है तो तीन गुनी कीमत चुकानी पड़ रही है। एक क्वींटल का बोरा 75 रुपए से कम में नहीं मिल रहा। जबकि सरकार से बोरे की कीमत केवल 25 रुपया मिलता है। राज्य में 8463 पैक्स हैं। उनमें से कई डिफाल्टर हैं। सरकार ने डिफाल्टर पैक्स को भी धान खरीदने की इजाजत दी है, पर उन्हें फिक्सड डिपोजिट या इसीतरह की कोई गारंटी देनी होगी। कुल मिलाकर अभी बिहार के किसानों के सामने अपना धान बिचौलियों के हाथों बेचने का विकल्प ही उपलब्ध है। इसकी दर 800 रुपए प्रति क्वींटल से लेकर 12 सौ रुपए प्रति क्वींटल है।

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