डीआरडीओ की बायो टॉयलेट तकनीक पर वहीं के एक वैज्ञानिक ने सवाल खड़ा किया है। उसका दावा है कि जिस तकनीक की बात डीआरडीओ कर रहा है, वह महज फरेब है। वास्तविकता कुछ और है, जिसे छुपाया जा रहा है। कौन लोग ऐसा कर रहे हैं और डीआरडीओ की वह तकनीक क्या है? जानने के लिए पढ़े जितेन्द्र चतुर्वेदी की यह रिपोर्ट
डीआरडीओ (रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन) की बायो टॉयलेट तकनीक बकवास है। उसमें कोई सच्चाई नहीं है। कुछ वैज्ञानिक इस बाबत सरकार को गुमराह कर रहे हैं। यह सब वे लोग महज नाम कमाने और पदोन्नति पाने के लिए कर रहे हैं। संस्थान से जुड़े वैज्ञानिक वाई.अशोक बाबू का यही दावा है। वे डीआरडीओ की मसूरी स्थित आईटीएम (तकनीक प्रबंधन संस्थान) में बतौर माइक्रोबायोलॉजिस्ट कार्यरत हैं। उन्होंने डीआरडीओ की बायो टॉयलेट तकनीक पर सवाल उठाया है। इस बाबत अशोक बाबू ने सीवीसी (मुख्य सतर्कता आयोग) में शिकायत भी की है। उस पर बात करने से पहले डीआरडीओ की बायो टॉयलेट तकनीक को समझना होगा।
डीआरडीओ ने एक टॉयलेट विकसित किया है। यह सामान्य रूप से प्रयोग होने वाले टॉयलेट से बिल्कुल अलग है। यह मानव मल को कुछ विशेष तरह के जीवाणु की मदद से पानी और गैस में बदल देता है। यदि डीआरडीओ के दावे को माना जाए तो स्वच्छता अभियान के लिए यह तकनीक वरदान साबित होगी। इस दिशा में सरकार आगे भी बढ़ रही है। कई मंत्रालयों ने बायो टॉयलेट के लिए डीआरडीओ से समझौता भी किया है। संगठन इसकी आपूर्ति भी कर रहा है। संस्थान का दावा है कि जिस जीवाणु का प्रयोग बायो टॉयलेट में हो रहा है, वह अंटार्कटिका से लाया गया है। बात 1998 की है। हर साल अंटार्कटिका जाने वाले वैज्ञानिक मिशन में डॉ. लोकेन्द्र सिंह भी गए थे। वहां उन्हें मानव मल को पानी में बदलने वाला जीवाणु मिल गया। उसे लेकर वे भारत आए। प्रयोगशाला में उस जीवाणु की संख्या बढ़ाई जाने लगी। उसके गुणों का परीक्षण होने लगा। सियाचिन जैसी जगहों पर उसका प्रयोग किया गया। संगठन का दावा है कि उनका प्रयोग सफल रहा। उसी के आधार बायो टॉयलेट विकसित किया गया है।
वैसे तो बायो टॉयलेट विकसित करने में डॉ. लोकेन्द्र सिंह की खास भूमिका रही। लेकिन डॉ. डब्ल्यू सेल्वामूर्ति के योगदान को कम करके आंका नहीं जा सकता। क्योंकि जब लोकेन्द्र सिंह बायो टॉयलेट पर काम करने का मन बना रहे थे तो उन्हें डीआरडीओ की ग्वालियर स्थित डीआरडीई(रक्षा अनुसंधान और विकास संस्थान) के निदेशक डॉ.डब्ल्यू सेल्वामूर्ति ने काफी बढ़ावा दिया। उनकी ही सरपरस्ती में बायो टॉयलेट का प्रचार-प्रसार हुआ। सूत्रों की माने तो अंटार्कटिका से लाए गए जीवाणु की थ्योरी डॉ.डब्ल्यू सेल्वामूर्ति ने डॉ. लोकेन्द्र सिंह के साथ मिलकर गढ़ी। अगर वास्तव में ऐसा कोई जीवाणु वहां खोजा गया तो वह अपने आप में एक आविष्कार है। इसे लेकर डॉ. लोकेन्द्र सिंह ने कोई शोधपत्र लिखा। यदि लिखा तो वह कहां प्रकाशित हुआ। डीआरडीओ से जुड़े रहे प्रभु ड्रॉडियाल कहते हैं कि इतने बड़े अविष्कार पर तो उन्हें नोबल मिलना चाहिए था। साथ उनकी खोज को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान भी मिलनी जानी थी। वे आगे कहते हैं कि अंटार्कटिका पर भारत का मिशन तो बहुत बाद में शुरू हुआ है। उससे पहले कई देशों ने वहां पर काम करना शुरू कर दिया था। कई दशकों तक शोध किया, लेकिन उन लोगों को ऐसा कोई जीवाणु नहीं मिला। उनकी माने तो लोकेन्द्र सिंह का दावा सफेद झूठ है। कुछ इसी तरह का दावा