पी साईंनाथ, वरिष्ठ पत्रकार
देश में सूखा कोई पहली बार नहीं आया है. इससे पहले भी देश में सूखे की समस्या सामने आयी है. लेकिन मौजूदा समय में हम एक बड़े संकट की ओर बढ़ रहे हैं. हम बड़े पानी के संकट के बीच है. चरों तरफ से पानी की संकट हो रही है. सूखे का मतलब होता है मॉनसून का कमजोर होना. लेकिन हमें ध्यान रखना चाहिए कि अच्छी बारिश के बाद भी संकट कम नहीं होने वाला है. यह संकट 20 साल पुराना है. मीडिया में सूखे को लेकर गंभीर बहस नहीं हो रही है. सिर्फ हेडलाइन और कुछ तसवीरों से सूखे की गंभीरता का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है. ऐसा नहीं है कि इस संकट में हमारा हाथ नहीं है. पत्रकारों को यह समझना चाहिए कि सूखे को लेकर कोई ऐसी तसवीर नहीं लगाये जिससे किसी व्यक्ति के सम्मान को ठेस पहुंचे. देश में सूखे से सिर्फ इंसानों को नहीं बल्कि जानवरों पर भी प्रतिकूल असर पड़ा है. देश में चारे का संकट हैं. पहले के लोग जानते थे कि पानी का महत्व क्या है. मॉनसून के पानी को सहेज कर रखना उन्हें आता था. लेकिन समय के साथ हमारी सोच बदलती गयी. हमारी पीढ़ी तक तालाब और पानी के अन्य साधनों को सहेजने की जागरूकता थी. आज की युवा पीढ़ी सोचती है कि पानी बोतलों में पैदा होता है. हमारे जीवनशैली में आये बदलाव ने काफी कुछ बदल दिया है.
ऐसा गलत धारणा है कि किसान कमजोर मॉनसून के कारण आत्महत्या करते हैं. पिछले 20 साल के मॉनसून के आंकड़ों पर गौर करें तो ऐसा नहीं लगता है. यह सही है कि सूखा किसानों की परेशानी बढ़ा देते हैं. किसान काफी समय से सूखे से जूझते रहे हैं. 65-67 में बिहार में और ७२ में महारास्ट्र में भयंकर सूखा आया था. लेकिन इतनी आत्महत्या नहीं हुई. उनके आत्महत्या की वजह दूसरी है. समय के साथ किसानो ने नकदी फसल को उगाने को प्राथमिकता देना शुरू किया. क्षेत्र विशेष के मौसम की अनदेखी कर ऐसा किया गया. ऐतिहासिक तौर पर महाराष्ट्र के मराठवाडा में देश के अन्य क्षेत्रों से कम वर्षा होती है. लेकिन पैसे के कारण किसानों ने पानी की अत्यधिक खपत वाली फसल गन्ने का उत्पादन करना शुरू कर दिया. शुरुआत में उन्हें इसके अच्छे पैसे मिले. लेकिन एक-दो फसल बर्बाद होते ही इन्हें काफी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा. इस नुकसान से उबरने के लिए किसानों ने कर्ज लेना शुरू कर दिया. जब सूखा बार-बार आने लगा तो वे आर्थिक तौर पर कमजोर होते गये और कर्ज के चंगुल में फंस गये. उसी तरह कुछ साल पहले केरल में किसानों में वनिला की खेती शुरू कर दी. उस साल अन्य देशों में वनिला की खेती तबाह होने के कारण किसानों को इसका काफी फायदा मिला. लेकिन जैसे ही दूसरे देशों में इसकी पैदावार बेहतर हुई किसानों को उत्पादन लागत से भी कम पैसे मिले. नकदी फसला के उत्पादन में अधिक पैसा खर्च होता है. ऐसे में मौसम के हिसाब से खेती नहीं करने का खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ रहा है. दूसरी बात विश्व में एक मात्र प्राकृतिक संसाधन पानी है, जिसपर अभी तक लोगों का अधिकार है. महाराष्ट्र के लातूर के लोगों का भी पानी पर अधिकार है. ऐसे में जलसंकट के इस दौर में किसी को चैरिटी का दिखावा नहीं करना चाहिए. जैसा कि बीसीसीआइ आइपीएल मैचों के आयोजन को लेकर कर रहा है.
