ज्यादा घांस काटने पर पुरस्कार में मिला चांदी का मुकुट

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पंचायत खबर टोली
घनसाली (टिहरी): अक्सर लोगों में मुंह से यह सुना जाता है कि पढ़ोगे नहीं तो बड़े होकर घांस काटोगे। यानी घांस काटना मतलब बेवकूफ होना। सबसे निकृष्टतम पेशा अपनाना। मानो, घास काटने वाला अनपढ़, जाहिल, गँवार और अनाड़ी ही होगा। लोग यह भी कहते हैं कि‘’मुझे भी जिन्दगी का काफी तजुर्बा है, मैंने कोई घास नहीं छिली।’’मतलब कि यह मान लिया जाता है कि घसियारे को कुछ नहीं आता,और यह काम सबसे आसान है। लेकिन इसी काम कि बदौलत यदि आपको चांदी का मुकुट मिले,और एक लाख रूपये का पुरस्कार तो ताज्जुब तो होगा ही। लेकिन यह ताज्जुब की बात नहीं श्रम के उपादेयता का प्रश्न है। पर्यावरण के प्रति जागरूकता से जुड़ा हुआ है।
यह काम ग्रामीण अर्थशास्त्र और ग्रामीण जनजीवन से जुड़ा हुआ है।

ghansali_tehri_garhwal_uttarakhandghaiyari2-png जी हां, ऐसी ही एक प्रतियोगिता का आयोजन उत्तराखंड के टिहरी जिले में घनसाली स्थित अखोड़ी गांव में हुआ। इस प्रतियोगिता में भिलंगना ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले गांवों की महिलाओं ने हिस्सा लिया।  विजेता को मिला एक चांदी का मुकुट।
2300 महिलाओं ने की शिरकत
चेतना आंदोलन के सौजन्य से आयोजित यह प्रतियोगिता पहाड़ के गांधी कहे जाने वाले स्वर्गिय इंद्रमणी बडोनी के गांव में आयोजित की गयी। वैसे तो आयोजको ने यहां कई प्रतियोगिताओ समेत कई अन्य आयोजन किए लेकिन इस दौरान मुख्य आकर्षण रहा घसियारी महोत्सव। इस प्रतियोगिता के प्राथमिक चरण में भिलंगना ब्लॉक के 248 गांवों की 2300 महिलाओं ने हिस्सा लिया।
तीन प्रमुख विजेताओं को पुरस्कार
आयोजन समिती ने घसियारी प्रतियोगिता में शामिल तीन विजेताओं को पुरस्कार से नवाजा। प्रथम विजेता को चांदी का मुकुट, द्वितीय- 51 हजार रुपये, तृतीय- 21 हजार रुपये पुरस्कार स्वरूप दिए गये। वैसे तो प्रतियोगिता पहले से चल रही थी लेकि इस प्रतियोगिता का अंतिम चरण संपन्न हुआ 22 दिसंबर को। फाइनल में पहुंची 33 घसियारिनों को दो मिनट में ज्यादा से ज्यादा घास काटकर लानी थी।

ghasiyarinविमला देवी के माथे सजा चांदी का मुकुट

घसियारी प्रतियोगिता में दो मिनट में सबसे ज्यादा घास काटकर  चिलियाल गांव की विमला देवी विजेता बनी। आयोजकों ने उन्हें चांदी का मुकुट पहनाया। वहीं दूसरे स्थान पर आईं घनसाणी की ज्ञानसू देवी जिन्हें 51 हजार रुपये का चेक दिया गया। तीसरे स्थान पर आईं अखोड़ी गांव की इंद्रा देवी। उन्हें आयोजकों की ओर से 21 हजार रुपये का चेक दिया गया।
महिलाओं के श्रम का सम्मान किया
इस प्रतियोगिता के संयोजक व चेतना आंदोलन के संयोजक त्रेपन सिंह चौहान ने इस कार्यक्रम पर कहा कि वह पहाड़ की महिलाओं को श्रम को अपनी इस प्रतियोगिता के जरिए सम्मान देना चाहते हैं। इन प्रतियोगिता के जरिए दिया गया सम्मान पहाड़ की महिलाओं के श्रम को सम्मान है।
अंग्वाल.कॉम से साभार

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