माइक्रो बॉयोलॉजिस्ट वाई. अशोक बाबू का भी है। उन्होंने सीवीसी में जो शिकायत की है उसमें पूरी कहानी दर्ज है। उनकी माने तो यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मंत्रालयों को तकनीक के बारे में बुनियादी जानकारी भी नहीं है। इसी वजह से कुछ वैज्ञानिक लालच वश सबको बेवकूफ बना रहे हैं। उनके मुताबिक बायो टॉयलेट का विचार दो दशक पुराना है। यह तब की बात है जब संगठन के एक वैज्ञानिक अंटार्कटिका गए थे। वहां पर उन्हें एक जीवाणु मिला जो निम्न ताप में रहता है। वह भोजन को पचाने के दौरान मीथेन गैस निकालता है। इसका भोजन कार्बनिक पदार्थ है। उसमें मानव मल भी शामिल है। अशोक बाबू लिखते हैं कि यहीं से सारा खेल शुरू हुआ। डीआरडीओ ने एक टॉयलेट बनाया। उसके सेप्टिक टैंक में यह जीवाणु डाल दिया गया। इसे सियाचिन में लगाया गया। वहां पर इस टॉयलेट ने जिस तरह काम किया, उसकी बहुत प्रशंसा हुई। इसका अविष्कार करने वाले को कई सारे इनाम दिए गए। वे अपने पत्र में आगे जो कहते हैं वह डीआरडीओ के चेहरे को बेनकाब कर देता है। उससे यह साफ हो जाता है कि संगठन ने सरकार को ठगने के लिए एक बड़ी साजिश रची। डीआरडीओ के बायो टॉयलेट की सफलता का खूब प्रचार किया। लेकिन वास्तविकता कुछ और ही थी। जैसा कि अशोक बाबू ने दावा किया है। उनकी माने तो अंटार्कटिका से लाया गया जीवाणु प्रयोगशाला में ठीक परिणाम दे रहा था। लेकिन जब उसे परीक्षण के लिए सिचाचिन क्षेत्र में प्रयुक्त किया गया तो विफलता ही हाथ लगी। वहां पर जीवाणु युक्त बायो टॉयलेट को सक्रिय करने के लिए सोलर पैनल का प्रयोग करना पड़ा। यहां समझना होगा कि उसका उपयोग क्यों करना पड़ना? पैनल को इसलिए प्रयुक्त करना पड़ा, क्योंकि बायो टॉयलेट में मौजूद जीवाणु सियाचिन की ठंड में निष्क्रिय पड़ गए थे। लिहाजा मानव मल को पानी और गैस में बदलने की गति धीमी हो गई थी। उसे ही सामान्य करने के लिए पैनल लगाया गया ताकि बायो टॉयलेट का तापमान बढ़ाया जा सके। इससे जीवाणु सक्रिय हो गए।
अशोक बाबू लिखते हैं कि यहीं पर जनता के पैसे को लूटने का ख्याल आया। चूंकि यह जीवाणु अंटार्कटिका से लगाया था, इसलिए यही माना जा रहा था कि गर्म प्रदेशों में काम नहीं करेगा। लेकिन सियाचिन में जो हुआ उससे गर्म क्षेत्रों में प्रयोग करने की लालसा डीआरडीई में जागी। या फिर यूं कहा जाए कि उसका व्यावसायिक उपयोग करने का ख्याल जेहन में आया। उनकी माने तो जिन इलाकों में सामान्य तापमान रहता है वहां पर इस तरह के जीवाणु की कोई जरूरत ही नहीं है। क्योंकि यह काम तो गाय का गोबर भी कर सकता है। उसके गोबर में मौजूद मीथेनोजेनिक जीवाणु मानव मल को मीथेन गैस में बदल देता है। मतलब यह हुआ कि जिस तकनीक का बखान करते डीआरडीओ थक नहीं रहा है, वह सर्व सुलभ है। उसे कोई भी गाय के गोबर का प्रयोग करके बना सकता है। शायद यही वजह है कि अशोक बाबू ने शिकायत में कहा कि जो बायो टॉयलेट बहुत सहजता से बनाया जा सकता है उसके लिए अनावश्यक वित्तीय बोझ बढ़ाने की क्या जरूरत है। वाई. अशोक बाबू ने जो दावा किया है उस बाबत डीआरडीई से संपर्क किया गया। संस्थान के निदेशक डा. लोकेन्द्र सिंह के पास मेल किया गया। लेकिन उन्होंने उसका जवाब नहीं दिया। वह खमोश क्यों है इसका जवाब तो वहीं दे सकते है। लेकिन डीआरडीई के सूत्रों ने जो बताया है वह खासा चौंकाने वाला है। उनका कहना है कि संस्थान में जो बायो टॉयलेट बन रहा है उसमें अंटार्कटिका से लाया गया कोई जीवाणु प्रयुक्त नहीं हो