चौथा नवरात्रि! मां कूष्मांडा की पूजा, जानिए पूजा महत्व और कथा

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पूजा

Navratri 4rd Day Maa Kushmanda: आज 2 अप्रैल को चैत्र नवरात्रि का चौथा दिन है। चैत्र नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा की जाती है। इसके साथ आदिशक्ति देवी कुष्मांडा की आठ भुजाएं हैं, इसलिए इन्हें अष्टभुजा भी कहा जाता है। इनके सात हाथों धनुष, बाण, कमल-पुष्प, कमंडल, अमृत से भरा कलश, चक्र और गदा सुशोभित हैं। वहीं आठवे हाथ में सिद्धियों और निधियों को प्रदान करने वाली जप माला है। मां कुष्मांडा की सवारी सिंह हैं जिसे साहस और शक्ति का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि नवरात्रि के चौथे दिन मां कुष्मांडा की भक्ति भाव से पूजा करने के साथ व्रत कथा पढ़ने तथा सुनने से व्रत पूरा होता है, साथ ही साधक की सभी मनोकामनाएं भी पूरी होती है।

मां कुष्मांडा पूजा का महत्व
धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां कुष्मांडा की पूजा आर्चना करने से परिवार में सुख समृद्धि आती है। और मां संकटों से रक्षा करती है। अगर आविवाहित लड़कियां मां की श्रद्धा भाव से पूजा अर्चना करती हैं, तो उन्हें मानचाहे वर की प्राप्ति होती है। और मां की कृपा से भक्तों के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और मानसिक शांति प्राप्त होती है। सुहागन स्त्रियों को अखंड सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद मिलता है। इसके अलावा देवी कुष्मांडा अपने भक्तों को रोग, शोक और विनाश से मुक्त करके आयु, यश, बल और बुद्धि प्रदान करती हैं। इसके अलावा नवरात्र उपासना में चौथेदिन इन्ही के विग्रह का पूजन-आराधन किया जाता है।

 

मां कुष्मांडा का स्वरूप
मां कुष्मांडा का स्वरूप अत्यंत तेजस्वी और दिव्य है। उनके आठ भुजाएं हैं, जिनमें कमंडल, धनुष, बाण, कमल का फूल, अमृत कलश, चक्र, गदा और जप माला धारण किए हुए हैं। मां सिंह की सवारी करती हैं। उनका यह स्वरूप शक्ति, समृद्धि और शांति का प्रतीक माना जाता है।

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मां कूष्मांडा की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय ऐसा आया था जब ब्रह्मा, विष्णु और शंकर सृष्टि की रचना में असमर्थ थे। पूरी सृष्टि में केवल अंधकार था, कोई जीवन नहीं था। और न ही कोई शक्ति काम कर रही थी। सभी देवताओं ने इस कठिन समस्या का समाधान ढूंढने के लिए मां दुर्गा की ओर रुख किया। तब मां दुर्गा ने अपने कूष्मांडा रूप में ब्रह्मा, विष्णु और महेश के सामने प्रकट होकर सृष्टि का निर्माण किया। ‘कूष्मांडा’ शब्द का अर्थ होता है ‘कूष्म’ (तरंग) और ‘आंड़ा’ (अंडा), अर्थात वह देवी जो ब्रह्मांड के अंडे के रूप में प्रकट होकर सृष्टि की रचना करती हैं।

देवी कुष्मांडा, दुर्गा मां का चौथा रूप हैं। देवी भागवत पुराण में उनकी महिमा का वर्णन है। माना जाता है कि उन्होंने अपनी हल्की मुस्कान से ब्रह्मांड बनाया था। इसलिए उन्हें कुष्मांडा देवी कहा जाता है। सृष्टि के आरम्भ में अंधकार था, जिसे मां ने अपनी हंसी से दूर किया। उनमें सूर्य की गर्मी सहने की शक्ति है। इसलिए, उनकी पूजा करने से भक्तों को शक्ति और ऊर्जा मिलती है।

 

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