
मुजफ्फरपुर: देश के अलग-अलग हिस्सों विशेष रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश,हरियाणा, राजस्थान और पंजाब के कई हिस्सों में किसानों के सवाल पर बड़ी-बड़ी महापंचायतें हो रही हैं। किसान आंदोलन कर रहे हैं। लेकिन बिहार भी अब इन किसानों के साथ खड़ा होने की दिशा में बढ़ रहा है। महापंचायतें भले न हों लेकिन किसान पंचायतों के आयोजन का सिलसिला शुरू हो गया है।

इस दिशा में पहल समाजवादियों के गढ़ मुजफ्फरपुर से हुई। इसमें आसपास के कई जिलों के कार्यकर्ता जुटे थे। जिनमें खेतीहर,पशुपालक, मत्स्यपालक, मधुपालक आदि खेती-किसानी के विभिन्न कार्यों में रोजगार करने वाले लोग बड़ी संख्या में थे। 74 आंदोलन से निकले वाहिनी कार्यकर्ता अनिल प्रकाश ने विषय प्रवेश कराते हुए कहा कि केन्द्र सरकार तीन नए कानूनों के सहारे कृषि क्षेत्र को बड़ी बड़ी देशी-विदेशी कंपनियों को सौंप देना चाहती है। इससे गांव-देहात के लोग अपनी बुनियादी आजीविका से खदेड़ दिए जाएंगे और बड़ी कंपनियों को सस्ते और मजबूर कामगर मिल जाएगे। इन कृषि कानूनों की असलियत को ठीक से समझने की जरूरत है जिसे सरकारी प्रचार नाजायज तरीके से किसानों के फायदेमंद बता रही है।
पहला कानून आवश्यक वस्तु संशोधन विधेयक 2020 है जिसके तहत अनाज, दलहन, तिलहन, खाद्यतेल एवं आलू-प्याज को आवश्यक वस्तु अधिनियम के दायरे से हटाया जाना है। 1955 के मूल अधिनियम में व्यापारियों को कृषि उत्पादों को एक सीमा से अधिक भंडारण नहीं करने की पाबंदी थी। इससे कृषि उत्पादों की जमाखोरी करना संभव नहीं होता था। अगर जमाखोरी करने से बाजार मे आवश्यक वस्तुओं का दाम बढ़ जाता तो प्रशासन की ओर से जमाखोरों पर छापेमारी होती और जप्ती, गिरफ्तारी आदि होती थी। इस तरह आवश्यक वस्तुओं के दाम नियंत्रित रहते थे। पर नया कानून आने के बाद प्रशासन कोई कार्रवाई नहीं कर पाएगा और बड़े व्यापारी व दुकानदार मनमाना भंडारण करेंगे और ग्राहकों से मनमाना कीमत वसूल सकेंगे।

दूसरा कानून कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य संवर्ध्दन एवं सुविधा विधेयक 2020 है जिसके तहत किसान मंडी से बाहर कहीं भी अपनी उपज बेच सकते हैं। बिहार में 2006 तक मंडी व्यवस्था थी जहां सरकारी दर पर अनाजों की खरीद होती थी। यह व्यवस्था खत्म होने के बाद पैक्सों के माध्यम से थोड़ी-बहुत खरीद जरूर होती है, पर मोटे तौर पर बिहार के किसानों को सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिल पाता। हालत यह है कि बड़े-बड़े व्यापारी बिहार के किसानों से धान, गेहूं और मक्का औने-पौने दाम पर खरीदकर पंजाब-हरियाणा में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बेच देते हैं। राज्य के किसान व सरकार को कुछ नहीं मिलता। अगर यह कानून लागू हुआ तो फायदे में बड़े व्यापारी होंगे, अन्य किसी को कोई फायदा नहीं होगा। तीसरा कानून किसान संरक्षण व सशक्तिकरण के नाम से आया है। इसके तहत कंट्रैक्ट फार्मिंग की जा सकेगी। पहले ही कई कानूनों में संशोधन करके कृषि क्षेत्र में कंपनियों का प्रवेश हो गया है। इस कानून से तो पूरा कृषि क्षेत्र ही कंपनियों के हाथ में चला जाएगा।

अनिल प्रकाश ने कहा कि केन्द्र सरकार बार-बार घोषणा कर रही है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था खत्म नहीं होगी, पर इसके लिए जरूरी कानून बनाने से आनाकानी कर रही है। अब सवाल है कि जब मंडी से बाहर अनाज मिल जाएगा तो मंडी में अनाज खरीदने कौन जाएगा और जब मंडियां नहीं होगी तो किसानों के सामने व्यापारी जितना दे, उतने में अनाज बेचने के सिवा कोई चारा नहीं रहेगा। इसतरह मंडी व समर्थन मूल्य बेमतलब हो जाएगे।
किसान पंचायत आयोजन समिति के संयोजक प्रोफेसर अवधेश कुमार ने कहा कि केन्द्र सरकार कह रही है कि इन कानूनों को विश्व व्यापार संगठन के प्रावधानों की वजह से लाया गया है। पर इसतरह के कानूनों का अमेरीका के किसानों को भी कोई फायदा नहीं हुआ है और वहां भी इनका विरोध हो रहा है। तब भारत में ऐसे कानून को लाने की हड़बड़ी क्यों है। प्रकाश ने कहा कि अगर इन कानूनों को लागू कर दिया गया तो अगले दस वर्षों में देश के दस करोड़ लोग भूख से मर जाएगे। लाखों लोग आत्महत्या करने के लिए विवश होंगे।
इस पंचायत में संयुक्त किसान संघर्ष संचालन समिति के हिमांशु तिवारी भी शामिल हुए। उनके अलावा उत्तर प्रदेश से राकेश रफीक और रामधीरज की उपस्थिती रही। बिहार के प्रमुख पत्रकारों में शामिल दिनेश के साथ कंचन बाला, कृष्ण मुरारी, विनोद रंजन शामिल हुए। पत्रकार दिनेश किसान आंदोलन में शुरू से ही पूर्णकालिक कार्यकर्ता की तरह सक्रिय है। मुजफ्फरपुर के इस पंचायत में प्रखंड स्तर पर किसान पंचायत करने का फैसला हुआ जिसे आसपास के जिलों सीतामढ़ी व वैशाली में भी ले जाया जायेगा। इसकी शुरूआत 28 फरवरी को मंडवन प्रखंड से हो जाएगी। फिर प्रमंडल स्तर पर पंचायतें की जाएगी। पहले दौर में तिरहुत, सारण, मिथिला. कोशी, चंपारण प्रमंडलों में पंचायतें होगी। कार्यक्रम को विस्तार देने के लिए दो पृष्ठों का पर्चा और तीनों कृषि कानूनों की विवेचना करते हुए पुस्तिका तैयार करने का फैसला भी महापंचायत में किया गया।
उल्लेखनीय है कि तीन कृषि कानूनों को लेकर दिल्ली के आसपास, हरियाणा,पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान तीन माह से अधिक समय से आंदोलन कर रहे हैं और तीन कृषि कानूनों की वापसी को लेकर सरकार पर दबाव बनाये हुए हैं।