रहा है। यह सुनने के बाद कौतुहल बढ़ गया। क्योंकि डीआरडीई से जिस तरह की खबरें आ रही है उसमें तो यही बताया जा रहा है कि बायो टॉयलेट में अंटार्कटिका के जीवाणु को उपयोग में लाया जा रहा है। मगर ऐसा है नहीं। उसमें गाय का गोबर ही प्रयुक्त हो रहा है। इसका पेस्ट तैयार करने के लिए संगठन ने ग्वालियर की ही स्थानीय कंपनियों को ठेका दे रखा है। वहीं बायो टॉयलेट के गोबर की आपूर्ति करता है। इसमें कितनी सच्चाई है यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा। लेकिन चूंकि विशेष प्रकार के जीवाणु से युक्त बायो टॉयलेट की तकनीक डीआरडीओ के पास है। इसलिए वही इसका लाइसेंस भी बांट रहा है। उसने निजी क्षेत्र की कई कंपनियों को विशेष जीवाणु से युक्त बायो टॉयलेट बनाने का लाइसेंस दे रखा है। इसमें फिक्की जैसे संगठन उसके साथ खड़े हैं। सवाल यह है कि क्या सबको पता है कि डीआरडीओ झांसा दे रहा है? यह प्रश्न तब और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, जब संगठन से जुड़े लोग दबी जुबान में ही सही, डीआरडीओ की कवायद को परपंच बता रहे हों। सरकार के पास तो तमाम तरह की मशीनरी है, क्या इसके बाद भी वह अनजान है। वाई. अशोक बाबू ने तो 2014 में ही सीवीसी को शिकायत भेजी थी। वे संगठन के भीतर भी इस मसले को उठाते रहे हैं। संगठन से जुड़े लोगों ने बताया कि वाई. अशोक बाबू ने तत्कालीन ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश के पास भी इस बाबत शिकायत की थी। बावजूद इसके कोई कदम नहीं उठाया गया। अलबत्ता ग्रामीण मंत्रालय से लेकर रेल मंत्रालय तक ने डीआरडीओ की थ्योरी को सही माना और उससे बायो टॉयलेट खरीदने का समझौता भी कर लिया, जो कई हजार करोड़ रुपए का है। जिस तरह की खबरें आ रही हैं, यदि उसे सही माना जाए तो डीआरडीओ का बायो टॉयलेट कारगर साबित नहीं हो रहा है।
लेकिन टॉयलेट में किसी को भी दो बातें ज्यादा परेशान करती है। एक दुर्गंध और दूसरी मक्खियां व कॉकरोच। इन दोनों ही मामलों में डीआरडीओ का बायो टॉयलेट निम्न स्तर का रहा। मसलन उड़ीसा में ग्रामीण मंत्रालय ने जो बायो टॉयलेट लगवाया था, उसे लेकर काफी शिकायत आई थी। कमोवेश ऐसी ही खबरें रेल गाडि़यों में लगे बायो टॉयलेट को लेकर भी आई थी। रेल मंत्रालय ने इस बाबत 22 अगस्त 2014 को एक बैठक की थी। उसमें बायो टॉयलेट में जो कमियां रहीं, उसे संबंधित अधिकारी ने उजागर किया था। विशेष रूप से मध्य रेलवे से ज्यादा शिकायतें थीं। उसे लेकर डीआरडीओ से रेलवे की क्या बात हुई यह जानने की कोशिश की गई। रेल मंत्रालय के जनसंपर्क अधिकारी के दफ्तर फोन किया गया। वहां मौजूद व्यक्ति ने इस बाबत कोई जानकारी देने से इनकार कर दिया। उसने कहा कि वह इस बारे में कुछ नहीं कह सकता। वहीं तमाम कोशिशों के बावजूद जनसंपर्क अधिकारी अनिल सक्सेना से संपर्क नहीं हो सका।
खैर वाई.अशोक बाबू ने डीआरडीओ के बायो टॉयलेट का जो भांड़ा फोड़ा है, उसकी कीमत भी उन्हें चुकानी पड़ रही है। उन्होंने सीवीसी को जो शिकायत की थी उसका पता डीआरडीओ को चल गया। वजह सीवीसी ने कार्रवाई करने के लिए उसे डीआरडीओ भेज दिया। इस कारण संस्थान को पता चला गया कि बायो टॉयलेट के खिलाफ शिकायत किसने की थी। इसके बाद अशोक बाबू को परेशान किया जाने लगा। उनकी माने तो संस्थान ने उनका एसीआर खराब कर दिया है। उनका दावा है कि चूंकि उन्होंने डीआरडीओ के बायो टॉयलेट तकनीक पर सवाल उठाया है, इसलिए संस्थान उनके पीछे पड़ गया है। (यथावत से साभार)