देश में पिछले 25 सालों से विभिन्न क्षेत्रों में सुधार की बात हो रही है. जैसे सबको स
मान अवसर चाहिए. लेकिन यह सोचने का विषय है कि पहले के मुकाबले आज संकट क्यों बढ़ रहा है. वर्ष 1972 में महाराष्ट्र में इससे भयंकर सूखा पड़ा था, लेकिन पीने के पानी की समस्या नहीं थी, क्योंकि पहले समाज का इससे निबटने का तरीका अलग था. आज हालात अलग है. विश्व की 500 शीर्ष कंपनियों में 10 कंपनियां कृषि उत्पाद से जुड़ी हुई है. यानि किसान परेशान और कंपनी मालामाल. इसकी वजह है. देश में हरित क्रांति के नाम पर फसलों के उत्पादन पर जोर दिया गया. इससे देश में बोरवेल इकोनॉमी, टैंकर इकोनॉमी पैदा हो गयी. महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर में टैंकर से पानी बेचने का व्यापार 8 मिलियन डॉलर रोजाना है. भारत सरकार ने 1980 में एक बोरवेल योजना चलायी. इस योजना के तहत कई क्षेत्रों में लाखों की संख्या में वोरवेल खोद दिया गया. आज यही क्षेत्र पानी के लिहाज से डार्क, ग्रे और ब्लैक जोन में आ गये हैं. तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र के एक किसान के पास एक हेक्टेयर में 30-50 बोरवेल हैं. प्रत्येक गाँव में कम से कम ३ बोरेवेल प्रत्येक वर्ष लगाये जाते हैं. आंध्र प्रदेश की मिट्टी मुलायम है, जबकि महाराष्ट्र की कठोर. औसतन 500 फीट के वोरवेल पर एक लाख रुपये खर्च होता है. पानी के अत्यधिक प्रयोग और मॉनसून के असफल होने से ये वोरवेल सूख गये और किसान कर्ज के बाेझ में दब गये. आज बोतलबंद पानी एक बड़ा उद्योग बन गया है. पेप्पी और कोल देश के विभिन्न क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर पानी का दोहन कर रही है. इस काम की इजाजत उन्हें अमेरिका के कैलिफोर्निया में नहीं मिल सकती है. भारत में सरकारें में प्रति लीटर सिर्फ 5 पैसे लेती हैं और कंपनियां इन बोतलबंद पानी काे 15 रुपये में बेचती हैं. सूखे में मौसम, जल और सामािजक-आर्थिक पहलू हैं.महाराष्ट्र के सूखे में ये तीनों कारक मौजूद हैं. आइपीएल के एक मैच के लिए लाखों लीटर पानी चाहिए. गोल्फ के मैदान के रखरखाव पर रोजाना 1.8 मिलियन लीटर पानी की जरूरत होती है.
गन्ना पैदा करने के लिए एक एकड़ के लिए 18 मिलियन लीटर पानी चाहिए. मौजूदा संकट की वजह है कृषि का बिना मौसम को ध्यान में रखकर किया जाना. आज सूखा एक कारोबार बन गया है. यह हालत तब है जब देश में स्वच्छ पेयजल तक लोगों की पहुंच विश्व में सबसे कम भारत में है. महाराष्ट्र में सबसे अधिक 1.18 लाख करोड़ रुपया सिंचाई पर खर्च किया गया, लेकिन सिर्फ 18 फीसदी भूमि ही सिंचित है. ये जुमला बनाया जा रहा है की हम प्रत्येक एकड़ की सिचाई कर सकते है. यह सबसे बड़ा झूठ है. खेती से अधिक खपत पानी की शहरों में हो रही है. पानी को समाज से कॉरपोरेट को देने की कोशिश मौजूदा संकट की बड़ी वजह है. पानी को जीवन बचाने की बजाय जीवन शैली के लिए उपयोग लाने की वजह से सूखे के हालात पैदा हुए है.



