लुटेरे बने महान और फांसी चढ़े किसान

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पेंटिंग: रचना श्रीवास्तव

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तनवीर जाफरी

 अपने शाही ठाठ-बाठ और असाधारण जीवन शैली के लिए कॉर्पोरेट जगत में अपनी विशेष पहचान रखने वाले उद्योगपति विजय माल्या इन दिनों एकबार फिर सुर्खियों में छाए हुए हैं। उद्योगपति होने के साथ-साथ राज्यसभा का सदस्य अर्थात् कानून निर्माता भी होने वाले माल्या पर देश के विभिन्न बैंको का लगभग 9 हज़ार •रोड़ रुपया बकाया है। और खबरों के अनुसार अपने ऊपर शिकंजा कसता देख माल्या गत 2 मार्च को ही देश छोडक़र फरार हो चुके हैं।

फेहरिस्त में और भी नाम

                   ऐसे ही एक नाम था रामालिंगा राजू। यह 1987 से लेकर 7 जनवरी 2009 तक सत्यम कंप्यूटर सर्विसेज़ नामक एक प्रतिष्ठित समझी जाने वाली कंपनी के मालिक थे। गलत कागज़ात के आधार पर न केवल बैंक को गुमराह करते रहे बल्कि अपने शेयरधारको को भी अंधेरे में रखते हुए इन्होंने उनके साथ बड़ा धोखा किया। आखिरकार कानून का शिकंजा राजू पर कसा गया और इनका रेत पर बना किला ढह गया। सहारा ग्रुप से लेकर छोटे स्तर पर गोल्डन फ़ारेस्ट तथा इस जैसे और न जाने कितनी ऐसी कंपनियां भारत में अपना जाल बिछा चुकी हैं जिन्होंने न केवल जनता को ठगा बल्कि उसी जनता की पूंजी के आधार पर देश के विभिन्न बैंको को भी बड़े पैमाने पर चूना लगाया। और जैसाकी हमारे देश में धरना है की इस प्रकार की आर्थिक ठगी करने वाला अपराधी उतना बड़ा अपराधी नहीं समझा जाता जितनी की दूसरी हिंसक घटनाओं में लिप्त अपराधी को समझा जाता है। इस प्रकार कॉर्पोरेट ,उद्योगपतियों अथवा कागज़ी हेराफेरी में महारत रखने वाले शातिर लोगों के साथ एक और सुखद स्थिति यह भी रहती है की यह लोग या तो अपने उन्हीं ठगी के पैसों से मुकद्दमेबाज़ी क स्वयं को बचा ले जाते हैं या फिर विजय माल्या की तरह विदेशों में अपने ठीकाने बनाकर मौका पाते ही वहां जा बसते हैं।

पेंटिंग: रचना श्रीवास्तव
पेंटिंग: रचना श्रीवास्तव

                   अब इसी तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी मुलाहिज़ा फरमाईए। हमारे देश को खेती प्रधान देश कहा जाता है। हमारे देश की अर्थव्यवस्था में किसानो का बहुत बड़ा योगदान है। कृषक समाज को हम अन्नदाता भी कहते हैं। हमारे देश का मुख्य वाक्य भी जय जवान-जय किसान है। गोया यदि सीमा पर निगरानी करने वाला जवान अपनी कठिन तपस्या व त्याग की वजह से हमें चैन की नींद सोने का अवसर देता है तो भारतीय किसान अपने खून-पसीने से हमारे लिए दो वक्त की रोटी मुहैया कराता है। परंतु आज हमारे देश में किसानों के लिए जेसे कानून हैं और जिस प्रकार उन्हें लागू किया जाता है यह बातें भी किसी से छुपी नहीं हैं। हमारा देश दुनिया का एक ऐसा देश है जहां किसानों द्वारा सबसे अधिक आत्महत्याएं की जाती हैं। महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और उड़ीसा जैसे राज्यों से तो किसानों द्वारा आत्महत्याएं किये जाने की खबरें आती ही हैं। हद तो यह है कि पंजाब व हरियाणा जैसे खुशहाल तथा देश में सबसे अधिक कृषि उत्पादन करने वाले राज्यों से भी किसानों द्वारा आत्महत्याएं किये जाने की खबरें प्राप्त होती रहती हैं। खबरों के मुताबिक 2014-15 के मध्य पूरे देश में लगभग बीस हज़ार किसानों द्वारा आत्महत्या किये जाने के समाचार प्राप्त हुए हैं। जबकि गत् मात्र दो माह के दौरान 139 किसानों द्वारा आत्महत्या की गई। किसानों द्वारा आत्महत्या किए जाने के आमतौर पर दो ही कारण होते हैं एक तो यह की वह खेती-बाड़ी के लिए बैंकों से लिया गया कर्ज वापस चुकता नहीं कर पाता या फिर उसकी फसल चौपट हो जाने की वजह से उसकी आंखों के सामने अंधेरा छा जाता है और वह अपने बच्चों की शादी-विवाह जैसी जि़म्मेदारियों को समय पर पूरा न कर पाने के चलते शर्मिंदा होकर अपनी जान गंवा बैठता है। उधर बैंक की कर्ज वापसी न होने पर उस पर कानून का शिकंजा कुछ ऐसे कसता जाता है गोया उसे यह महसूस होने लगता है कि अब उसके पास जेल जाने या अपनी ज़मीन गंवाने के सिवा कोई दूसरा रास्ता नहीं है लिहाज़ा केवल स्वाभिमान और खुद्दारी के चलते ऐसा किसान जेल जाने के भय से धनाढ्य कर्जदारों की तरह घर से भाग जाने के बजाए फांसी के फंदे पर लटक जाना ज़्यादा बेहतर समझता है।

