किसानों का वाजिब गुस्सा

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राजकिशोर

सरकारें एक बार किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने का निर्णय कर लें तो कुछ दिनों के लिए हाहाकार जरूर मचेगा, लेकिन इससे खेती और उद्योग में संतुलन आ सकता है

किसान का स्वभाव धरती की तरह होता है। धरती बहुत कुछ सहती है, फिर भी देती जाती है लेकिन जब वह गुस्से में आती है और फट पड़ती है, तब चारों ओर लावा फैल जाता है। मध्य प्रदेश के दस जिलों तथा राजस्थान और हरियाणा के कुछ जिलों में हम जो उपद्रव देख रहे हैं, वह वस्तुत: कोई सुनियोजित या व्यवस्थित आंदोलन नहीं, किसान का गुस्सा है, जो लगातार अन्याय सहते-सहते अचानक फूट पड़ा है। आंदोलन का चरित्र छिटपुट है, पर विभिन्न स्थानों की छोटी-छोटी लौएं मिल कर एक ज्वाला बन गई हैम। मंदसौर की चिनगारी आसपास के सभी जिलों में फैल गयी है।1धरती की तरह किसान भी शांतिप्रिय होता है। हिंसा उसके स्वभाव में नहीं होती। वह जीवन पैदा करता है, इसलिए जीवन का मोल भी समझता है। यही कारण है कि किसानों ने आरक्षण के लिए पिछले वर्षो में जो आंदोलन किए और अब उचित कीमतों के लिए जो हिंसा की जा रही है, वह सिर्फ माल या सामान की हिंसा है, जान की हिंसा नहीं। दोनों प्रकार की हिंसा में फर्क किया जाना चाहिए। माल या सामान को चोट पहुंचाना और आदमी को चोट पहुंचाना इन दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है। ट्रक की जगह पर वैसी ही दूसरी ट्रक आ जाएगी, पर एक आदमी की हत्या के बाद वैसा ही दूसरा आदमी हम कहां से ला सकते हैं? इसलिए इसलिए जो किसान जीव हत्या नहीं कर रहे थे, पुलिस द्वारा गोली चला कर उन्हें मार डालना राजकीय क्रूरता की ऐसी मिसाल है जो अब सभ्य देशों में नहीं पायी जाती।

भारत जैसे तीसरी दुनिया के देशों में ही पुलिस गोली चलाने के मामले में अतनी उत्साहित और तत्पर नजर आती है।1किसानी से जुड़े मुद्दों के लिए किसान आंदोलन हिंसक हो सकता है, यह एक नयी और चौंकाने वाली बात है। अभी तक तो हम ने किसान को दुखी-परितप्त हो कर आत्महत्या करते ही देखा है। एक सूचना के अनुसार, अभी तक 3,18,528 किसान गरीबी और ऋण की मार से आत्महत्या कर चुके हैं। यह आंकड़ा पूरे देश का है। मध्य प्रदेश में पिछले साल अकेले मुख्यमंत्री के चुनाव क्षेत्र के जिले सिहोर में 418 किसानों ने आत्महत्या की थी। तब मध्य प्रदेश की विधान सभा में एक तरह से इन मौतों का उपहास करते हुए गृह मंत्री बुपेंद्र सिंह ने कहा था कि सारी मौतें कर्ज के कारण नहीं हुई हैं कुछ किसान इसलिए मरे क्योंकि उन पर भूत आ गया था। हो सकता है कि नीचे के अधिकारियों ने ऐसी ही रिपोर्ट दी हो, पर विधान सभा में लिखित जवाब देने के पहले मंत्री महोदय को क्या यह सोचना नहीं चाहिए कि क्या भूत से भी कोई मरता है। क्या मध्य प्रदेश का कोई राजनीतिज्ञ आज तक भूत से मरा है?1मध्य प्रदेश के किसानों की दो प्रमुख मांगें हैं। कर्ज वापसी और प्याज, लहसुन आदि फसलों के लिए समर्थन मूल्य। कर्ज माफी की मांग के लिए किसानों को दोषी ठहराया नहीं जा सकता। यह नई बीमारी है और राजनीतिज्ञों ने ही पैदा की है। महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के किसान कर्ज माफी की मांग न कर रहे होते, अगर हाल ही में उत्तर प्रदेश के किसानों का कर्ज माफ न किया गया होता। उत्तर प्रदेश के किसानों ने इसकी मांग नहीं की थी। भाजपा ने चुनाव से पहले यह वादा किया था लेकिन यह दूसरे राज्यों के किसानों के लिए यह नजीर बन गया है। हाल में तमिलनाडु के किसानों ने दिल्ली के जंतर मंतर पर जो प्रदर्शन किया था, उसमें एक प्रमुख मांग कर्ज माफी की भी थी। कर्ज माफी का औचित्य तभी बनता है जब कोई विशेष परिस्थिति जैसे सूखा या बाढ़ या किसी अन्य कारण से फसल का नष्ट हो जाना, पैदा हो गई हो। किसान अकसर बैंकों से कर्ज ले कर खेती करते हैं और फसल चौपट हो जाने से उनकी स्थिति भिखारी-जैसी हो जाती है, क्योंकि बहुत कम किसानों के पास बुरे दिनों के लिए संचित पैसा होता है लेकिन कर्ज माफी की मांग का एक नियमित घटना बन जाना किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी घटना नहीं है।

