कोषी की कोख में आज भी भूख बरकरार है। बिहार के सर्वाधिक गरीब जिले इस क्षेत्र में हैं। कोषी तटबंध बनने से कुछ लोग भले संपन्न हुए, पूरे इलाके की गरीबी बढ़ी। वास्तविक किसान साल में चार-छह महीने का आहार ही जुटा पाता है। आजीविका के लिए पलायन मजबूरी है। लोग पेट भरने के लिए बच्चों की मजदूरी पर निर्भर होते गए हैं। प्रवासी मजदूरों से आए पैसों से इधर के बाजार जरूर पनपे। पर स्थानीय भूमि पर खेती और मजदूरी करने में आमदनी औसतन 89 रुपया प्रतिदिन होती है। सालभर पेट भरने के लिए कई घरों के लोग दूसरे राज्यों में जाते हैं। वहां खेतों में दैनिक मजदूर के तौर पर काम करते हैं। उनकी आमदनी भी औसतन चार हजार रूपए माहवार से अधिक नहीं होती। लेकिन मजदूरों के पलायन की प्रवृति या मजबूरी की वजह से स्थानीय खेतों में काम करने के लिए कम लोग होते हैं। कृषि मजदूर आमतौर पर पंजाब जाते हैं। यह भी गौरतलब है कि सभी पलायनकारी युवा होते है और सक्षम कार्यबल की अनुपस्थिति से खेतों, परिवारों, पूरे समुदाय की क्षति होती है। क्षेत्र का विकास अवरुद्ध होता है।

यह सुपौल और मधुबनी जिले के 18 गांवों की कहानी है जो पष्चिमी कोषी तटबंध के भीतर हैं। यह कृषि निर्भर इलाका है। सारे लोग कृषि कार्य में संलग्न हैं। वे खेती करते हैं या खेतों में मजदूरी करते हैं। इन खेतों की उर्वरता और उत्पादकता को निरंतर बाढ़ ने नष्ट कर दिया है। मिटटी बलूआही है जिसे अधिक पानी की जरूरत होती है। पर परंपरागत जलस्रोत अर्थात कुएं और तालाब बाढ के दौरान नष्ट हो गए और बाढ़ आना बंद हो गया। इसतरह वर्षा पर निर्भरता बढ़ गई। खेती का ढंग परंपरागत है, पर परंपरागत साधन उपलब्ध नहीं हैं। उर्वरता और उत्पादकता बढाने के उपाय नहीं है। पषुपालन भी मामूली है। खाद, बीज और पानी कुछ भी सुलभ नहीं है।
यह गरीबी और फटेहाली का एक नमूना भर है। पूरी राज्य की खेती बदहाल है। इसे दूर करने के लिए राज्य सरकार ने कृषि प्रणाली में परिवर्तन को लेकर कई नारे दिए। राज्य किसान आयोग, कृषि टास्क फोर्स, उच्चाधिकार संपन्न मंत्रीमंडलीय समिति आदि इत्यादि बने। पर सरकारी योजनाओं का असर गरीब किसानों पर नहीं पडत़ा क्योंकि वह उनके पास षायद ही पहुंच पाता है जिनको सर्वाधिक जरूरत होती है। कृषि विभाग ने किसानों की उन्नति के लिए जिन योजनाओं को लागू किया, उनपर बिचैलिए हावी रहे। बिचैलिया का मतलब ऐसी ग्रामीण आबादी भी है जो वास्तव में खेती के काम से नहीं जुडी। उनके खेतों पर बटाई या ठेके पर दूसरे लोग खेती करते हैं, खेतीहर के रूप में सरकारी सुविधाएं उन्हें ही मिल पाती है जिनके नाम पर मिल्कियत के कागजात होते हंै। वैसे सरकारी योजनाओं तक केवल वही लोग पहुंच पाते हैं जो प्रखंडों का चक्कर काटते हैं। इस लिहाज से खेती की आधुनिक तकनीकों के प्रचार-प्रसार में सरकारी प्रयासों के सामने गैर-सरकारी प्रयास बीस ही ठहरते हैं।
अत्यंत गरीब इलाके में टिकाउ विकास का उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए अप्रैल 2011 में समेकित जल प्रबंधन परियोजना आरंभ हुई। बिहार के दो जिलों-मधुबनी और सुपौल के 18 गांवों में ंजीपीएसवीएस,जगतपुर घोघरडीहा ने जर्मनी की वेल्टहंगरहिल्फे की साझीदारी में यूपोयीय यूनियन के कोष से इस परियोजना को संचालित किया। सबसे पहले गांवों का आधारभूत सर्वेक्षण किया गया। सहभागी पद्धति से आबादी की बनावट, आजीविका के स्रोत, पानी की व्यवस्था और भूमि की अवस्था का आंकलन किया गया। फिर ग्राम विकास समिति का गठन किया गया और पानी के प्रबंधन की व्यापक योजना तैयार की गई जिसमें मनुष्य और मवेषियों के पीने के लिए पानी से लेकर सिंचाई के पानी की व्यवस्था और वर्षाजल निकासी के इंतजामों का ध्यान रखा गया। सर्वेक्षण के दौरान मिली जानकारी चैकाती है।