उधर हमारे सत्ताधारी शासकगण इन किसानो के प्रति हमदर्दी तो नहीं दिखाई देती बल्कि वे इसपर कटाक्ष करने से बाज़ नहीं आते। ज़रा कल्पना कीजिए की क्या कोई भी व्यक्ति स्वेच्छा से अथवा मात्र छोटी-मोटी बातों से तंग आकर कभी अपनी जान भी दे स•ता है? परंतु पिछले दिनों महाराष्ट्र में जहां की इसी वर्ष जनवरी से लेकर अब तक 124 किसानो द्वारा आत्महत्याएं की जा चुकी हैं इसी राज्य के भारतीय जनता पार्टी के विधायक गोपाल शेट्टी ने जोकी उत्तरी मुंबई विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं, बड़ी ही बेशर्मी के साथ यह फरमाया किसानो द्वारा आत्महत्या किया जाना एक फैशन बन गया है। उस सत्ताधारी दल के विधायक द्वारा इतना गैरजि़म्मेदाराना तथा किसानो को अपमानित करने वाला बयान दिया जाना जिसने की पिछले लोकसभा चुनाव में देश की जनता से अच्छे दिन आने वाले हैं जैसा लोक लुभावना नारा दिया था इस प्रकार का बयान देना किस कद्र शर्मनाक है? यहां सवाल यह भी उठता है की वास्तव में हमारे देश के कानून की कमियों व कमज़ोरियों के चलते किसानो की आत्महत्या फैशन बन गई है या ठगी व आर्थिक घोटालेबाज़ी में महारत रखने वाले शातिर बुद्धि के लोगों द्वारा सरकार, बैंक जनता को चूना लगाए जाने की प्रवृति एक फैशन का रूप ले चुकी है? दरअसल फैशन तो यह भी बन चुका है की इन्हीं ठग व लुटेरे तथाकथित उद्योगपतियों द्वारा राजनेताओं खासतौर पर सत्ताधारी पार्टियों को धन-धान्य, एय्याशी चंदा, यहां तक की चुनावी फंड मुहैया कराकर इन्हें अपने नियंत्रण में रखा जाता है जबकी देश के गरीबों, मज़दूरों और किसानो से किये गए लोक -लुभावने वादों को समय आने पर ‘जुमला बताकर इन्हें भुलाने के लिए बाघ्य किया जाता है। गोया न तो अच्छे दिनों का इंतज़ार कीजिए न ही अपने बैंक खातों में पंद्रह लाख रुपये आने की प्रतीक्षा कीजिए ओर न ही कला धन वापसी की आस लगाकर बैठिए। यह सब तो महज़ वादे थे और वादों का क्या?

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                   परंतु ऐसा नहीं लगता की ऐसी स्थिति यानी पूंजीवादी व्यवस्था तथा उद्योगपतियों, तथा इनके समर्थक शासको का यह शासित नेटवरक और लंबे समय तक चल सकेगा। देश के कानून निर्माताओं तथा नीति निर्धारको को इस व्यवस्था के विषय पर गंभीर चिंतन •रना चाहिए। आखिर हमारे देश के किसानो, गरीबों, बेरोज़गारों तथा निम्र मध्यम वर्गीय लोगों के साथ यह कितना बड़ा अन्याय होता है की यदि वह अपने कर्ज अदा न कर सके तो न तो हमारा कानून न ही हमारा समाज उसे पुनर स्थापित करने के लिए कोई रास्ता निकलता है है। नतीजतन उस स्वाभिमानी गरीब व्यक्ति के पास अपनी जान देना ही एक मात्र रास्ता रह जाता है? और स्वयं को उद्योगपति, अथवा शासक वर्ग का गरीबी बताने वाला कोई भी व्यक्ति जब और जहां चाहे और जितना चाहे बैंक ऋण भी हासिल कर लेता है,उसके ऋण माफ भी कर दिए जाते हैं, उसके विरुद्ध अदालती कार्रवाई भी उतनी तत्परता से नहीं होती जितनी की एक गरीब,मज़दूर व किसान के विरुद्ध होती है। क्या यह बातें यह सोचने के लिए मजबूर नहीं करती की आखिर हमारे देश की यह किस तरह की कानून व्यस्था है जहां की लुटेरे बने महान और फांसी चढ़े किसान ?

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