अत: किसी न किसी बिंदु पर राजनेताओं को यह समवेत निर्णय लेना ही पड़ेगा कि आज से कोई पार्टी कर्ज माफी का वादा नहीं करेगी। मगर इस तरह का निर्णय तभी उपयोगी होगा जब यही नीति उद्योगों के मामले में भी अपनायी जाएगी। उद्योग के लिए अलग नीति और किसान के लिए अलग नीति यह दुरंगी राजनीति नहीं चलने वाली है, लेकिन किसान कर्ज माफी की मांग करते क्यों हैं? क्या हमारे किसान इतने बेईमान हैं कि वे बैंकों से कर्ज लेना जानते हैं, पर चुकाना नहीं जानते? जिनका किसान जीवन से थोड़ा भी परिचय है, वे कहेंगे, कुछ किसान ऐसा हो सकते हैं। पर ज्यादातर किसानों की मंशा बुरी नहीं होती। उनकी स्थिति बुरी होती है। सभी अर्थशास्त्रियों की राय है कि देश के अधिकांश भागों में खेती लाभकर पेशा नहीं रही। लागत बढ़ती जा रही है और वापसी कम होती जा रही है। सब से बड़ा संकट यह है कि जब किसी जिंस की बंपर फसल होती है, तो उसका बाजार भाव इतना गिर जाता है कि किसान को अपनी फसल औने-पौने भाव पर बेचनी पड़ती है। 1बंपर फसल से लाभ व्यापारी को होता है और किसान घाटे में रहता है। मध्य प्रदेश में इस बार यही हुआ है। प्याज और लहसुन की बंपर फसल हुई है, पर मंडी में उनकी खरीद कीमत सुन कर किसानों की आंखों में आंसू आने लगते हैं। फसल के बदले में जो मिलता है, उससे उसका घर चलना भी कठिन हो जाता है। इसलिए उचित मूल्य पाने का संघर्ष भारतीय अर्थव्यवस्था का यक्षप्रश्न बना हुआ है। पुलिस दमन से इसका हल नहीं निकाला जा सकता। यह समझ में आना मुश्किल है कि स्वामीनाथन समिति की इस सिफारिश को मानने में मुश्किल क्या है कि खेती की उपज को लागत का डेढ़ गुना मूल्य मिल्य मिलना चाहिए। औद्योगिक माल का कोई भी उत्पादक इससे कम लाभ नहीं कमाता। कुछ उत्पादों में तो लाभ कई सौ गुना है। सच तो यह है कि औद्योगिक उत्पादों से ज्यादा से ज्यादा कितने प्रतिशत लाभ कमाया जा सकता है, इसका कोई नियम ही नहीं है। जब कि खेती की उपज के मूल्य को कृत्रिम तरीके से दबाये रखा जाता है ताकि शहरी मध्य वर्ग को वह सस्ते में मिलती रहे। सरकारें एक बार हिम्मत करके किसानों को उनकी उपज का उचित निर्णय कर लें, तो कुछ दिनों के लिए हाहाकार जरूर मचा रहे, पर खेती और उद्योग में संतुलन आ सकता है और किसानों का जीवन खुशहाल हो सकता है। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं..दैनिक जागरण से साभार)
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