संतोष कुमार सिंह
नई दिल्ली: मध्य प्रदेश इन दिनों सुलग रहा है। जगह—जगह किसानों के आदोलन के हिंसक होने की खबरें आयीं। लेकिन अब विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े लोगों ने अपने स्तर पर किसान हित में सरकार से बातचीत करने का प्रयास शूरू कर दिया है।
शिवराज से मिलेंगे राजगोपाल
मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में किसान आंदोलन तेज होने के बीच जानेमाने गांधीवादी कार्यकर्ता पी वी राजगोपाल ने सरकार को सलाह दी है कि सरकार पुलिसिया कार्रवाई की बजाय संवाद का सहारा ले। राजगोपाल जल्द ही इस मसले पर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से मिलकर अपनी बात रखेंगे। उन्होंने कहा कि देश भर के किसानों की उपज की उचित कीमत सुनिश्चित करने के लिए सरकारी कर्मचारियों के वेतन आयोग की तर्ज पर एक आयोग का गठन किया जाए। इसके साथ ही मूल्य निर्धारण में किसानों की भी भूमिका होनी चाहिए। राजगोपाल का कहना है कि केवल न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खाद्यान्न के खरीद और उसके रखरखाव की घोषणा से बात नहीं बनने वाली,वास्तव में एक आयोग के गठन की जरूरत है जो उनके लोन के संबंध में विचार करे और उनके उत्पाद का बाजार के अनुरूप मूल्य निर्धारण करे। कृषि विभाग इस तरह के किसी भी समन्वयकारी कदम उठाने में प्रभावी साबित नहीं हुआ है।
कई किसान आंदोलनों का नेतृत्व कर चुके राजगोपाल ने कहा, ‘‘इतना बड़ा किसान आंदोलन अचानक से नहीं बना है। किसानों में यह गुस्सा लंबे समय से चला आ रहा था और अब इतने बड़े आंदोलन के रूप में सामने आया है। खेती में लागत बढ़ गई है और किसानों को उनकी उपज की उचित कीमत नहीं मिल पा रही है. किसानों को उनकी लागत के मुताबिक उपज की उचित कीमत मिलनी चाहिए और सरकार यह सुनिश्चित करे।’’
उन्होंने कहा, ‘‘हमारी मांग है कि सरकारी कर्मचारियों के लिए बनने वाले वेतन आयोग की तर्ज पर किसानों को लेकर भी आयोग का गठन किया जाए जो लागत की समीक्षा करके उपज की उचित कीमत तय करने में मदद करे।’’ राजगोपाल ने कहा कि अपनी उपज की कीमत तय करने में किसानों की प्रमुख भूमिका होनी चाहिए। ‘‘कारपोरेट जगत के लोग अपने उत्पादों की कीमत खुद तय करते हैं, लेकिन किसानों की उपज की कीमत दूसरे लोग तय करते हैं। ऐसा क्यों है? किसानों को यह अधिकार मिलना चाहिए कि वे अपनी उपज की कीमत तय करने में भूमिका निभाएं। उपज की एकतरफा कीमत तय नहीं होनी चाहिए।’’
हाल ही में मध्य प्रदेश के मंदसौर में पुलिसिया गोलीबारी में छह किसानों के मारे जाने के बाद किसान आंदोलन ने और भी बड़ा रूप ले लिया है। मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में किसान कर्जमाफी की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं।
एकता परिषद के अध्यक्ष राजगोपाल ने कहा, ‘‘सरकारों को यह समझना चाहिए कि सड़क पर उतरे किसान को पुलिसिया कार्रवाई से शांत नहीं कराया जा सकता। उनके साथ संवाद करना होगा। सरकार सभी किसान संगठनों के साथ बैठे और समस्या का तात्कालिक और दीर्घकालीन समाधान ढूंढे।’’ उन्होंने कहा, ‘‘पहले किसानों की संपूर्ण कर्जमाफी की जाए और फिर उनकी समस्याओं के दीर्घकालीन समाधान के लिए जरूरी कदम उठाए जाएं।’’
भूमिहीन किसानों के लिए आंदोलन चला चुके राजगोपाल ने कहा कि किसानों की भूमि छीनने और उनकी उपज औने-पौने भाव में खरीदने की वजह से किसानों में नाराजगी बढ़ी है।
उन्होंने कहा, ‘‘सरकारों की अमूमन यही कोशिश रही है कि किसानों की जमीन को छीन कर बड़े कारपोरेट घरानों को दी जाए। बड़े कारपोरेट घराने जमीन लेकर उसका उंची कीमत पर सौदा कर देते हैं अथवा दूसरी वाणिज्यिक गतिविधियों में उसका इस्तेमाल करते हैं। भूमि छीनने के सरकारों के इस रवैये ने किसानों को नाराज किया है। उपज की उचित कीमत नहीं मिलने से उनका गुस्सा बढ़ गया है।’’
रतलाम पहुंचे योगेंद्र यादव गिरफ्तार
मध्य प्रदेश में किसान आंदोलन के समर्थन में रतलाम पहुंचे स्वराज नेता योगेंद्र यादव को शिवराज पुलिस ने हिरासत में लिया है। यादव के साथ नर्मदा बचाओ आंदोलन की संयोजक मेधा पाटकर और सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश को भी गिरफ्तार किया गया है।
गिरफ्तारी के बाद योगेंद्र यादव ने कहा कि ”दृश्य यह है की मध्य प्रदेश राज्य के पुलिसिया तंत्र ने मेरे साथ मेधा पाटेकर ,स्वामी अग्निवेश, अविक सहा, सोमनाथ त्रिपाठी और कुछ सजग और जुझारू आंदोलनकारियों को मृतक किसान के परिवारों से मिलने से रोक दिया है। पुलिस का कहना है की धारा 144 लागू है। 4 लोगों से अधिक लोग आगे नहीं बढ़ सकते हैं। इस पर हमने कहा कि हम राज्य के आदेश का पालन करते हैं। हम उसके दायरे में रहकर ही मृतक किसान परिवारों से मिलने मंदसौर की तरफ आगे बढ़ेंगे। हम उन्हें मिट्टी का कलश सौंपने जा रहे हैं, हम उनके दुख दर्द में शरीक होने जा रहे हैं।” योगेंद्र यादव ने कहा कि ”हम अहिंसा के सेवक हैं और इसके दायरे में रहकर अपनी आवाज़ बुलंद करना जानते हैं। बिना किसी लिखित आदेश के मध्य प्रदेश की पुलिसिया तंत्र की ओर से हमें रोकने के लिए अपनाया जाने वाला रवैया न्यूनतम मानवधिकारों का उल्लंघन है। संविधान के ज़रिये मिले मूल अधिकारों की नाफ़रमानी है।”