बस इतना सा ख्वाब है..रिंग..रिंग.. रिंगा..रिंग..रिंग रिंगा..!

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यूनिसेफ ने लांच किया ​’फेयर स्टार्ट फिल्म’ के जरिए सभी बच्चों को बराबरी के हक का सोशल मीडिया अभियान

संतोष कुमार सिंह

नयी दिल्ली:सबको बराबरी का हक मिलना चाहिए। लेकिन इस उम्र में ही मुझे अपने चाचा के साथ लांड्री का बिजनेस संभालना पड़ता है। ये काम मैं उस वक्त से कर रहा हूं जब से पिता गुजरे हैं। मन में सवाल तो उठता ही है..इतनी गैरबराबरी क्यों? सबको बराबरी का हक मिलना ही चाहिए। ये शब्द हैं, 14 वर्षीय साहिल के जो बड़ा होकर तो क्रिकेटर बनना चाहता है लेकिन अभी यह सवाल उसके जेहन में बार—बार कौंधते हैं कि सबको बराबरी का हक तो मिलना ही चाहिए। आप सोच रहे होंगे साहिल कौन।

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जी हां साहिल फिल्म का कैमरा मैन है, उस फिल्म का जिसे यूनिसेफ इंडिया ने ‘फेयर स्टार्ट’ के नाम से सोशल मीडिया अभियान के लिए तैयार किया है। बच्चों की फिल्म है,बच्चों से जुड़ी,बच्चे ही एक्टर, बच्चे ही कैमरा मैन। बच्चे ही डायॅरेक्टर बच्चे ही सबकुछ। केवल साहिल ही क्यों? 13 साल की बेलिंडा..नगर निगम के एक स्कूल में जाती हैं। स्वभाव से शर्मिली बेलिंडा स्कूल के बाद घर में काम करती हैं। उनका भाई शॉन इस फिल्म में डायरेक्टर है। शॉन रोज गटर साफ करता है। वह स्कूल जाना चा​हता है,लेकिन जा नहीं सकता। पिता घर छोड़ कर चले गए हैं। मां बीमार रहती हैं। 6 भाई—बहनों में सबसे बडा..परिवार का भरण—पोषण भी तो करना है। इस फिल्म में सूरज भी हैं मात्र 10 वर्ष के हैं लेकिन जिम्मेवारी बड़ी। फिल्म में आर्ट डायरेक्टर हैं। लेकिन सूरज के सपने बड़े हैं। बड़े होकर वैज्ञानिक बनना चाहते हैं। लेकिन घर का माहौल ठीक नहीं। पिता शराब के आदी, मां भुट्टे बेचकर काम चलाती हैं।

ये सिर्फ साहिल, बेंलिंडा,शॉन, सूरज की कहानी नहीं देश में लाखों बच्चे बस इसी इंतजार में रहते हैं कि उन्हें भी ‘फेयर स्टार्ट’मिले अर्थात सब की तरह बराबरी का हक मिले। अब फिल्म तो फिल्म है। संदेश देती है। आप देखेंगे तो इनके जीवन से रूबरू होंगे। ऐसा पायेंगे कि आपके आसपास ही अनेकानेक सूरज, बेलिंडा जैसे फिल्म के पात्र हैं,लेकिन आपकी निगाहें वहां नहीं पहुंचती। शायद यही मकसद है यूनिसेफ की फिल्म का कि आपको झकझोरा जा सके। आप नींद से जागें। जैसे अपने बच्चों के लिए सपने देखते हैं..इन बच्चों के जीवन में भी रंग भरें।

fair start 2_nयूनिसेफ इंडिया की एडवोकेशी एंड कम्यूनिकेशन प्रमुख कैरोलिन डेन डल्क कहती हैं,” हर बच्चे को अपना जीवन ठीक तरीके से शुरू करने का अधिकार है। हर बच्चा उचित पोषण, शिक्षा, सैनिटेशन, सुरक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं का हकदार है। ​फेयर स्टार्ट  अभियान उन लाखों बच्चों की ओर ध्यान आकर्षित करता है जो बुनियादी सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं। हर बच्चे के जीवन में एक समान एवं बिना किसी भेदभाव के समान अवसर मिलने चाहिए, फिर चाहे बच्चा किसी भी जाति, धर्म, लिंग, क्षेत्र या समाज के किसी भी तबके से संबंध रखता हो।’

भावना तो ठीक है, लेकिन आंकड़ों के आईने में जब जमीनि हकिकत को टटोलते हैं सच बहुत डरावना है।

क्या कहते हैं आंकड़े

—भारत में 61 मिलियन बच्चे आज भी स्कूल नहीं जाते हैं।

— लगभग 10 मिलियन बच्चों को काम करना पड़ता है।

— 5 साल के कम उम्र के 3500 बच्चों की रोजाना मौत हो जाती है।

—भारत के आदिवासी समाज में 42 फीसदी बच्चों का विकास ठीक से नहीं हो पाता। वे स्टंटिग और वास्टेज के शिकार हैं।

—देश की कुल आबादी की लगभग आधी आबादी अर्थात 564 मिलियन लोग आज भी खुले में शौच जाते हैं।

— देश में हर साल 2.22 मिलियन लड़कियों की शादी निर्धारित उम्र सीमा से पहले कर दी जाती है।

—15 से 19 वर्ष के उम्र सीमा की लगभग 23 फीसदी लड़कियां शारीरिक या यौन उत्पीड़न की शिकार होती हैं।

स्वाभाविक है यूनिसेफ या किसी और संस्था की एक फिल्म जमीन पर बहुत बड़ा बदलाव नहीं ला सकती। लेकिन बदलाव की जरूरत तो है, और वह बदलाव आयेगा..समाज में हर स्तर पर प्रयास करने से। शायद यूनिसेफ अपने फेयर स्टार्ट सोशल मीडिया अभियान के जरिए बहुत सारे लोगों को इस बदलाव की दिशा में प्रेरक बनने में उत्प्रेरक की भूमिका निभाए। तो फिर वही पंक्ति ‘कौन कहता है कि आसमां में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालों यारों’। यूनिसेफ को उम्मीद है तबियत से उछाला गया आपका पत्थर जमीन पर बदलाव अवश्य लायेगा।

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