इलाके के अधिकतर किसान मुष्किल से छह महीने के भोजन जुटा पाते हैं। बाकी महीनों के लिए वे अपने बच्चों और जवानों पर निर्भर करते हैं जो दूसरे राज्यों में कमकर अपना और परिवार का पेट भरते हैं। औसत परिवार की सालाना आमदनी लगभग 31900 रुपया है जो करीब 87 रुपया प्रतिदिन ठहरता है। सालाना खर्च 32734 रुपया होता है। आमदनी से अधिक खर्च को स्थानीय महाजनों से कर्ज लेते हैं। इसतरह अगर कभी आमदनी बढी तो उसके खर्च का इंतजाम पहले से हो जाता है। दोनों जिले पिछडा क्षेत्र अनुदान कोष (बीआरजीएफ )से संपोषित हैं। अर्थात इन इलाकों के विकास के लिए केन्द्र सरकार से विषेष अनुदान आता है। परन्तु मगर केवल 15 प्रतिषत किसानों ने खेती के आधुनिक व वैज्ञानिक प्रद्धतियों के बारे में सूना है। जिन पद्धतियों के प्रचार-प्रसार के लिए पिछले कई वर्षों से सरकार अभियान चला रही है। जिन किसानों ने एसआरआई या एसडब्लूआई के बारे में सूना है, उन्होंने भी इसका प्रयोग नहीं किया।
खरीफ में धान और रब्बी में गेहूं की फसल ही प्रचलित है। सब्जी व दलहन की खेती बहुत कम होती है पर दूसरी फसलों के साथ पूरक के तौर पर होने वाले मोटे अनाज गायब से होते गए हैं। मुष्किल से मडुआ, मूंग और उडद बचे हैं। भोजन के लिए अन्न उपजाने के आग्रह में धान और गेहूं की खेती ही करना चाहते हैं। लोगों के पास अधिक जमीन नहीं हैं। लगभग 29 प्रतिषत भूमिहीन मजदूर हैं और 55 प्रतिषत के पास एक एकड से कम जमीन है। केवल छह प्रतिषत के पास दो एकड से अधिक जमीन के मालिक है। खेती पेट नहीं भरने से आजीविका के लिए मजदूरों का पलायन वर्षभर हर महीने में होता है। वर्षापात के अनुसार खेती के कामकाज और गंतव्य स्थान पर उपलब्ध होने वाले रोजगार के अनुसार इसमें घट बढ़ होती है। ग्रामीणों की सहभागी बैठकों के माध्यम से एकत्र पलायन का आंकडा निम्नवत हैः-
आजीविका के लिए पलायन का माहवार विवरण
| कुल्हरिया | सरोजाबेला | बेलहा | महेषपुर | गिधा | जहलीपट्टी | परसा 3.4 | पिपरा | बसुआरी | |
| जनवरी | 20 | 90 | 90 | 10 | 70 | 10 | 20 | 5 | पहले |
| फरवरी | 15 | 90 | 90 | 10 | 40 | 5 | 20 | 10 | पलायन |
| मार्च | 25 | 90 | 90 | 7 | 80 | 55 | 40 | 10 | नहीं करते |
| अप्रैल | 15 | 80 | 80 | 50 | 80 | 10 | 10 | 5 | थे। अब |
| मई | 20 | 80 | 80 | 30 | 75 | 70 | 40 | 5 | 50-60 |
| जून | 50 | 50 | 50 | 60 | 70 | 60 | 20 | 25 | प्रतिषत |
| जुलाई | 25 | 20 | 20 | 40 | 55 | 55 | 20 | 3 | लोग |
| अगस्त | 5 | 20 | 20 | 20 | 68 | 10 | 10 | दिल्ली | |
| सितंबर | 4 | 20 | 20 | 5 | 40 | 10 | 10 | पंजाब | |
| अक्टूबर | 10 | 70 | 70 | 80 | 20 | 80 | 25 | जाते | |
| नवंबर | 10 | 80 | 80 | 10 | 40 | 50 | 20 | 5 | हैं। |
| दिसंबर | 5 | 90 | 90 | 6 | 50 | 30 | 20 | 2 |
उल्लेखनीय है कि आजीविका के लिए पलायन बिहार का पुराना रोग बन गया है। राज्य की वर्तमान सरकार ने इस कलंक से मुक्ति पाने के लिए अनेक कार्यक्रमों की घोषणा की। सरकारी खर्च में पिछले दस वर्षों में 32 प्रतिषत की बढोतरी हो गई। पर सरकारी आंकडों के अनुसार 2009 में 44लाख लोग पलायन करते थे। 2012 में पलायन करने वाले मजदूरों की संख्या में 35 से 40 प्रतिषत कमी का दावा किया गया। पर उपरोक्त गांवो की अवस्था और 2011 में सहभागी ढंग से हुए आधारभूत सर्वेक्षण इस दावे का समर्थन नहीं करते। खेती अभी लाभकारी नहीं हुई। कामगर आबादी को आकर्षित करने लायक नहीं हुई।

